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मिट्टी की आपूर्ति नहीं, संकट में कुम्हारटोली

केशव कुमार भट्टड़•25 मई 20265 मिनट पठन102 बार पढ़ा गया

'सिर्फ कोलकाता के कुम्हारटोली ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण बंगाल के विभिन्न स्थानों में डायमंड हार्बर सहित दक्षिण 24 परगना जिले के विभिन्न क्षेत्रों की जमीन से काटी गई मिट्टी से मूर्ति बनाने से लेकर मिट्टी के शिल्प के विभिन्न काम किए जाते हैं। नए प्रशासन ने उस मिट्टी की कटाई को बंद कर दिया है। जिसके कारण संकट पैदा हो गया है।'

मिट्टी की आपूर्ति न होने से कुम्हारटोली सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैले मूर्तिकार संकट में हैं। बांग्लादेश से जूट (पटसन) न आने के कारण जूट की कीमतें बढ़ गई हैं। 70 से 80 रुपये किलो मिलने वाला जूट उन्हें अब 200 से 250 रुपये किलो के दाम पर खरीदना पड़ रहा है। रस्सी के दाम भी बढ़ गए हैं। इस स्थिति में अगर मिट्टी के दाम भी बढ़ते हैं, तो मूर्तियों की कीमत बढ़ेगी। ऐसी परिस्थिति में पूजा कमेटियां क्या करेंगी, उन्हें इस बात का इंतजार करना पड़ रहा है।

मिट्टी की आपूर्ति नहीं, संकट में कुम्हारटोली

कुम्हारटोली (Kumartuli) पश्चिम बंगाल के कोलकाता (उत्तर) शहर में स्थित एक पारंपरिक और ऐतिहासिक मोहल्ला है, जो अपनी मिट्टी की मूर्तियों (विशेष रूप से पूजा के लिए बनाई जाने वाली मूर्तियों) के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। 'कुम्हार' का अर्थ है मिट्टी के बर्तन या मूर्तियां बनाने वाले और 'टोली' का अर्थ है बस्ती। हुगली नदी के किनारे बसी इस पुरानी बस्ती में पीढ़ियों से मूर्तिकार रहते आ रहे हैं, जो अपनी अद्भुत कला से मिट्टी में प्राण फूंक देते हैं। यहाँ की बनाई मूर्तियां न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी भेजी जाती हैं।

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मिट्टी की आपूर्ति नहीं, संकट में कुम्हारटोली

मिट्टी की आपूर्ति न होने से कुम्हारटोली सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैले मूर्तिकार संकट में हैं। दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर सहित विभिन्न स्थानों से मिट्टी आती थी। उस क्षेत्र की जमीन से काटी गई मिट्टी कुम्हारटोली सहित विभिन्न स्थानों पर पहुँचती थी। राज्य में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद मिट्टी की वह आपूर्ति बंद हो गई है। जिसके कारण मूर्तिकार संकट में पड़ गए हैं।

कुम्हारटोली मृत्शिल्पी संस्कृति समिति के कोषाध्यक्ष सुजीत पाल से संपर्क करने पर उन्होंने कहा, 'सिर्फ कुम्हारटोली ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण बंगाल के विभिन्न स्थानों में डायमंड हार्बर सहित दक्षिण 24 परगना के विभिन्न क्षेत्रों की जमीन से काटी गई मिट्टी से मूर्ति बनाने से लेकर मिट्टी के शिल्प के विभिन्न काम किए जाते हैं। नए प्रशासन ने उस मिट्टी की कटाई को बंद कर दिया है। जिसके कारण एक संकट पैदा हो गया है।'

उन्होंने कहा कि अगर अगले सात-दस दिनों के भीतर इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो पूरा मृत्तिका शिल्प (मिट्टी का काम) गहरे संकट में पड़ जाएगा। यहाँ तक कि शारदोत्सव (दुर्गा पूजा) पर भी इसका असर पड़ सकता है। सुजीत पाल ने बताया कि कुम्हारटोली में काम तो हो रहा है, लेकिन वह बहुत धीमी गति से चल रहा है।

कुम्हारटोली के छोटे-बड़े सभी कलाकार संकट का सामना कर रहे हैं। उनके अनुसार, कच्चे माल की कीमत जिस तरह बढ़ी है, उस अनुपात में वे मूर्तियों के दाम नहीं बढ़ा पाए हैं। छोटे कलाकारों का कहना है कि अगर काम नहीं रहा, तो उनके सहयोगी काम छोड़कर दूसरी जगहों पर जा सकते हैं। जिसके कारण वे और अधिक संकट में पड़ जाएंगे। वजह यह है कि अकेले दम पर इस काम को जारी रखना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

सुजीत पाल के अनुसार, बांग्लादेश से जूट (पटसन) न आने के कारण जूट की कीमतें बढ़ गई हैं। 70 से 80 रुपये किलो मिलने वाला जूट उन्हें अब 200 से 250 रुपये किलो के दाम पर खरीदना पड़ रहा है। रस्सी के दाम भी बढ़ गए हैं। इस स्थिति में अगर मिट्टी के दाम भी बढ़ते हैं, तो मूर्तियों की कीमत बढ़ेगी। ऐसी परिस्थिति में पूजा कमेटियां क्या करेंगी, उन्हें इस बात का इंतजार करना पड़ रहा है।

कुम्हारटोली मृत्शिल्पी संस्कृति समिति की ओर से बताया गया है कि उन्होंने पहले ही अपनी समस्या के बारे में श्यामपुकुर विधानसभा क्षेत्र की विधायक पूर्णिमा चक्रवर्ती को अवगत करा दिया है। इसके साथ ही वे प्रशासन से भी आवेदन कर रहे हैं कि उन्हें इस संकट से मुक्त किया जाए।

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(साभार : गणशक्ति ऑन लाइन)


कुम्हारटोली (Kumartuli) में काम करने वाले कलाकारों और वहां से मिलने वाले रोजगार के आंकड़े मुख्य रूप से त्योहारों के सीजन (विशेषकर दुर्गा पूजा) के दौरान चरम पर होते हैं। इसके आंकड़े इस प्रकार हैं:

मुख्य कारीगरों (मूर्तिकारों) की संख्या: कुम्हारटोली में लगभग 450 से 500 मुख्य मूर्तिकार (Studio Owners/Master Craftsmen) हैं, जिनके अपने स्टूडियो या कार्यशालाएं हैं। इनमें लगभग 30 से अधिक महिला मूर्तिकार भी शामिल हैं।

कुल रोजगार (कुल कामगारों की संख्या): दुर्गा पूजा के सीजन के दौरान यहाँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 4000 से 5000 लोगों को रोजगार मिलता है।

इन कामगारों में केवल मूर्ति बनाने वाले ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के कुशल और अकुशल मजदूर शामिल होते हैं। इस रोजगार चक्र को हम निम्नलिखित श्रेणियों में देख सकते हैं:

मुख्य सहायक और कारीगर: मूर्तियों का ढांचा तैयार करने वाले (बांस और पुआल का काम करने वाले), मिट्टी का लेप लगाने वाले और रंगों से फिनिशिंग देने वाले कलाकार। ये ज्यादातर पश्चिम बंगाल के नादिया, मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना जिलों से सीजन के दौरान यहाँ आते हैं।

डाकर साज (डेकोरेशन) कलाकार: मूर्तियों के गहने, मुकुट, कपड़े और चमकीले साजो-सामान (शोला और जूट का महीन काम) बनाने वाले सैकड़ों लोग इसमें शामिल हैं।

परिवहन और लोडिंग मजदूर: तैयार मूर्तियों को सुरक्षित रूप से देश-विदेश और कोलकाता के विभिन्न पंडालों तक पहुँचाने वाले सैकड़ों मजदूर और टेम्पो , ट्रक , वैन चालक।

चूंकि कुम्हारटोली का अधिकांश काम असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) के तहत आता है, इसलिए यह संख्या सीजन (जून से अक्टूबर) के दौरान अधिकतम होती है और बाकी महीनों में यहाँ केवल स्थायी रूप से रहने वाले मुख्य परिवार ही काम करते हैं।

कोलकाता का यह ऐतिहासिक मूर्तिकला क्षेत्र बंगाल की धरोहर है, संकट में हैं। प्रशासन की अनदेखी और नीति असंगतियों ने कुम्हारटोली के इस असंगठित क्षेत्र में रोजगार के मौकों पर आशंका की छाया खड़ी कर दी है।

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प्रकाशित: 25 मई 2026 • 5 मिनट पठन

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