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गाय काटने पर पूर्ण प्रतिबंध की तत्काल सुनवाई- अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार।

केशव कुमार भट्टड़•27 मई 20264 मिनट पठन42 बार पढ़ा गया

संसद में पशुपालन मंत्री एसपी सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार की गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की कोई योजना नहीं है। गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने के लिए, जिस कानून के तहत बाघ और मोर को क्रमशः राष्ट्रीय पशु और राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिया गया है, उसी कानून के तहत इसे मान्यता देने की बात उठती है। राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की जिम्मेदारी वन मंत्रालय की है।

यदि गाय को राष्ट्रीय पशु बना दिया गया, तो पूरे भारत में बाघ की तरह गाय के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी। इससे गाय के माँस (बीफ) निर्यात का जो बड़ा कारोबार चलता है, उसे बंद करना पड़ेगा। केंद्र के पूर्व कानून सचिव आर. के. मल्होत्रा ने गाय की रक्षा का कानून बनाने पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि गाय की रक्षा का कानून बनाने से पहले सभी पहलुओं को देखना जरूरी है। कानून क्यों बनाया जाना चाहिए, और कानून बनने पर उसके सामाजिक व आर्थिक क्या परिणाम होंगे, इस पर विचार किया जाना चाहिए। वास्तव में इन कानूनों का कोई उत्पादक मूल्य (प्रोडक्टिव वैल्यू) नहीं है, बल्कि सिर्फ एक प्रतीकात्मक मूल्य है। संविधान के अनुच्छेद 48 के अनुसार गाय की रक्षा से जुड़ा मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसमें केंद्र का कोई एक समान कानून लागू नहीं होता है। यही वजह है कि कुछ राज्यों ने अपने स्वयं के कानूनों के तहत गाय को काटने पर प्रतिबंध लगा रखा है, जबकि कुछ राज्यों में गाय को काटने पर कोई रोक नहीं है। पश्चिम बंगाल ने उन गायों को काटने के योग्य माना है जो दूध नहीं देती हैं और एक निश्चित उम्र पार कर चुकी हैं।

गाय काटने पर पूर्ण प्रतिबंध की तत्काल सुनवाई-  अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार।

'गाय काटने' पर पूर्ण प्रतिबंध की तत्काल सुनवाई-

अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार।

नई दिल्ली, 26 मई- सुप्रीम कोर्ट ने गाय काटने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की तत्काल सुनवाई की याचिका स्वीकार नहीं की। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि बकरीद की पूर्व संध्या पर गाय काटने को लेकर तत्काल सुनवाई संभव नहीं है। इस संबंध में पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, "आपको बकरीद के ठीक एक दिन पहले ही यह मामला बेहद जरूरी लगा! ठीक है, यह कोई आपातकालीन (तत्काल सुनवाई का) मामला नहीं है। इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।"

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गौरतलब है कि अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से वकील वरुण सिन्हा ने गाय काटने पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगाने के लिए तत्काल आधार पर सुनवाई की याचिका दायर की थी। सिन्हा ने कहा, "परसों बकरीद है। इसलिए हम तत्काल आधार पर गाय काटने पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। अतः आपातकालीन सुनवाई के लिए इसे कल की सूची में शामिल किया जाए।" लेकिन हिंदू महासभा की इस तत्काल सुनवाई की याचिका पर पीठ ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।

इधर, पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से हिंदुत्ववादियों की सक्रियता बढ़ गई है। बकरीद के मुहाने पर वे एक बार फिर गाय काटने का मुद्दा सामने ले आए हैं। हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने अपनी याचिका के जरिए गाय काटने पर प्रतिबंध लगाने का अभियान शुरू किया है। इस दिन उन्होंने अदालत में इस तत्काल सुनवाई की अर्जी लगाई। उन्होंने विभिन्न राज्य सरकारों को गाय काटने पर प्रतिबंध लगाने के लिए नोटिस जारी करने की भी मांग की।

उल्लेखनीय है कि मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की ओर से गाय की रक्षा के लिए गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग उठी थी। हालांकि, संसद में पशुपालन मंत्री एसपी सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार की गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की कोई योजना नहीं है। गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने के लिए, जिस कानून के तहत बाघ और मोर को क्रमशः राष्ट्रीय पशु और राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिया गया है, उसी कानून के तहत इसे मान्यता देने की बात उठती है। राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की जिम्मेदारी वन मंत्रालय की है।

यदि मान लिया जाए कि गाय को राष्ट्रीय पशु बना दिया गया, तो पूरे भारत में बाघ की तरह गाय के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी। इससे गए के मांस (बीफ) निर्यात का जो बड़ा कारोबार चलता है, उसे बंद करना पड़ेगा।

हालांकि, केंद्र के पूर्व कानून सचिव आर. के. मल्होत्रा ने गाय की रक्षा के लिए कानून बनाने पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि गाय की रक्षा का कानून बनाने से पहले सभी पहलुओं को देखना जरूरी है। कानून क्यों बनाया जाना चाहिए, और कानून बनने पर उसके सामाजिक व आर्थिक क्या परिणाम होंगे, इस पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तव में इन कानूनों का कोई उत्पादक मूल्य (प्रोडक्टिव वैल्यू) नहीं है, बल्कि सिर्फ एक प्रतीकात्मक मूल्य है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 48 के अनुसार गाय की रक्षा से जुड़ा मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसमें केंद्र का कोई एक समान कानून लागू नहीं होता है। यही वजह है कि कुछ राज्यों ने अपने स्वयं के कानूनों के तहत गाय काटने पर प्रतिबंध लगा रखा है, जबकि कुछ राज्यों में गाय को काटने पर कोई रोक नहीं है। पश्चिम बंगाल ने उन गायों को काटने के योग्य माना है जो दूध नहीं देती हैं और एक निश्चित उम्र पार कर चुकी हैं।

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स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति 27 मई 2026

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गाय काटने पर पूर्ण प्रतिबंध की तत्काल सुनवाई- अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार।

प्रकाशित: 27 मई 2026 • 4 मिनट पठन

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