हौसले और बेबाकी (जीतने की होड़ ) का दूसरा नाम - 'अनीक दत्त'
- दीपान्विता मुखर्जी घोष
सोलह साल के फिल्मी करियर में सिर्फ सात फिल्में। इतनी कम फिल्में क्यों?- “क्या मैं कोई कारखाना हूँ, जो लगातार फिल्में बनाता जाऊं? और फिल्म बनानी ही होगी, ऐसी कसम तो मुझे किसी ने नहीं दिलाई।” - यही निर्देशक अनीक दत्त थे। बिल्कुल अलग और स्वतंत्र।
उनकी पहली फिल्म 'भूतेर भबिश्यत' (भूतों का भविष्य) ने तहलका मचा दिया था। जिस भाषा और शैली में उन्होंने यह फिल्म बनाई थी, वैसा बांग्ला सिनेमा में पहले किसी ने नहीं देखा था। उसमें फूहड़पन नहीं, बल्कि उच्च स्तर का व्यंग्य और हास्य था। बेहतरीन बांग्ला फिल्मों की सूची में 'भूतेर भबिश्यत' को कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 'कदलीबाला', 'हाथकाटा कार्तिक', 'पोंद प्रधान' जैसे किरदार बंगाल के आम जनजीवन का हिस्सा बन गए। 'आश्चर्य प्रदीप', 'मेघनादवध रहस्य', 'भबिश्यतेर भूत', 'वरुणबाबुर बंधु'... अनीक की फिल्म का मतलब ही था बुद्धिमानी और तंज (सारकाज्म)। निर्देशक अतनु घोष कह रहे थे, “अनीक दा की फिल्मों में पुराने बंगालीपन का मिजाज मिलता था। वह बेहद बौद्धिक थे, और यह उनकी फिल्मों में बहुत स्वाभाविक रूप से आता था। विज्ञापन की दुनिया से जुड़े होने के बावजूद, उनके सिनेमा में वह बनावटीपन नहीं होता था।”
अनीक अपनी फिल्मों में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं का बड़े तीखे अंदाज में विश्लेषण करते थे। कभी-कभी यह विश्लेषण एकतरफा भी हो जाता था। वह खुद इस बात को जानते थे और स्वीकार भी करते थे। तृणमूल कांग्रेस सरकार के कोप (नाराजगी) के कारण उनकी फिल्म 'भबिश्यतेर भूत' का प्रदर्शन रोक दिया गया था। “मैं उनके खिलाफ बोलूंगा ही। सिनेमा में भी, और जुबान से भी। मेरी फिल्म को रोककर मुझे खामोश नहीं किया जा सकता,” - यह बात अनीक ने 'एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स' के सामने विरोध प्रदर्शन के मंच से कही थी। तब उनके बगल में दिग्गज अभिनेता सौमित्र चटर्जी बैठे थे।
अनीक जीवन भर वामपंथी (लेफ्टिस्ट) रहे। उनके सोशल मीडिया पर लाल रंग के प्रति उनका प्यार साफ दिखता था। उनकी फिल्मों में नक्सल दौर का संदर्भ (रेफरेंस) जरूर होता था। वह कहते थे, “मैं उस दौर को लेकर जुनूनी (ऑब्सेस्ड) हूँ।”
वह सत्यजीत राय को लेकर भी बेहद जुनूनी थे। 'पाठभवन' स्कूल और 'सेंट जेवियर्स' कॉलेज के इस पूर्व छात्र का विज्ञापन की दुनिया में आना और बाद में फिल्मों में कदम रखना, सत्यजीत राय की वजह से ही था। यहाँ तक कि वे सत्यजीत राय के चित्र बनाने (ड्राइंग) के स्टाइल की भी नकल करते थे। फिल्म ‘अपराजित’ सत्यजीत राय के प्रति उनकी श्रद्धांजलि थी। उनकी अगली फिल्म ‘जतो कांडो कोलकातातेई ’ (सारे कांड कोलकाता में ही) में भी उनके प्रिय 'मानिक दा' (सत्यजीत राय ) की छाप थी। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान अनीक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। वे कहा करते थे कि यह उनकी आखिरी फिल्म होगी। किसे पता था कि उनकी कही यह बात इस तरह सच हो जाएगी!
अनीक की मौत ने उनके सहकर्मियों और दोस्तों को स्तब्ध कर दिया है। उनके सुसाइड (आत्महत्या) की खबर ने सबको गहरा झटका दिया है। 90 के दशक की शुरुआत से ही निर्देशक अनिरुद्ध रायचौधरी के साथ अनीक की गहरी दोस्ती थी। उन्होंने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर 'ब्लैक मैजिक' नाम की एक संस्था भी खोली थी। वे कुछ अलग तरह का काम करना चाहते थे। दोनों ने ही अपने करियर की शुरुआत में विज्ञापन बनाए और फिर निर्देशन में आए। अनिरुद्ध ने कहा, “खबर सुनने के बाद से मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ। अनीक क्यों सुसाइड करेगा! वह बंगाल का एकमात्र जुझारू फिल्ममेकर था, जिसने बार-बार प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई, वैसा और कोई नहीं कर सका।”
अनीक का कोई मुखौटा नहीं था। किसी की फिल्म अच्छी या बुरी जैसी भी लगती, वे सीधे मुँह पर बोल देते थे। इंडस्ट्री में उनके गुस्से और डांट-फटकार को लेकर कई कहानियां मशहूर हैं। लेकिन वही इंसान इंडस्ट्री के नए निर्देशकों को बहुत शांति से बैठकर उनकी फिल्मों की अच्छी-बुरी बातें समझाता था।
'कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव' के दौरान 'नंदन' में बैठकर उन्होंने ममता बनर्जी का विरोध किया था। उन्होंने सवाल उठाया था कि 'नंदन 'जैसी सांस्कृतिक जगह पर चारों तरफ ममता बनर्जी की तस्वीरें क्यों टंगी होनी चाहिए? 'भबिश्यतेर भूत' के हर हिस्से में उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार की घटनाओं को उजागर किया था। इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा। शूटिंग के दौरान उन्हें रोका गया। जरूरी अनुमतियां नहीं मिलती थीं। उनकी फिल्मों को सरकारी सिनेमाघर नहीं मिलते थे। रिलीज के शुरुआती दिनों में 'अपराजित' को नंदन में जगह नहीं मिली थी। जनता के भारी विरोध को देखकर कुछ दिनों बाद उसे वहाँ जगह दी गई।
हाल के दिनों में बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में अनीक दत्त एकमात्र ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने अपनी फिल्मों में बिना किसी हिचकिचाहट के दो-टूक राजनीतिक विचार रखे। वे कहते थे, “इतना डरने से काम नहीं चलता। मैं उनके पुरस्कार या तिरस्कार,किसी की परवाह नहीं करता।” इंटरव्यू के दौरान भी वे बिना किसी औपचारिकता के बेहद बेबाक रहते थे।उन्होंने कहा था,“क्या हम भिखारी हैं,जो लोगों से कहेंगे कि हमारी फिल्म के समर्थन में खड़े हों?”
प्रसिद्ध कवि शक्ति चट्टोपाध्याय ने लिखा था, “तुम चले गए, जीतने की होड़ चली गई...।” अनीक दत्त उसी होड़ की हिम्मत और बेबाकी का दूसरा नाम थे।
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