मशहूर संगीतकार देबज्योति मिश्र की जुबानी: '
अनीक के जाने से बंगाली मेधा का एक युग खत्म हो गया'
कोलकाता: मशहूर बांग्ला फिल्म निर्देशक अनीक दत्त के निधन से न केवल सिनेमा जगत, बल्कि कला और बौद्धिक जगत को भी एक गहरा सदमा लगा है। उनके सबसे करीबी मित्रों में से एक संगीतकार देबज्योति मिश्र ने अपने प्रिय साथी को याद करते हुए एक बेहद भावुक संस्मरण साझा किया है। उन्होंने बताया कि अनीक सिर्फ एक फिल्मकार नहीं थे, बल्कि उनके भीतर पुराना कोलकाता साँस लेता था।
पेश है देबज्योति मिश्र के शब्दों में उनके प्रिय मित्र की यादें:
मेरे जीवन के 'लार्जर दैन लाइफ' नायक थे अनीक
मेरे लिए अनीक की सबसे पहली और बुनियादी पहचान यही है कि वह मेरे सबसे अजीज दोस्तों में से एक थे। वह मेरे लिए किसी फिल्मी नायक जैसे थे— सही, गलत और तमाम खूबियों-खामियों से सजे, 'लार्जर दैन लाइफ' (जीवन से भी बड़े) इंसान। आने वाली पीढ़ियां उन्हें हमेशा एक मिसाल के तौर पर याद रखेंगी।
मैं अनीक को हमेशा एक बेहद ईमानदार और बेबाक इंसान के रूप में याद रखूंगा, जिसमें सीधी बात को बिना किसी लाग-लपेट के सीधे कहने का माद्दा था। वक्त के साथ मैं सिर्फ उनका नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार का हिस्सा बन गया। उनकी पत्नी तुतुल का दोस्त और उनकी बेटी को अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देखने वाला एक गवाह।
अनीक की माँ मुझसे बेपनाह मोहब्बत करती थीं। मुझे याद है जब मैं अपने संघर्ष के दिनों से गुजर रहा था, तो मेरा जब मन करता मैं अनीक के घर चला जाता। दोपहर को बिना खाना खिलाए मौसी जी मुझे कभी घर से निकलने नहीं देती थीं। मेरे जीवन के सबसे कठिन दौर में अनीक चुपचाप मेरे साथ खड़े रहे, और इस बात की भनक उन्होंने बाहर की दुनिया में किसी को लगने तक नहीं दी।
सत्ता के सामने कभी नहीं झुकाया सिर
मैंने शुरुआत से ही देखा था कि अनीक अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर बेहद स्पष्ट और मजबूत थे। सत्ता में बैठी सरकार के खिलाफ खड़े होकर जो बातें अनीक ने खुलकर कहीं, वैसी हिम्मत इस शहर का कोई दूसरा कलाकार नहीं दिखा सका। मैंने उन्हें कभी भी अन्याय या किसी ताकत के सामने घुटने टेकते नहीं देखा। इस मामले में वह एक दुर्लभ इंसान थे। उनकी फिल्मों में जो गजब का हास्य (ह्यूमर) और तीखी समझ दिखती थी, वह भी हर किसी के बस की बात नहीं।
विज्ञापनों से लेकर फिल्मों तक का सफर
पिछले कुछ समय से अनीक एक अजीब सी उदासी और अकेलेपन की दुनिया में घिरे हुए थे। इस दौरान हमारी ढेरों बातें होती थीं। कभी मैं उन्हें डांट देता, तो कभी वह मुझ पर बरस पड़ते। लेकिन इस नोक-झोंक के बाद भी हम फिर से वहीं खड़े मिलते, जहाँ से हमारी दोस्ती शुरू हुई थी। हमने साथ में 150 से 200 विज्ञापनों और 5 फिल्मों में काम किया। वह सिर्फ फिल्में या विज्ञापन नहीं बनाते थे, बल्कि अपनी कला के जरिए उस दौर के समय को कैमरे में कैद कर लेते थे। पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत (वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक) को लेकर उनका मुझ पर अटूट भरोसा था। उनके लिए वेस्टर्न क्लासिकल का मतलब सिर्फ 'देबू' (देबज्योति) था।
"कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके चले जाने से पूरा शहर सूना हो जाता है। अनीक के भीतर एक पुराना, गरिमामयी कोलकाता बसता था। जो लोग वक्त के साथ कहीं खो गए, उनके प्रति अनीक के मन में एक गहरी संवेदना थी, जो उनकी फिल्मों के किरदारों में भी साफ झलकती थी।"
एक अपूरणीय क्षति
अनीक के जाने से मैंने न सिर्फ अपना एक सच्चा दोस्त खोया है, बल्कि यह बंगाली बुद्धि, मेधा और मिजाज की भी एक ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। इस दुख का बोझ मैं ता-उम्र अपने सीने पर लेकर चलूंगा। मैं आत्मा या पुनर्जन्म जैसी चीजों पर भरोसा नहीं करता, और अनीक भी नहीं करते थे। लेकिन आज न जाने क्यों दिल कह रहा है कि उनकी आत्मा को शांति मिले। अनीक की बेटी मेरी अपनी बेटी जैसी है। बस यही दुआ है कि ईश्वर उसे इस गहरे दुख को सहने की शक्ति दे।
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