बयालिस के पांच शहीद !
सुधीर विद्यार्थी
अगस्त 9, 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन की घोषणा से पहले ही गांधी समेत कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को जेल में डाल देने से अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्वविहीन जनता संगठित होकर साम्राज्यवाद का मुकाबला नहीं कर सकेगी. उस समय आजादी के लिए देश में उठने वाले ज्वार को समझ पाना उनके लिए संभव नहीं था. लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल आए और क्रांतिकारी शक्तियों ने जगह-जगह उनका नेतृत्व संभाल लिया. आंधी ऐसी चली जिसे संभालना कठिन हो गया. इस आंदोलन में जगह-जगह नए लोग उभरे और उन्होंने संघर्ष की बागडोर को मजबूती से अपने हाथों में ले लिया. बयालिस की इस मुंडेर पर आकर गांधी 'करो और मरो' का नारा दे चुके थे. यह मुल्क की आजादी के लिए करने और मरने का आह्वान था.
देखने की बात है कि 1921 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में उत्तेजित जनता ने थाने को घेर कर उसमें आग लगा दी थी और कई सिपाही जल कर मर गए थे. तब 'हिंसा' का सवाल उठा कर गांधी ने वेगवान असहयोग की आंधी को एकाएक ब्रेक लगा दिया था. इससे उनके अनेक सहयोगी नाराज और हताश हो गए थे. उनमें मोती लाल नेहरू, चितरंजन दास और जवाहर लाल भी थे. उस समय उनके इस कदम से सबने अपने को ठगा और असहाय महसूस किया. लेकिन सन 42 में आकर गांधी वैसा नहीं कर सके. 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान टेलीफोन के तार काटने, डाकखाने फूंक देने और रेल की पटरियों को क्षति पहुंचाने जैसे सर्वथा अ-गांधीवादी तरीकों की खबरें भी जेल के भीतर उन्हें विचलित नहीं कर सकीं. वे एक बार भी आंदोलन वापसी की घोषणा करने का साहस नहीं कर सके. हां, यह जरूर हुआ कि जेल के भीतर से उनकी आंखों ने जेल के बाहर चल रहे संग्राम के जिस क्रांतिकारी चित्र को देखा तो उसके पितृत्व से ही उन्होंने इंकार कर दिया. यहां 1921 और 1942 के गांधी का अंतर साफ तौर पर चीन्हा जा सकता है. गांधी बदल गए थे या फिर वे अपनी उस असमर्थता को समझ गए थे कि इस बार आंदोलन की डोर को पीछे की ओर ले जाना उनके बस की बात नहीं रह गई है. बयालिस का संघर्ष देश भर में हर क्षण विस्तारित होकर अपने ढंग से संचालित होता रहा.
मुझे याद है कि 1989 को किसी रोज सहारनपुर में कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने अपने आवास पर एकाएक मुझसे कहा था कि मैंने बयालिस के आंदोलन पर कुछ नहीं लिखा ? मैंने जवाब में कहा कि 'भारत छोड़ो' के उस देशव्यापी संघर्ष का मेरा आकलन यह है कि आह्वान के तुरंत बाद वह आंदोलन क्रांतिकारी शक्तियों के हाथों में जाकर सर्वथा नया आकार और रूप लेता चला गया. उसके लिए जगह-जगह स्वतःस्फूर्त नेतृत्व उभरा और उसका चरित्र कतई गांधीवादी ढंग का नहीं था. उन्होंने तुरंत ही पीछे की ओर हाथ से इशारा करके मुझसे कहा, 'अलमारी के इस नीचे वाले खाने में बयालिस पर सामग्री रखी है. इसे ले जाओ और लिखो, उनके कहने के बाद भी मैं वैसा नहीं कर सका और तीन साल का समय गुजर गया.
फुलेना प्रसाद
बयालिस के आंदोलन की अर्द्धशती पर कांग्रेस इस आंदोलन को समग्रता से याद करने और उसे रेखांकित करने से चूक गई. उस साल अगस्त के महीने में बाबा नागार्जुन हमारे शाहजहांपुर वाले घर में ठहरे हुए थे. एक रोज मुझसे बोले, 'तुम 9 अगस्त को शहर में बयालिस पर एक जलसा करो.' हमने एक पत्रक छपवाया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नागार्जुन थे. वे उस इतिहास पर बोले कुछ नहीं, सिर्फ श्रोता रहे. लेकिन उनकी उपस्थिति से आयोजन को अभूतपूर्व गरिमा मिली थी.
मैंने खास तौर पर यह रेखांकित किया कि बयालिस की क्रांति के उन पांच शहीदों के बलिदान को कतई विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. इनमें एक थे फुलेना प्रसाद. 16 अगस्त को महाराजगंज में सड़क पर प्रदर्शन के दौरान उन्होंने नौ गोलियां खाई. लेकिन जुलूस में साथ चल रहीं उनकी पत्नी तारारानी ने झंडा गिरने नहीं दिया. वे सीवान जिले के बाल बंगरा गांव के थे. उनकी शहादत के कई साल बाद बनारसी दास चतुर्वेदी ने इन्हीं तारारानी से फुलेना प्रसाद की संक्षिप्त आत्मकहानी लिखवा कर छोटे कलेवर में छपवा दिया था. इसमें उनकी व्यथा-कथा का भी अनोखा प्रतिबिंब है.
हेमू कालाणी
दूसरे थे सिंध प्रांत के क्रांतिकारी हेमू कालाणी जो 19 साल की उम्र में सक्खर की जेल में 21 जनवरी, 1943 को फांसी पर चढ़ा दिए गए. वे 'स्वराज्य सेना' और कांग्रेस से जुड़े स्थानीय युवा संगठनों में बड़े सक्रिय थे. बयालिस में उन्हें सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना की एक खास ट्रेन हथियारों और सैनिकों से लैस सक्खर से गुजरने वाली है जिनका इस्तेमाल 'भारत छोड़ो' आंदोलन को दबाने के लिए किया जाने वाला है. उन्होंने अपने साथियों को लेकर उसे रोकने और उस ट्रेन को अपने मुकाम तक न पहुंचने देने की योजना बना ली. इसके लिए उन्होंने रेलवे लाइन की फिश प्लेटें खोलने का प्रयास किया. इस कार्रवाई के दौरान पुलिस और रेलवे गार्ड को संदेह हो गया. हेमू पकड़े गए जबकि उनके साथी बच निकले. ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें कठोर यातनाएं दीं. पर उन्होंने अपने साथियों के नाम नहीं बताए, उन पर राजद्रोह और अंग्रेज सैन्य अभियान को नुकसान पहुंचाने का मुकदमा चला. पहले आजीवन कारावास की सजा मिली. लेकिन बाद में उन्हें मृत्युदंड दिया गया.
सिंध के अनेक प्रतिष्ठित लोगों ने दया याचिका देने की कोशिश की. इन लोगों में कराची के तत्कालीन मेयर, धार्मिक नेता और शिक्षाविद् भी थे. लेकिन हेमू ने इनमें कोई रुचि नहीं दिखाई. फांसी से पहले उन्होंने 'भारत माता की जय', 'यूनियन जैक मुर्दाबाद' और 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगाया. उस दिन सिंध में हर कहीं शोक मनाया गया. स्कूल कॉलेज और बाजार बंद रहे. उनका बलिदान बयालिस के आंदोलन की उल्लेखनीय घटना है.
जवाहर लाल नेहरू ने 1943 में कहा था कि हेमू की फांसी का असर पूरे भारत के नौजवानों पर पड़ेगा. नेहरू जब 1945 में सिंध गए तो उन्होंने इस अमर शहीद की मां जेठा बाई से मुलाकात की थी. उन्होंने इस क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी मां के लिए वजीफा भी शुरू किया.बाद में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया था. सिंधी समाज में हेमू कालाणी को आज भी 'सिंध के भगत सिंह' कहा जाता है.
राजनारायण मिश्र
एक और नाम खीरी लखीमपुर में भीखमपुर गांव के राजनारायण मिश्र का है जो बयालिस में सशस्त्र विद्रोह को संगठित करते हुए 9 दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में शहीद भगत सिंह के आदर्शों को सामने रख कर फांसी पर झूल गए. उस समय उनके साथियों ने क्रांतिकारी दल के नेता योगेश चंद्र चटर्जी के नेतृत्व में 'रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी' (आरएसपी) जैसा विचारवान और जुझारू संगठन बना लिया था जिसमें झारखंडे राय जैसे समर्पित कम्युनिस्ट भी थे जो उनके साथ जेल में बंदी रहे. राजनारायण ने फांसी पर जाने से पहले अंतिम इच्छा प्रकट की थी कि वे जेल में सजा काट रहे अपने नेता योगेश दा के मंगाए नए वस्त्र पहन कर ही मृत्यु का वरण करेंगे. उन्होंने वैसा ही किया.
झारखंडे राय ने 1945 में शहीद राजनारायण पर एक छोटी किताब लिखी. इसे आरएसपी की उत्तर प्रदेश शाखा ने प्रकाशित किया था. इसकी कीमत डेढ़ रुपए रखी गई थी. बाद में मैंने भी राजनारायण की जीवनकथा को भीखमपुर की माटी में दर्ज किया जिसमें कुछ पन्नों में राजनारायण की लिखी आपबीती भी है. योगेश दा की आत्मकथा इन सर्च ऑफ फ्रीडम में राजनारायण की चर्चा है जिसे सामने रख कर समझा जा सकता है कि आजादी के लिए लड़े जाने वाले इस संग्राम के दौर में क्रांतिकारी शक्तियों की भूमिका क्या थी और इसमें उन्होंने कितनी कुर्बानियां दीं !
जगदीश प्रसाद वत्स
एक और नाम जगदीश प्रसाद वत्स का है जिन्हें 14 अगस्त 1942 के दिन हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर झंडा फहराने के समय पुलिस की गोली का निशाना बनाया गया. वे वहां आयुर्वेदिक कॉलेज के छात्र थे. उम्र थी 17 साल. शहादत के बाद सरकार ने उनका शव घर वालों को नहीं दिया. पुलिस ने उन पर रेलवे का पैसा लूटने का अरोप लगाया था. लेकिन जज ने इस बात को स्वीकार नहीं किया.नेहरू ने आजादी से पहले शहीद वत्स के परिवार को एक ट्राफी भेजी जिस पर लिखा थाः दिस ट्राफी इज अवार्डेड टु वत्स फैमिली ऑफ खजूरी अकबरपुर इन मेमोरी ऑफ श्री जगदीश प्रसाद वत्स मार्टियर हू वाज शाट डेड इन पुलिस स्ट्रगल ऑफ 1942 एट हरिद्वार.
हरिद्वार के आयुर्वेदिक कॉलेज के प्रांगण में वहां के ऋषिकुल स्नातक संघ की ओर से अपने शहीद साथी वत्स की एक प्रतिमा 22 दिसंबर 2004 को स्थापित कर दी गई है. हैरत की बात है कि हरिद्वार रेलवे स्टेशन के परिसर में इस समय अनेक हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का बोलबाला है जबकि वहां शहीद वत्स का बुत नहीं है.
लाल पद्मधर सिंह
अब हम इलाहाबाद के शहीद छात्र लाल पद्मधर सिंह की कहानी पर आते हैं जिन्हें बयालिस के आंदोलन में हिस्सेदारी के चलते 12 अगस्त को एक जुलूस में गोली मार दी गई थी. मूल रूप से सतना-रीवा क्षेत्र के पालपुर गढ़ी क्षेत्र के रहने वाले पद्मधर इलाहाबाद में बीएससी के छात्र थे और हिंदू बोर्डिंग हाउस उनकी रिहायश थी.
बयालिस के आंदोलन की घोषणा होने पर जब इलाहाबाद में छात्र आंदोलन तेज हुआ तब एक बड़ा जुलूस कलेक्ट्रेट कचहरी पर तिरंगा फहराने के मकसद से आगे बढ़ा जिसमें लाल पद्मधर सिंह आगे थे. पुलिस ने रास्ता रोकने की कोशिश की और गोली भी चलाई. लेकिन वे भारत माता की जय और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए आगे बढ़ते रहे. तभी एकाएक एक गोली पद्मधर के सीने में आकर लगी और वे वहीं घायल होकर शहीद हो गए. उस समय उनके हाथ में तिरंगा था. बताया जाता है कि यह गोली पुलिस अधिकारी आगा ने चलाई थी. इलाहाबाद के इतिहास में यह घटना उल्लेखनीय हो गई. उनका प्राणांत हुआ तब वे 21 साल से कुछ ही अधिक के थे.
इस घटना का उल्लेख नयनतारा सहगल और फिरोज गांधी ने भी अपने संस्मरणों में किया है. छात्र आंदोलन पर श्याम कृष्ण पांडेय की किताब में भी लाल पद्मधर सिंह की शहादत का वर्णन है. जानने योग्य यह है कि बयालिस में इलाहाबाद का मुक्ति-संघर्ष एक तरह से छात्रों ने ही संचालित किया था.
12 अगस्त को शहर में निकले जुलूस में नयनतारा और नेहरू परिवार की औरतें मौजूद थीं. इसका साक्ष्य है नयनतारा की आत्मकथात्मक पुस्तक प्रिजन एंड चॉकलेट केक. लेकिन उसमें मुख्यतः नेहरू परिवार, आनंद भवन और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण की सरगर्मियों का उल्लेख है. वहां प्रसंगवश ही बयालिस के घटनाक्रम का विवरण देखने को मिल पाता है. लेकिन इलाहाबाद की लोकस्मृति में लाल पद्मधर सिंह की शहादत को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन के बाहर इस शहीद की प्रतिमा लगी है जो वर्तमान में भी छात्र आंदोलन की चेतना को तरंगित करती है. इस मामले में 2023 में एक विवाद सामने आया जब लाल पद्मधर सिंह के भतीजे सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर भूपेंद्र सिंह ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिख कर कहा कि शहीद की प्रतिमा उनके चेहरे से मेल नहीं खाती है. उन्होंने प्रस्ताव दिया कि उनके परिवार की ओर से उपलब्ध कराए जा रहे चित्र के आधार पर नई प्रतिमा की पुनर्स्थापना हो. इस प्रतिमा के नीचे लगे पत्थर पर लिखा गया हैः 'मृत्योगी अमृत गमय (लीड मी फ्रॉम डेथ टू इम्मोर्टलिटी ) अगस्त, 1942 के स्वतंत्रता संग्राम की अमर ज्योति, श्री लाल पद्मधर सिंह की पुण्य स्मृति में. जन्म 14 अक्टूबर, 1913, निधन 12 अगस्त, 1942 सभापति राजा बक्स सिंह 1959'. सतना शहर में भी उनकी एक प्रतिमा शहीद पद्मधर सिंह शासकीय महाविद्यालय में स्थापित है.
कितनी अजब बात है कि 2025 में लाल पद्मधर सिंह के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन को दिन के 11 बजे से लेकर दोहपर 1 बजे तक खुलवाने की मांग यहां के नागरिकों और पूर्व छात्रों को करनी पड़ी जिनमें शामिल थे विनोद चंद दुबे, श्याम कृष्ण पांडेय, सतीश अग्रवाल, अनुग्रह नारायण सिंह, के के राय, कृष्णमूर्ति यादव, हेमंत कुमार टुन्नू, अजीत यादव, अंशुमन मित्र, आर पी एन सिंह, प्रभाकर भट्ट, सुरेश यादव, दिनेश यादव, एस पी पांडेय, अखिलेंद्र प्रताप सिंह, संजय तिवारी, रामाधीन सिंह, राकेश धर त्रिपाठी, निर्भय पटेल, रोहित मिश्रा, ऋचा सिंह, अवनीश यादव, उदय यादव, निर्भय द्विवेदी, शिवम सिंह, अखिलेश यादव, अदील हमजा, विक्रांत सिंह, अजय सम्राट आदि.
इलाहाबाद के जिला और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस शहीद को याद करने के लिए विद्यार्थियों और लोगों को संघ भवन में जाने पर बंदिश लगाना उसकी इतिहास विरोधी और उपनिवेशवादी मानसिकता का सबूत है. जनभावनाओं की इस तरह की अनदेखी अक्षम्य है. प्रयास यह भी किया गया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन के प्रवेश द्वार का नाम इस शहीद के नाम पर रखा जाए,शहीद लाल पद्मधर सिंह हमारे इतिहास के गौरव हैं. मुझे नहीं पता कि उनके सम्मान में कितने कवियों ने जयगान रचे और गाए, किसी की लिखी एक आधी-अधूरी पंक्ति मेरे भीतर गूंजती हैः जिन्हें नहीं था मौत का डर, वह थे लाल पद्मधर! इलाहाबाद के गीतकार यश मालवीय ने भी कहा थाः जिनके दम पर देश की है होली और ईद। लाल पद्मधर की तरह जिंदा कौन शहीद !
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लेखक स्वतंत्र लेखन और संस्कृति कर्म से जुड़े हैं और साहित्य विचार की पत्रिका संदर्श के संपादक प्रकाशक हैं.
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