' वेल डन अब्बू '
रसेल अज़ीज़

वेल डन अब्बू।
अब्बू, इस तस्वीर को पहली बार देखने पर लगेगा कि इसमें ऐसा कुछ खास नहीं है। तुम अपने जन्मदिन पर केक काट रहे हो। लेकिन इसी तस्वीर में तुम्हारे जीवन की पूरी झलक छिपी हुई है।
तुम अपने जन्मदिन पर सुबह उठे, तुम्हारे 'बच्चों' ने तुम्हें विश किया, तुम हाथ-मुंह धोकर चाय पीने बैठे और तुम्हारी अनिच्छा के बावजूद तुम्हारे सामने जन्मदिन मनाने के लिए केक रख दिया गया। तुमने उसे काटने के लिए जैसे ही छुरी उठाई, वैसे ही फोन बज उठा। देखो, तस्वीर के दाईं तरफ फोन की लाइट जल रही है। और उसी पल अब्बू को फिर से लौट जाना पड़ा कमरेड मोहम्मद सलीम की दुनिया में।
यह सुबह से पहली बार नहीं था। अब तक कम से कम 15-20 फोन आ चुके थे। या तो तुमने उठाए, या खुद वापस किए। दिनभर में तो सैकड़ों फोन आते हैं। उसके ऊपर, सुबह 10 बजे के बाद तो तुम 'अब्बू' को अलमारी में संभालकर रख देते हो और कमरेड मोहम्मद सलीम बनकर निकल पड़ते हो। पार्टी ऑफिस, जिला मीटिंग, जीबी (जनरल बॉडी), जनसभा, कन्वेंशन, स्मरण सभा, फ्रैक्शन... कोलकाता में रहने पर जब तुम घर लौटते हो, तब मां रात के खाने के लिए तुम्हारा इंतजार कर रही होती है। 'बच्चे' तब या तो सो रहे होते हैं, या सोने की तैयारी कर रहे होते हैं। अब 'बच्चे' और 'बच्चे' नहीं रहे, अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हैं। लेकिन एक समय था जब वे वाकई बच्चे थे। स्कूल से आना, शाम को खेलना, शाम को पढ़ाई करना, और रात को KBC देखते-देखते खाना खाकर सो जाना। लेकिन तुम्हारा रूटीन नहीं बदला। अब्बू को घर पर थोड़ा अनुपस्थित रहना ही पड़ता था, ताकि कमरेड मोहम्मद सलीम लोगों के बीच उपस्थित रह सकें।
लेकिन क्या सच में तुम अनुपस्थित थे? क्योंकि आज जब मैं अपने बचपन की ओर मुड़कर देखता हूँ, तो तुमने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि हमारे बड़े होने में हमारे अब्बू की भूमिका कम थी। क्योंकि तुम हर मुश्किल समय में साथ खड़े रहे, हर खुशी के पल में लाड़-प्यार दिया। जिंदगी में हमने जो कुछ भी सीखा, जो किया, जो सोचा, जो कहा—उसका ज्यादातर हिस्सा तुम्हारी मौजूदगी से भरा है। तुमने हमें व्यक्तित्व दिया, लेकिन हमारे अस्तित्व को दबाया नहीं, बल्कि उसे पनपने की जगह दी। अपनी-अपनी लड़ाई अपने तरीके से लड़ने का हौसला दिया। जब हमसे गलती हुई, तो समझाया। जब हम गिरे, तो उठने का साहस दिया। जब हम टूट गए, तो हमें संभालकर खड़ा किया। इसलिए जब पीछे मुड़कर सब कुछ देखने का मौका मिलता है, तो मैं तुमसे बस यही कहना चाहता हूँ—
वेल डन अब्बू।
सेंट बार्नाबास से मौलाना आज़ाद कालेज होते हुए जादवपुर विश्वविद्यालय। छात्र फेडरेशन (SFI) से डक श्रमिक यूनियन होते हुए युवा फेडरेशन (DYFI)। वाटगंज के 14 नंबर से राज्यसभा, लोकसभा होते हुए आज अलीमुद्दीन स्ट्रीट। तुमने अपनी जान से भी प्यारी पार्टी की जिम्मेदारी तब संभाली जब समय बेहद कठिन था। जनप्रतिनिधित्व की कमी से भी ज्यादा चिंता की बात यह थी कि यह अंधेरा कब छंटेगा, इसकी अनिश्चितता थी। आज जब मैं चारों तरफ एक नई ऊर्जा से भरी पार्टी को देखता हूँ, जब देखता हूँ कि नौजवानों की एक टोली सत्ता की क्रूर नजरों की परवाह किए बिना लड़ाई की नई परिभाषा लिख रही है, जब देखता हूँ कि जो लोग पार्टी से निराश हो चुके थे, वे फिर से लाल झंडे को लेकर सपने देखने लगे हैं, तब मुझे लगता है कि तुम्हें इतना श्रेय तो मिलना ही चाहिए—
वेल डन अब्बू।
लेकिन तुम्हारा काम तो अभी बाकी है। अभी भी सुबह पार्टी ऑफिस जाना और देर रात घर लौटना जारी रहेगा। अभी भी हमारी बात न मानकर, अस्वस्थ शरीर के साथ तुम्हारा जिलों का दौरा करना जारी रहेगा। अभी भी बाइक पर बैठकर बगतटुई जाना, पुलिस को छकाकर समसेरगंज पहुंचना, और बांस का पुल पार करके बाढ़ पीड़ितों के बीच खड़े होना जारी रहेगा। अभी भी तुम्हारा सपना अधूरा है। क्योंकि पुनरुत्थान तो हो गया है, लेकिन सत्ता में वापसी (प्रत्यावर्तन) अभी बाकी है। उसे लड़कर पूरा करो। उसके बाद एक बार फिर कह दूंगा—
वेल डन अब्बू।
सब कुछ के लिए शुक्रिया और जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं।
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(लेखक आई आई टी खड़गपुर के पूर्व विद्यार्थी हैं)
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