वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंअतिथि लेखन

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

अतिथि लेखन

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में हिंदुओं को क्या लाभ? - शमीक लाहिड़ी

श्रेया जायसवाल•06 जून 20269 मिनट पठन20 बार पढ़ा गया

पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के नियम-कानूनों को जिस तरह कॉरपोरेट्स के हितों में बदलकर उन्हें फायदा पहुँचाया गया है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण अडानी ग्रुप के विभिन्न प्रोजेक्ट और विवादित 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (Environmental Impact Assessment) 2020 का मसौदा है। उदाहरण के लिए, पर्यावरणविदों के कड़े विरोध के बावजूद अडानी ग्रुप और सरकार के संयुक्त उपक्रम में 'ग्रेट निकोबार' जैसे संवेदनशील द्वीप पर मेगा-पोर्ट और पावर प्लांट के लिए करीब 10 लाख पेड़ काटने और आदिवासियों की जमीन के अधिग्रहण की मंजूरी रातों-रात दे दी गई। इसी तरह छत्तीसगढ़ का 'हसदेव आरांद' भारत के प्रमुख आदिवासी बहुल घने जंगलों में से एक है। अडानी ग्रुप की कोयला खदान (PEKB block) की सुविधा के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने आदिवासियों की ग्राम सभा की कानूनी सहमति के बिना जंगल के एक बड़े हिस्से में पेड़ काटने की अनुमति दी है।

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में हिंदुओं को क्या लाभ? - शमीक लाहिड़ी

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में हिंदुओं को क्या लाभ ?

शमीक लाहिड़ी

  (पिछले अंक के बाद)       

नियम-कानून ही बदल जाते हैं

आरोप हैं कि इन पूँजीपतियों को फायदा पहुँचाने के लिए रातों-रात टेंडर के नियम बदल दिए गए, पर्यावरण सम्बंधी मंजूरियों को ढीला कर दिया गया और सरकारी बैंकों से हजारों करोड़ रुपये के लोन दिलवाए गए। बाद में इस कर्ज का एक बड़ा हिस्सा 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट' (NPA) या डूबते कर्ज के रूप में बट्टे खाते (Rightoff में डाल दिया गया, जो वास्तव में आम करदाताओं का पैसा है।

आम जनता का पैसा कॉरपोरेट की जेब में

क्रोनी कैपिटलिज्म का सबसे बड़ा फायदा यह है कि 'मुनाफा हो तो वह पूँजीपति की निजी संपत्ति है, और नुकसान हो तो उसकी जिम्मेदारी आम जनता की।' भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में पिछले एक दशक में यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए आंकड़ों और संसद में सरकार के आधिकारिक बयानों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में भारत के बैंकों ने—जिनमें से अधिकांश सरकारी बैंक हैं—10.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज 'राइट-ऑफ' यानी बट्टे खाते में डाल दिया है (खाते से मिटा दिया है)। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIBEA) की रिपोर्ट के अनुसार, इस माफ किए गए कर्ज का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 70-80 प्रतिशत देश के शीर्ष बड़े कॉरपोरेट घरानों और उद्योगपतियों की जेब में गया है। छोटे व्यापारियों या किसानों की कर्ज माफी की दर इसके मुकाबले बिल्कुल नगण्य है।

सरकार दावा करती है कि 'राइट-ऑफ' का मतलब कर्ज पूरी तरह से माफ करना नहीं है, उसे वसूलने की कोशिश जारी रहती है। लेकिन वास्तविक आंकड़े बताते हैं कि 'राइट-ऑफ' किए गए कर्ज में से केवल 13-15 प्रतिशत पैसा ही वसूल किया जा पाना संभव होता है। बाकी 85 प्रतिशत पैसा ये धनकुबेर कॉरपोरेट हजम कर जाते हैं, जिसे अंततः आम करदाताओं के पैसे से बैंकों में पुनर्पूंजीकरण (Re-capitalisation) करके चुकाना पड़ता है।

1. पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के नियम-कानूनों को जिस तरह कॉरपोरेट्स के हितों में बदलकर उन्हें फायदा पहुँचाया गया है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण अडानी ग्रुप के विभिन्न प्रोजेक्ट और विवादित 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (Environmental Impact Assessment) 2020 का मसौदा है। उदाहरण के लिए, पर्यावरणविदों के कड़े विरोध के बावजूद अडानी ग्रुप और सरकार के संयुक्त उपक्रम में 'ग्रेट निकोबार' जैसे संवेदनशील द्वीप पर मेगा-पोर्ट और पावर प्लांट के लिए करीब 10 लाख पेड़ काटने और आदिवासियों की जमीन के अधिग्रहण की मंजूरी रातों-रात दे दी गई। इसी तरह छत्तीसगढ़ का 'हसदेव आरांद' भारत के प्रमुख आदिवासी बहुल घने जंगलों में से एक है। अडानी ग्रुप की कोयला खदान (PEKB block) की सुविधा के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने आदिवासियों की ग्राम सभा की कानूनी सहमति के बिना जंगल के एक बड़े हिस्से में पेड़ काटने की अनुमति दी है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्तमान शासनकाल में औद्योगिक क्षेत्र में पर्यावरणीय मंजूरी मिलने की दर 92 प्रतिशत को पार कर गई है। यानी, पर्यावरण को नुकसान हो रहा है या नहीं, इसकी जांच करने के बजाय उद्योगपतियों को तेजी से मंजूरी देना ही सरकार का मुख्य लक्ष्य है।

2. अडानी ग्रुप को एकाधिकार का लाभ पहुँचाने के लिए सरकारी टेंडर के नियम रातों-रात कैसे बदल दिए जाते हैं, इसका सबसे अच्छा उदाहरण 2019 में भारत के 6 हवाई अड्डों के निजीकरण की घटना है। 2019 में जब अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और मैंगलोर हवाई अड्डों के निजीकरण का टेंडर निकाला गया, तब नीति आयोग और वित्त मंत्रालय ने लिखित में एक नियम लागू करने की सिफारिश की थी कि, 'किसी एक कंपनी को दो से अधिक हवाई अड्डे न दिए जाएं। क्योंकि इससे एकाधिकार नियंत्रण स्थापित होगा और सुरक्षा का जोखिम रहेगा।'

इससे पहले नियम था कि हवाई अड्डा संचालन के टेंडर में भाग लेने के लिए संबंधित कंपनी के पास विमानन (aviation) या बुनियादी ढांचा (infrastructure) निर्माण और प्रबंधन का पूर्व अनुभव होना अनिवार्य है। सरकार ने नीति आयोग के 'अधिकतम 2 हवाई अड्डे' देने के नियम को पूरी तरह खारिज कर दिया और अनुभव की अनिवार्यता को भी हटा दिया। परिणाम? हवाई अड्डा संचालन का शून्य अनुभव होने के बावजूद अडानी ग्रुप ने अकेले ही सभी 6 हवाई अड्डों का टेंडर जीत लिया। बाद में, देश के सबसे बड़े और सबसे अधिक मुनाफे वाले मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (MIAL) का स्वामित्व जीवीके (GVK) ग्रुप के हाथों से ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) जांच का दबाव बनाकर अडानी ग्रुप को सौंपने का आरोप भी लगा है।

क्रोनीइज्म के ये आंकड़े क्या साबित करते हैं? ये सभी आंकड़े और घटनाक्रम एक निश्चित ढर्रे को साबित करते हैं कि इसी भ्रष्टाचार के माध्यम से बड़े पूँजीपति सरकार से नाममात्र की कीमत पर सस्ती जमीन और खदानें पाते हैं। बैंकों से आम लोगों की जमा पूँजी का पैसा कर्ज के रूप में लेते हैं और उसी पैसे से विशाल साम्राज्य खड़ा करते हैं। यदि व्यवसाय घाटे में चला जाए या पैसा दूसरे देश में अवैध तरीके से ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सरकार उस कर्ज को माफ कर देती है। यही हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था के पीछे छिपे 'कानूनी लूट' का असली चेहरा है।

जब किसी देश का बुनियादी ढांचा केवल 2-3 लोगों के नियंत्रण में चला जाता है, तो प्रतिस्पर्धी बाजार नष्ट हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं विशेषकर मध्यम वर्ग और गरीबों को महंगी दरों पर सेवाएं खरीदनी पड़ती हैं, जिसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण भारत में टेलीकॉम और बिजली दरों में बेलगाम बढ़ोतरी है।

3. 2016 की नोटबंदी (Demonetisation) और 2017 में जल्दबाजी में जीएसटी (GST) लागू करना हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था के दो बड़े 'शॉक थेरेपी' थे। इन दोनों फैसलों का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था को 'फॉर्मल' या संगठित करना था, लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी रहे हैं। भारत में रोजगार का लगभग 80-90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र और लघु उद्योगों से आता है। नोटबंदी और जटिल जीएसटी ढांचे के कारण लाखों छोटे व्यवसाय बंद हो गए हैं। कॉरपोरेट कंपनियों ने इस अवसर का लाभ उठाकर छोटे व्यापारियों के बाजार पर कब्जा कर लिया है।

मध्यम वर्ग की कमाई का एक बड़ा हिस्सा आसमान छूती जीएसटी के कारण खर्च हो रहा है। आटा, चावल, दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स लगाने से गरीबों और निम्न-मध्यम वर्ग का जीवन जीना दूभर हो गया है। इससे प्रभावित सभी धर्मों के लोग हो रहे हैं, हिंदू होने के नाते किसी को कोई छूट नहीं मिल रही है।

४. बेरोजगारी और रोजगार

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में तथाकथित 'जीडीपी की वृद्धि' भले ही हो रही हो, लेकिन यह वास्तव में 'रोजगार विहीन विकास' (Jobless Growth) है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) और सरकारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर पिछले साढ़े चार दशकों में उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है, जो औसतन करीब 7-8 प्रतिशत है। शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की यह दर और भी भयावह है, जो लगभग 20-25 प्रतिशत है।

मध्यम वर्ग का मुख्य सहारा सरकारी नौकरियां और आईटी सेक्टर हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों जैसे रेलवे, बीएसएनएल और सरकारी बैंकों के निजीकरण तथा रिक्त पदों को न भरने की नीति के कारण मध्यम वर्ग के युवाओं के स्थायी नौकरी के सपने टूट गए हैं। युवा वर्ग आज डिलीवरी ब्वाय या कैब ड्राइवर जैसे अस्थायी और असुरक्षित (Gig workers) कार्यों में संलग्न होने के लिए मजबूर हैं, जहाँ कोई सामाजिक सुरक्षा या भविष्य निधि (PF) का लाभ नहीं मिलता।

५. शिक्षा क्षेत्र की बदहाली

अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार शिक्षा क्षेत्र में जीडीपी (GDP) का कम से कम 6 प्रतिशत आवंटित होना चाहिए। लेकिन 2023-24 और 2024-25 के केंद्रीय बजट में देखा गया कि शिक्षा मंत्रालय के लिए कुल आवंटन जीडीपी का मात्र 2.8 प्रतिशत से 2.9 प्रतिशत था। यह दुनिया के कई विकासशील देशों की तुलना में भी बहुत कम है।

स्कूल छोड़ने की दर (ड्रॉपआउट): यूनिसेफ और भारत सरकार की अपनी संस्था 'यूडाइस प्लस' (UDISE+) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में माध्यमिक स्तर (नौवीं-दसवीं) पर स्कूल छोड़ने की दर लगभग 12.6 प्रतिशत है। दलित, आदिवासी और ग्रामीण छात्र-छात्राओं के मामले में यह दर और भी बहुत अधिक है। सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और अत्यधिक गरीबी ही इसका मुख्य कारण है।

निजीकरण और कर्ज का बोझ: 'नेशनल सैंपल सर्वे' (NSS) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों में पढ़ाई का खर्च लगभग 4 गुना और उच्च शिक्षा के मामले में लगभग 5 गुना बढ़ गया है। 'हेफा' (HEFA) जैसी नीतियां केंद्रीय सरकार द्वारा अपनाने के कारण केंद्रीय विश्वविद्यालयों की फीस में लगभग 50 प्रतिशत से 300 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप मध्यम वर्गीय परिवार बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने के लिए कर्ज के जाल में फंस रहे हैं।

आंकड़ों की नजर में स्वास्थ्य

जीडीपी का नाममात्र हिस्सा: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, सरकार को जनस्वास्थ्य पर न्यूनतम 2.5 प्रतिशत से 3 प्रतिशत खर्च करना चाहिए। इसके विपरीत, भारत का केंद्रीय स्वास्थ्य बजट पिछले कुछ वर्षों से जीडीपी के मात्र 1.2 से 1.3 प्रतिशत के दायरे में ही स्थिर बना हुआ है।

डॉक्टरों और बुनियादी ढांचे की भारी कमी: 'रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स' (Rural Health Statistics) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टरों (जैसे बाल रोग विशेषज्ञ, सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ) के लगभग 76 प्रतिशत से 80 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। यानी, कागजों पर अस्पताल तो हैं, लेकिन वहाँ इलाज करने वाले लोग नहीं हैं।

'आयुष्मान भारत' और कैग (CAG) का तमाचा: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने 2023-24 में आयुष्मान भारत योजना को लेकर एक विस्फोटक ऑडिट रिपोर्ट पेश की। उसमें देखा गया कि करीब 7.5 लाख लाभार्थी ऐसे हैं, जो सभी एक ही फर्जी मोबाइल नंबर (9999999999) से जुड़े हुए थे। इसके अलावा हजारों मृत लोगों के नाम पर भी निजी अस्पतालों ने करोड़ों रुपये के बिल उठा लिए हैं; यह सब साबित करता है कि यह योजना वास्तव में कॉरपोरेट अस्पतालों के लिए चोरी का अड्डा बन गई है।

मेडिकल दिवालियापन (Medical Bankruptcy): नीति आयोग और विश्व बैंक के संयुक्त सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में हर साल इलाज का खर्च उठाने और दवाओं की ऊंची कीमतें चुकाने के कारण लगभग 5.5 से 6 करोड़ लोग नए सिरे से गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। भारत में इलाज के कुल खर्च का लगभग 48.2 प्रतिशत हिस्सा लोगों को सीधे अपनी जेब से (Out of pocket) देना पड़ता है, जो अंतर्राष्ट्रीय औसत की तुलना में अत्यधिक है।

क्षेत्र (Sector) अंतर्राष्ट्रीय मानक / पुरानी मांगवर्तमान मोदी सरकार का आवंटन (जीडीपी के प्रतिशत के रूप में)आम जनता पर इसका प्रभाव

शिक्षा (Education)न्यूनतम 6 प्रतिशत (कोठारी आयोग)2.8 - 2.9 प्रतिशतसरकारी स्कूल बंद होना, उच्च शिक्षा की भारी फीस और बेलगाम व्यावसायिकीकरण।

स्वास्थ्य (Healthcare)न्यूनतम 2.5 - 3 प्रतिशत (WHO)1.2 - 1.3 प्रतिशतजेब से भारी खर्च (48 प्रतिशत), ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की 80 प्रतिशत कमी।

कॉरपोरेट छूट (Corporate Tax)टैक्स की दर बढ़ाना या बनाए रखना30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत करना पूँजीपतियों को सालाना करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये की टैक्स माफी (छूट)।

.

.

(अंतिम हिस्सा अगले अंक में)

साभार : देशहितैषी

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

हिंदुत्ववादी अर्थव्यवस्था में हिंदुओं को क्या लाभ? - शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 06 जून 2026 • 9 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राज्य

मुखौटा हट गया है, अब लड़ाई असली चेहरे से है - मोहम्मद सलीम

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

हिंदू-मुस्लिम सभी बुलडोजर के शिकार होंगे: मोहम्मद सलीम

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

बुलडोजर नीति के खिलाफ भी लड़ेंगे वामपंथी: मोहम्मद सलीम

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव

14 जून 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
अतिथि लेखन

'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी।' अनीश अंकुर की कलम से

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

अतिथि लेखन

भोजन और भजन के नाम पर बंगाल की चेतना पर हमला। ~मालिनी भट्टाचार्य~

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

अतिथि लेखन

रवींद्रनाथ, फासीवाद और लाल पार्टी - मयूख विश्वास

आज 9 मई भी है, वह दिन जब विश्व मानवता को फासीवादी तांडव से मुक्ति मिली थी। इस संदर्भ में बंगाल की फासीवाद-विरोधी परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हमारे रवींद्रनाथ ठाकुर इस विरासत के साथ ओत-प्रोत रूप से जुड़े हुए हैं।

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement