चर्चा के केंद्र में दो महास्टार — लियोनेल मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो होंगे। लगभग दो दशकों तक फुटबॉल जगत पर राज करने वाले मेस्सी और रोनाल्डो के लिए यह संभवतः आखिरी विश्व कप है। नतीजतन, 2026 एक युग के अंतिम अध्याय का गवाह बनेगा।
जन समाचार मंच
चर्चा के केंद्र में दो महास्टार — लियोनेल मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो होंगे। लगभग दो दशकों तक फुटबॉल जगत पर राज करने वाले मेस्सी और रोनाल्डो के लिए यह संभवतः आखिरी विश्व कप है। नतीजतन, 2026 एक युग के अंतिम अध्याय का गवाह बनेगा।


चार साल बाद फिर वही समय लौट आया है। रात जागकर मैच देखना, सुबह लाल आँखों के साथ कॉलेज, यूनिवर्सिटी या ऑफिस जाना और दोस्तों के साथ फुटबॉल पर अंतहीन बहस करना।
विश्व कप फिर से हमारे दरवाजे पर है।
हालाँकि, इस बार का विश्व कप थोड़ा अलग है। 11 जून से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), मैक्सिको और कनाडा में इतिहास का सबसे बड़ा फुटबॉल विश्व कप शुरू हो रहा है। विश्व कप के इतिहास में यह पहली बार नहीं है, लेकिन सबसे बड़े पैमाने पर तीन देश मिलकर इस महाकुंभ की मेजबानी कर रहे हैं। अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा के 16 शहरों में यह महायज्ञ फैला होगा। इस बार रिकॉर्ड 48 टीमें हिस्सा ले रही हैं, और मैचों की संख्या बढ़कर 104 हो गई है। 1930 के पहले विश्व कप में केवल 13 देशों ने भाग लिया था। लगभग सौ साल बाद, 2026 के विश्व कप में यह संख्या बढ़कर 48 हो रही है।
अगले लगभग 40 दिनों तक दुनिया व्यावहारिक रूप से दो हिस्सों में बंट जाएगी — एक टीम मैच देखेगी, और दूसरी टीम मैच देखने वाले लोगों को झेलेगी!
नए फॉर्मेट की बदौलत पहली बार उज्बेकिस्तान, जॉर्डन, कुराकाओ और केप वर्डे जैसे देश विश्व कप खेलेंगे। विश्व कप का इतिहास गवाह है कि हर सीजन में कोई न कोई अंडरडॉग (कमजोर) टीम सबको चौंका देती है। इस बार उस कहानी का नायक कौन बनेगा, यही देखना बाकी है।
दूसरी ओर, चर्चा के केंद्र में दो महास्टार — लियोनेल मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो होंगे। लगभग दो दशकों तक फुटबॉल जगत पर राज करने वाले मेस्सी और रोनाल्डो के लिए यह संभवतः आखिरी विश्व कप है। नतीजतन, 2026 एक युग के अंतिम अध्याय का गवाह बनेगा।
लेकिन साथ ही, निगाहें लामिन यामल जैसे नई पीढ़ी के सितारों पर भी होंगी, जो भविष्य में फुटबॉल का चेहरा बन सकते हैं। जब रोनाल्डो ने अपना पहला विश्व कप खेला था, तब लामिन यामल का जन्म भी नहीं हुआ था। और 2026 में दोनों को एक ही विश्व कप में देखा जा सकता है — फुटबॉल के समय चक्र की इससे खूबसूरत तस्वीर और क्या हो सकती है!
विश्व कप का उद्घाटन मैक्सिको के एज़्टेका स्टेडियम में होगा। एज़्टेका एकमात्र ऐसा स्टेडियम है जहाँ पेले (1970) और माराडोना (1986) — इन दोनों महान दिग्गजों ने विश्व कप जीतने का स्वाद चखा था। और 19 जुलाई को न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में इस महायज्ञ का समापन होगा।
फुटबॉल विश्व कप न केवल दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल आयोजन है, बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े खेल-व्यवसायों में से भी एक है। 2022 विश्व कप के वर्ष में फीफा की कमाई लगभग 577 करोड़ डॉलर (लगभग 55 हजार करोड़ रुपये) थी, जबकि 2026 विश्व कप के चार साल के चक्र में यह कमाई 1,100 करोड़ डॉलर (लगभग 1.05 लाख करोड़ रुपये) को छू सकती है। फीफा का अनुमान है कि 2026 विश्व कप किसी न किसी रूप में दुनिया के लगभग 600 करोड़ लोगों तक पहुंचेगा। यानी दुनिया के हर 10 में से लगभग 7 या 8 लोग इस महाकुंभ का हिस्सा बन सकते हैं — टीवी स्क्रीन पर, मोबाइल स्क्रीन पर या सोशल मीडिया की अंतहीन चर्चाओं में।
वास्तव में विश्व कप सिर्फ फुटबॉल नहीं है। यह रात जागने, दोस्तों के साथ जुटने, बहस, खुशी, निराशा, भावनाओं और करोड़ों लोगों के एक साथ एक गोल गेंद के प्यार में पड़ जाने की कहानी है। अधिकांश मैच भारतीय समयानुसार देर रात या सुबह के वक्त आयोजित होंगे। यानी विश्व कप के साथ-साथ चाय और कॉफी की मांग भी बढ़ेगी! इसके लिए आपने फ्लास्क तो खरीद ही लिया होगा! क्योंकि, फुटबॉल प्रेमियों के लिए अच्छी खबर यह है कि पहले ही हफ्ते में ब्राजील, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इंग्लैंड जैसी सभी बड़ी टीमें मैदान में उतर जाएंगी। लेकिन एक बुरी खबर भी है — अधिकांश मैच देर रात या तड़के होंगे, इसलिए अगले एक महीने तक नींद और फुटबॉल के बीच एक कठिन संतुलन बनाकर चलना होगा!
वैसे टीवी पर ही मैच देखना बेहतर है। अगर आप स्टेडियम में जाकर देखना चाहते हैं, तो टिकटों की कीमत सुनकर ही किसी के भी होश उड़ सकते हैं। यदि 1 डॉलर = ₹98 माना जाए, तो टिकटों की अनुमानित कीमत कुछ इस प्रकार है —
टिकटों की अनुमानित कीमत तालिका:
चरण-टिकट की कीमत (रुपये में)
ग्रुप स्टेज- ₹5,880 – ₹60,760
राउंड ऑफ 32 - ₹10,290 – ₹65,170
राउंड ऑफ 16 - ₹16,660 – ₹96,040
क्वार्टर फाइनल - ₹26,950 – ₹1,65,620
सेमीफाइनल - ₹41,160 – ₹3,22,910
फाइनल - ₹1,98,940 – ₹6,59,540
उद्घाटन मैच - ₹36,260 - ₹1,96,000
ऐऐ
विशेष नोट: विश्व कप फाइनल के सबसे महंगे टिकट की कीमत करीब साढ़े छह लाख रुपये है। यानी इससे कहीं कम कीमत में एक छोटी कार खरीदी जा सकती है! मैदान पर बैठकर फाइनल देखना हो तो सिर्फ फुटबॉल प्रेमी होने से काम नहीं चलेगा, बैंक बैलेंस का भी 'विश्व कप स्तर' का फिट होना जरूरी है! इसलिए हाथ में चाय/कॉफी का कप थामे घर पर पंखे के नीचे बैठकर विश्व कप देखना ही श्रेयस्कर है।
बहरहाल, अंत में विश्व कप तो कोई एक ही टीम जीतेगी। लेकिन उससे पहले, लगभग 40 दिनों तक दुनिया के करोड़ों लोगों के पास ढेरों यादें, कुछ अनसुनी कहानियाँ और कई बिना सोए गुज़री रातें रह जाएंगी।
खेल आज से ही शुरू हो रहा है - 11 जून, 2026
{लेखक सी पी आई (एम)के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।}
अपलोडर: श्रेया जायसवाल
क्या यह लेख उपयोगी था?
अपलोडर: श्रेया जायसवाल • प्रकाशित: 11 जून 2026 • 5 मिनट पठन

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"
सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव
17 जून 2026

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।
सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव
14 जून 2026

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

29 अप्रैल को चुनावों की व्यस्तता के बीच एक महत्वपूर्ण खबर शायद हममें से कई लोगों की नजरों से बच गई। उसी दिन, भारत के सबसे प्रमुख तर्कवादी विचारकों में से एक नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दोषी ठहराए गए और उम्रकैद की सजा पाए मुख्य आरोपियों में से एक शरद कलासकर को बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह भोसले की डिवीजन बेंच ने जमानत दे दी। नरेंद्र दाभोलकर की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी — यह एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक बौद्धिक परंपरा पर सीधा हमला था। दाभोलकर की हत्या का तरीका — मोटरसाइकिल सवार दो लोगों द्वारा गोलियां चलाना — भारत में इसके बाद हुए कई प्रगतिशील तर्कवादी शख्सियतों की हत्याओं के 'तरीके' (मोडस ऑपरेंडी) से मेल खाता है। गोविंद पानसरे (जानलेवा हमला: 16 फरवरी 2015, मृत्यु: 20 फरवरी 2015), एम. एम. कलबुर्गी (हत्या: 30 अगस्त 2015) और गौरी लंकेश (हत्या: 5 सितंबर 2017) - इन सभी की हत्याओं में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया। कहा जा रहा है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक सुसंगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती है, जो प्रगतिशील तर्कवादी आवाजों को खामोश करना चाहता है। नरेंद्र दाभोलकर को क्यों मरना पड़ा ? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा, जहाँ अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 मई 2026

जिस तरह रेणु के "मैला आँचल" में मेरीगंज नायक की भूमिका में है वैसे ही मृणाल सेन की अधिकांश फिल्मों में कलकत्ता शहर नायक की भूमिका में दिखाई देता है।
श्रेया जायसवाल • 14 मई 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...