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बेदखली पर हाईकोर्ट का स्थगन आदेश

अक्षत(For Testing)•18 जून 20264 मिनट पठन6 बार पढ़ा गया

राज्य के मुख्यमंत्री सुभेंदु अधिकारी सत्ता में आते ही बुलडोज़र के इस्तेमाल पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं। गरीब लोगों की रोजी-रोटी के सवाल पर इसी सुभेंदु अधिकारी ने पहले विभिन्न जनसभाओं में कहा था कि पुनर्वास के बिना कहीं भी हॉकर्स को नहीं हटाया जाएगा और भाजपा बेदखली का विरोध करेगी। लेकिन सत्ता मिलते ही मुख्यमंत्री बेदखली अभियान में जुट गए हैं। हॉकर और बस्ती के लोगों के साथ वामपंथी संगठन इस बेरहम बेदखली के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। मांग सिर्फ एक ही है कि बिना उचित पुनर्वास के बस्ती और हॉकर्स को नहीं हटाया जा सकता। राज्य सरकार को बातचीत के जरिए इस समस्या का समाधान करने के लिए पहल करनी होगी और रेल अधिकारियों को भी बातचीत के लिए बैठना होगा।

बेदखली पर हाईकोर्ट का स्थगन आदेश

बेदखली पर हाईकोर्ट का

स्थगन आदेश

कलकत्ता हाईकोर्ट ने रेलवे बस्ती और हाकरों की बेदखली पर रोक लगाने का आदेश दिया है। आगामी 30 जून तक बेदखली का कोई भी काम नहीं किया जा सकेगा। बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य ने इस बेदखली नोटिस पर स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) जारी किया। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने आज रेल अधिकारियों को इस मामले में हलफनामा जमा करने का निर्देश दिया है।

आज जादवपुर, ब्रेस ब्रिज, मथुरापुर, कोन्नगर, नैहाटी सहित राज्य के कई स्थानों पर रेलवे की जमीन से बस्ती और हॉकर्स को हटाए जाने के विरोध में अदालत का ध्यान आकर्षित किया गया था। गत 15 मई से इस बेदखली विरोधी मामले की सुनवाई चल रही है। CITU (सीटू), हॉकर्स संगठनों और बस्तीवासियों के संगठनों ने मिलकर जहाँ एक तरफ सड़कों पर उतरकर इस बेदखली का विरोध किया, वहीं दूसरी तरफ ये संगठन अदालत में भी कानूनी लड़ाई में शामिल हुए हैं। राज्य में भाजपा सरकार स्थापित होने के बाद ही बुलडोज़र का इस्तेमाल कर हॉकर्स को हटाने का काम शुरू हुआ है। आंदोलनकारी संगठनों की मांग है कि उचित पुनर्वास के बिना किसी को भी बेदखल नहीं किया जा सकता।

इस बीच, कलकत्ता हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद सीपीआई(एम) नेता सृजन भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री सुभेंदु अधिकारी सत्ता में आते ही बुलडोज़र के इस्तेमाल पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं। गरीब लोगों की रोजी-रोटी के सवाल पर इसी सुभेंदु अधिकारी ने पहले विभिन्न जनसभाओं में कहा था कि पुनर्वास के बिना कहीं भी हॉकर्स को नहीं हटाया जाएगा और भाजपा बेदखली का विरोध करेगी। लेकिन सत्ता मिलते ही मुख्यमंत्री बेदखली अभियान में जुट गए हैं। हॉकर और बस्ती के लोगों के साथ वामपंथी संगठन इस बेरहम बेदखली के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। मांग सिर्फ एक ही है कि बिना उचित पुनर्वास के बस्ती और हॉकर्स को नहीं हटाया जा सकता। राज्य सरकार को बातचीत के जरिए इस समस्या का समाधान करने के लिए पहल करनी होगी और रेल अधिकारियों को भी बातचीत के लिए बैठना होगा।

आज अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि रेलवे द्वारा जारी किए गए नोटिस में किसी विशिष्ट व्यक्ति के नाम का उल्लेख नहीं था। केवल सामान्य रूप से इलाके को खाली करने का निर्देश दिया गया था। ब्रेस ब्रिज के पास रेलवे की जमीन पर हजारों परिवार रह रहे हैं। कोन्नगर इलाके में कई वर्षों से बाजार लगा हुआ है, जहाँ गरीब लोग निवास करते हैं। रात के अंधेरे में वहां बुलडोज़र नहीं चलाया जा सकता। इस अमानवीय बेदखली अभियान को रोकना जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत आवास और आजीविका के अधिकार का मामला भी अदालत के सामने रखा गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि पुनर्वास की किसी स्पष्ट योजना के बिना ही हजारों लोगों को बेदखल करने की कोशिश की जा रही थी, जो मानवीय और कानूनी दोनों दृष्टिकोणों से सवालों के घेरे में है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि बेदखली की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही चलानी होगी। किसी भी व्यक्ति को नोटिस दिए बिना, सुनवाई का अवसर दिए बिना या रेल अधिकारियों के विशिष्ट नोटिस के बिना इस तरह बेदखली का आदेश नहीं दिया जा सकता। रेलवे की ओर से उचित दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगे जाने पर अदालत ने 30 जून तक बेदखली पर रोक लगा दी।

स्थानीय निवासियों के एक बड़े हिस्से ने बताया कि वे कई वर्षों से इस इलाके में रह रहे हैं। कई लोगों की आजीविका, स्कूल, कामकाज और दैनिक जीवन इसी इलाके को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है। अचानक मिले बेदखली के नोटिस से वे दहशत में आ गए थे। अदालत के इस आदेश के बाद फिलहाल इलाके में थोड़ी राहत लौटी है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के गठन के बाद नए प्रशासन ने अवैध निर्माणों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। तिलजला और तपसिया जैसे इलाकों में अवैध कारखानों और निर्माणों को गिराने के लिए बुलडोज़र अभियान की घटनाएं भी सामने आई हैं। हालांकि, ब्रेस ब्रिज का यह बेदखली अभियान पूरी तरह से पूर्व रेलवे की अपनी परियोजना और केंद्रीय एजेंसी की पहल पर चलाया जा रहा था।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि भले ही सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा हो, लेकिन बेदखली के मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। अदालत मानवीय दृष्टिकोण और पुनर्वास के सवाल पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। विशेष रूप से जब बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का सवाल जुड़ा हो, तो प्रशासन को अधिक सतर्कता से कदम उठाना पड़ता है। आज अदालत में वकील विकाश रंजन भट्टाचार्य की सहायता वकील शमिम अहमद, बिक्रम बनर्जी और सुदीप्त दासगुप्ता ने की।

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प्रकाशित: 18 जून 2026 • 4 मिनट पठन

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