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मुख्यमंत्री का टारगेट (बांग्ला दैनिक गणशक्ति में आज का संपादकीय)

केशव कुमार भट्टड़•13 जुलाई 20264 मिनट पठन54 बार पढ़ा गया

मुख्यमंत्री ने जाँच से पहले ही घोषणा कर दी कि जनता के गुस्से में मारा गया व्यक्ति बेकसूर था। जबकि एनकाउंटर में मारे गए आरोपी ने ही जनता के गुस्से में मरे व्यक्ति का नाम लिया था। और उसे ही सत्तादल के नेता चौकी से छुड़ाकर ले गए थे। जिस आरोपी को एनकाउंटर में मारा गया है, उसने कई और नाम बताए थे जो अलग-अलग तरीकों से इसमें शामिल हैं। उन सब पर सरकार चुप है। यह साफ़ है कि उन्हें जानबूझकर छिपाने की कोशिश की जा रही है। अगर वह एनकाउंटर में नहीं मारा जाता, तो शायद कई और जानकारियां मिलतीं जिन्हें पचाना सत्ताधारी दल के लिए मुश्किल होता। क्या इसीलिए एनकाउंटर करके गवाह को ही मिटा दिया गया? क्या पूरी घटना का रुख मोड़ने के लिए ही मुख्यमंत्री प्रदर्शनकारियों में से एक खास समुदाय को टारगेट कर रहे हैं?

मुख्यमंत्री का टारगेट (बांग्ला दैनिक गणशक्ति में आज का संपादकीय)

"वोट बैंक की सियासत: बारुईपुर में न्याय का एनकाउंटर, साज़िश की आड़ में सांप्रदायिक एजेंडा!"

। । मुख्यमंत्री का टारगेट (बांग्ला दैनिक गणशक्ति में आज का संपादकीय)। ।
"बेटी को इंसाफ़ देने में फेल सरकार, अब अपनों को बचाने के लिए खेल रही धर्म का कार्ड!"

बारुईपुर में नाबालिग के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में कानून के शासन और अपराधी को अधिकतम सजा देने की घोषणा व प्रचार की आड़ में असल में शुभेंदु की सरकार ने कानून के शासन को ही खारिज कर दिया है। उसकी जगह वे बर्बर युग के राजतंत्र के मनमाने शासन को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। देश के संविधान और कानून द्वारा दिखाए गए रास्ते पर नहीं, बल्कि शुभेंदु की सरकार भाजपा के राजनीतिक हिंदुत्व के रास्ते पर चल रही है। क्योंकि भाजपा के सत्ता हथियाने और सत्ता में बने रहने के लिए देश के संविधान और कानून का शासन स्थापित करने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी राजनीतिक हिंदुत्व की लाइन है।

उसी तरह जन कल्याण और विकास भी उनका असली एजेंडा नहीं है। वे सब सिर्फ लोक-दिखावे के लिए हैं। उनका असली लक्ष्य धार्मिक और सांप्रदायिक नफरत व बंटवारे के ज़रिए हिंदुओं को एकजुट करना और बहुसंख्यक हिंदुओं के वोट पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में लाना है। इसी मकसद से वे अलग-अलग तरीकों से मुस्लिमों का डर और खौफ पैदा करके हिंदुओं को धार्मिक रूप से एकजुट करना चाहते हैं और भाजपा को हिंदुओं के एकमात्र रक्षक के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। भारत की राजनीतिक व्यवस्था और देश के ढांचे में वे भाजपा को ही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। इसीलिए 'एक देश, एक पार्टी, एक सरकार, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति' का नारा है।

बारुईपुर की घटना को मुख्यमंत्री जानबूझकर और बड़ी चालाकी से उसी धार्मिक और सांप्रदायिक बंटवारे की तरफ मोड़ने के लिए बहुत ज़्यादा उतावले हो गए हैं। वे भले ही राज्य से बलात्कार शब्द मिटा देने की बात कहें या महिलाओं के लिए सुरक्षित राज्य बनाने का वादा करें, लेकिन बारुईपुर की घटना ने साबित कर दिया है कि यह असल में एक नामुमकिन कल्पना है। एक 11 साल की बच्ची को शाम के समय सड़क से उठा लिया गया और रात भर में सामूहिक बलात्कार करके मार डाला गया। पुलिस के पास घर वालों के शिकायत करने के बाद भी पुलिस एक्टिव नहीं हुई। मजबूरन इलाके के लोगों ने खुद तलाश की, एक आरोपी को पकड़ा, उससे नाम उगलवाए और बाकी आरोपियों को पकड़कर जनता ने पुलिस के हवाले किया। इसके बाद पुलिस चौकी से एक आरोपी भाग जाता है। दूसरे आरोपी को एक स्थानीय भाजपा नेता अपने साथ ले जाता है। इस घटना ने स्वाभाविक रूप से स्थानीय लोगों के भीतर भारी गुस्सा पैदा कर दिया। इसी बीच जब बच्ची की लाश मिली, तो गुस्से का विस्फोट हो गया। सड़क और रेल रोकी गई। चौकी पर प्रदर्शन हुआ। ऐसे भयानक हालात के बीच, एक आरोपी जनता की पिटाई से मारा गया।

इसके तुरंत बाद ही पुलिस बहुत ज़्यादा एक्टिव हो गई। मुख्यमंत्री भी मैदान में उतर पड़े। धीरे-धीरे मुख्यमंत्री के लिए नाबालिग के बलात्कार-हत्या से ज़्यादा महत्वपूर्ण भीड़ द्वारा की गई पिटाई (मॉब लिंचिंग) में हुई मौत बन गई। क्योंकि बलात्कार-हत्या में उन्हें कोई सांप्रदायिक फायदा नहीं दिख रहा था। इसलिए उन्होंने प्रदर्शन-विरोध और उसके कारण हुई एक मौत को सांप्रदायिक रंग देकर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ही जंग का एलान कर दिया। 200 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) करके 38 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री यह भी कह रहे हैं कि प्रदर्शन के नाम पर साज़िश हुई है। एक समुदाय ने दूसरे समुदाय को मारा है। जबकि वे एक बार भी यह नहीं कह रहे हैं कि पुलिस क्यों निष्क्रिय (शांत) बैठी थी। अगर पुलिस समय पर एक्टिव होती, तो ऐसा कोई प्रदर्शन होता ही नहीं। फिर, मुख्यमंत्री ने जाँच से पहले ही घोषणा कर दी कि जनता के गुस्से में मारा गया व्यक्ति बेकसूर था। जबकि एनकाउंटर में मारे गए आरोपी ने ही जनता के गुस्से में मरे व्यक्ति का नाम लिया था। और उसे ही भाजपा नेता चौकी से छुड़ाकर ले गए थे।

जिस आरोपी को एनकाउंटर में मारा गया है, उसने कई और नाम बताए थे जो अलग-अलग तरीकों से इसमें शामिल हैं। उन सब पर सरकार चुप है। यह साफ़ है कि उन्हें जानबूझकर छिपाने की कोशिश की जा रही है। अगर वह एनकाउंटर में नहीं मारा जाता, तो शायद कई और जानकारियां मिलतीं जिन्हें पचाना सत्ताधारी दल के लिए मुश्किल होता। क्या इसीलिए एनकाउंटर करके गवाह को ही मिटा दिया गया? क्या पूरी घटना का रुख मोड़ने के लिए ही मुख्यमंत्री प्रदर्शनकारियों में से एक खास समुदाय को टारगेट कर रहे हैं?

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मुख्यमंत्री का टारगेट (बांग्ला दैनिक गणशक्ति में आज का संपादकीय)

प्रकाशित: 13 जुलाई 2026 • 4 मिनट पठन

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