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मातृत्व अवकाश कोई खैरात नहीं, कामकाजी महिलाओं का संवैधानिक अधिकार - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

केशव कुमार भट्टड़•13 जुलाई 20264 मिनट पठन35 बार पढ़ा गया

पूंजीवादी व्यवस्था में अक्सर महिलाओं के श्रम और अधिकारों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जाती है, लेकिन न्यायपालिका के एक हालिया फैसले ने कामकाजी महिलाओं के हक में एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक नजीर पेश की है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) सरकार या प्रशासन द्वारा दी जाने वाली कोई 'भीख' या 'दया' नहीं है, बल्कि यह कामकाजी महिलाओं का गरिमापूर्ण संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने दो टूक कहा कि किसी भी सरकारी दिशा-निर्देश या प्रशासनिक तानाशाही के जरिए इस बुनियादी अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

मातृत्व अवकाश कोई खैरात नहीं, कामकाजी महिलाओं का संवैधानिक अधिकार - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला:

मातृत्व अवकाश कोई खैरात नहीं, कामकाजी महिलाओं का संवैधानिक अधिकार

नई दिल्ली, 12 जुलाई। पूंजीवादी व्यवस्था में अक्सर महिलाओं के श्रम और अधिकारों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जाती है, लेकिन न्यायपालिका के एक हालिया फैसले ने कामकाजी महिलाओं के हक में एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक नजीर पेश की है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) सरकार या प्रशासन द्वारा दी जाने वाली कोई 'भीख' या 'दया' नहीं है, बल्कि यह कामकाजी महिलाओं का गरिमापूर्ण संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने दो टूक कहा कि किसी भी सरकारी दिशा-निर्देश या प्रशासनिक तानाशाही के जरिए इस बुनियादी अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल की एकल पीठ ने न केवल महिलाओं के हक को दबाने वाले जम्मू-कश्मीर प्रशासन के विवादित आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, बल्कि मातृत्व अवकाश के दौरान रोके गए वेतन और भत्तों को भी तुरंत जारी करने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला? नौकरशाही का जनविरोधी चेहरा

यह मामला केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजिडेंट और ट्यूटर के रूप में अनुबंध (Academic Arrangement) पर कार्यरत डॉ. सोनाक्षी गुप्ता और अन्य महिला डॉक्टरों के शोषण से जुड़ा है। गौरतलब है कि इन महिला डॉक्टरों ने जब मातृत्व अवकाश लिया, तो स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग ने वित्त विभाग के साथ मिलकर 14 अक्टूबर 2025 को एक जनविरोधी और मनमाना तुगलकी फरमान जारी कर दिया। इस निर्देश में कहा गया कि चूंकि ये डॉक्टर अवकाश के दौरान 'ड्यूटी से बाहर' थीं, इसलिए उन्हें इस अवधि का कोई वेतन नहीं दिया जाएगा। प्रशासन के इस पितृसत्तात्मक और शोषक रवैये के खिलाफ इन बहादुर महिला डॉक्टरों ने चुप बैठने के बजाय कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना और अदालत का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट में आमने-सामने: हक और हुकूमत की लड़ाई

अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अभिनव जामवाल ने मजबूती से पक्ष रखते हुए कहा कि जुलाई 2024 में सरकार ने खुद एक आदेश जारी कर सीनियर रेजिडेंट्स और ट्यूटर्स को प्रचलित नियमों के तहत मातृत्व अवकाश के दायरे में शामिल किया था। जब डॉक्टरों को अवकाश दिया गया, तब प्रशासन ने कभी नहीं कहा कि उनका वेतन रोक दिया जाएगा। बाद में नियमों को मनमाने ढंग से बदलना पूरी तरह अवैध है।

दूसरी ओर, स्थापित व्यवस्था और नौकरशाही का बचाव करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) रमन शर्मा ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता स्थायी कर्मचारी नहीं बल्कि संविदा (Contractual) पर हैं, इसलिए वे अवकाश के दौरान वेतन पाने की हकदार नहीं हैं। प्रशासन की यह दलील पूंजीवादी व्यवस्था की उसी सोच को दर्शाती है जहां 'समान काम' करने वाले संविदा कर्मचारियों को उनके बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित रखने की कोशिश की जाती है।

अदालत की कड़ी फटकार: "वेतन के बिना मातृत्व अवकाश बेमानी"

न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल की पीठ ने प्रशासन की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने एक बेहद प्रगतिशील और मानवीय टिप्पणी करते हुए कहा:

"मातृत्व अवकाश का अधिकार सीधे तौर पर पूरे वेतन की प्राप्ति से जुड़ा हुआ है। यदि अवकाश के दौरान वेतन ही रोक दिया जाए, तो इस सामाजिक सुरक्षा कानून और छुट्टी का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। जब एक बार नियमों के तहत मातृत्व अवकाश मंजूर कर लिया गया, तो किसी भी प्रशासनिक आदेश या गाइडलाइन के जरिए वेतन रोकना पूरी तरह से गैरकानूनी है।"

कामकाजी महिलाओं के संघर्ष की बड़ी जीत

अदालत ने जम्मू-कश्मीर सरकार के उस विवादित और शोषक निर्देश को रद्द कर दिया है। साथ ही, आदेश दिया है कि जिन भी महिला डॉक्टरों का मातृत्व अवकाश के दौरान का वेतन और भत्ता रोका गया था, उसे अविलंब भुगतान किया जाए। वामपंथी और प्रगतिशील हलकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। यह फैसला साबित करता है कि चाहे कर्मचारी स्थायी हो या संविदा पर, मातृत्व का अधिकार और सामाजिक सुरक्षा का हक सार्वभौमिक है। यह ऐतिहासिक निर्णय आने वाले समय में कार्यस्थलों पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने और पितृसत्तात्मक नौकरशाही के खिलाफ उनके संघर्ष को और अधिक मजबूती देगा।


बांग्ला दैनिक कालांतर। 13.07.2026

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मातृत्व अवकाश कोई खैरात नहीं, कामकाजी महिलाओं का संवैधानिक अधिकार - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट

प्रकाशित: 13 जुलाई 2026 • 4 मिनट पठन

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केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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