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सरकारी उपेक्षा के दो रूप: कहीं गंगा लील रही है जमीन, तो कहीं लापरवाही से बहे पुल

केशव कुमार भट्टड़•14 जुलाई 20264 मिनट पठन62 बार पढ़ा गया

नेता बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, पर नहीं बदलती तो नदी किनारे बसने वाले मेहनतकशों और किसानों की बदहाली! हुगली के जीराट (चर खैरामारी) में प्रशासनिक लापरवाही के चलते गंगा का भीषण कटाव जारी है, जिससे ग्रामीणों की खेती की जमीन और पक्की सड़कें नदी में समाती जा रही हैं। वहीं, पश्चिम मेदिनीपुर के घाटाल में मानसून से पहले नदियों की सफाई न होने के कारण जलकुंभी के भारी दबाव से 17 महत्वपूर्ण पुल और चचरी के पुल टूटकर बह गए हैं। इस दोहरी प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सैकड़ों गांवों का संपर्क कट चुका है और स्कूली बच्चों, नौकरीपेशा लोगों तथा गरीब किसानों का जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया है। वामपंथी संगठनों ने आपदा के इस दौर में राजनीति से ऊपर उठकर प्रभावितों को तुरंत मुआवजा देने और इन जनसमस्याओं के स्थायी समाधान की मांग की है।

सरकारी उपेक्षा के दो रूप

कहीं गदगद बहती गंगा लील रही है जमीन, तो कहीं प्रशासनिक लापरवाही से बहे पुल-सेंत

"नेता बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, पर नहीं बदलती तो नदी किनारे बसने वाले मेहनतकशों और किसानों की बदहाली!"

कोलकाता, 13 जुलाई। एक तरफ आसमान से बरसती आफत और दूसरी तरफ प्रशासन की आपराधिक लापरवाही। पश्चिम बंगाल के हुगली और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों से तबाही की दो ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी हैं कि गरीब और मेहनतकश आबादी को सरकारों ने पूरी तरह उनके हाल पर छोड़ दिया है। कहीं गंगा का बेरहम कटाव (इरोजन) उपजाऊ जमीन और घरों को लील रहा है, तो कहीं मानसूनी बारिश के बाद नदियों की सफाई न होने के कारण करोड़ों की लागत से बने पुल और चचरी के पुल (बांस के पुल) ताश के पत्तों की तरह ढह रहे हैं। पेश है दो अलग-अलग हिस्सों से जमीनी हकीकत बयां करती यह रिपोर्ट:

1. जीराट (हुगली): फिर तबाही के मुहाने पर चर खैरामारी, स्थायी समाधान के नाम पर सिर्फ छलावा

जीराट ग्राम पंचायत का चर खैरामारी इलाका एक बार फिर गंगा के भीषण कटाव की चपेट में है। लोकनाथ माथा इलाके से शुरू हुआ यह भू-कटाव अब लगातार फैलता जा रहा है। मानसून शुरू होने के महज एक महीने के भीतर अकेले बलागढ़ ब्लॉक में तीन अलग-अलग जगहों पर कटाव देखा गया है। रविवार को हुए ताजा भू-कटाव ने एक बार फिर स्थानीय ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।

क्या खोया जनता ने ?

इस नए कटाव के कारण गांव की पक्की डामर (पिच) सड़क, बच्चों का छोटा खेल का मैदान और उपजाऊ कृषि भूमि गंगा के सीने में समा गई है। बलागढ़ की नौ पंचायतें इस समय गंगा के कटाव का दंश झेल रही हैं।

प्रशासनिक विफलता की हद:

कुछ साल पहले सिंचाई विभाग ने लगभग डेढ़ किलोमीटर के दायरे में बल्लियां (शालबल्ला) गाड़कर कटाव रोकने की औपचारिकता पूरी की थी, जो पहली ही बारिश में नाकाम साबित हुई।

संपर्क टूटा, बच्चे खतरे में:

ग्रामीणों का आरोप है कि चर खैरामारी गांव का पुराना स्कूल और खेल का मैदान पहले ही गंगा में विलीन हो चुका है। नया स्कूल तो बना, लेकिन जलभराव के डर से अभिभावक बच्चों को वहां भेजने से डरते हैं। यही नहीं, गांव को मुख्य इलाके से जोड़ने वाला एकमात्र मुख्य पुल पिछले कई महीनों से टूटा पड़ा है, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

2. घाटाल (पश्चिम मेदिनीपुर): बारिश के बाद उफनाई नदियां, जलकुंभी के दबाव से टूटे 17 पुल

दो दिनों की लगातार मानसूनी बारिश ने चंद्रकोना, गढ़बेता, घाटाल और दासपुर ब्लॉक से गुजरने वाली शिलाबती और झुमी नदियों का जलस्तर बढ़ा दिया है। लेकिन असली तबाही नदी के पानी ने नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी ने मचाई है। नदियों में पसरी भारी जलकुंभी (कचूरीपाना) और खरपतवार की समय पर सफाई न होने के कारण, पानी के तेज बहाव के साथ बहकर आई जलकुंभी के भारी दबाव से एक के बाद एक 17 लकड़ी और बांस के पुल (सेंत) टूटकर बह गए।

संपर्क पूरी तरह कटा, ग्रामीण हलकान:

हुगली जिले को जोड़ने वाला घटाल के मनसुका में झुमी नदी पर बना महत्वपूर्ण 'घोड़ईघाट पुल' सोमवार सुबह ढह गया। इसके पास स्थित मनसुका हाईस्कूल के पास का दूसरा पुल भी टूट गया, जिससे इस पूरे इलाके का संपर्क बाकी दुनिया से कट गया है। यही हाल गढ़बेता में शिलाबती नदी पर बने पुलों का है, जहां 15 में से 3 पुल पानी में बह चुके हैं और बाकी टूटने की कगार पर हैं।

दैनिक जीवन हुआ ठप, किसानों पर दोहरी मार:

स्कूल-कॉलेज के छात्र, शिक्षक, नौकरीपेशा और आम लोग अब 6 से 14 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाने को मजबूर हैं। सबसे बुरा हाल गरीब किसानों का है, जिन्हें अपनी फसलें बाजार तक ले जाने के लिए अब भारी-भरकम अतिरिक्त किराया चुकाना पड़ रहा है।

वामपंथ का सवाल: क्या यह आपदा प्राकृतिक है या प्रशासनिक?

स्थानीय लोगों का गुस्सा जायज है। उनका साफ कहना है कि अगर मानसून आने से पहले प्रशासनिक स्तर पर नदी के मुहाने और तलहटी में जमी जलकुंभी तथा गंदगी को साफ कर दिया गया होता, तो आज करोड़ों रुपये के पुल और ग्रामीणों की मेहनत पानी में न बहती।

सीपीआई(एम) और वामपंथी संगठनों ने मांग की है कि सरकार और सिंचाई विभाग तुरंत युद्धस्तर पर कटाव रोकने का स्थायी इंतजाम करे, टूटे हुए पुलों का पुनर्निर्माण करे और प्रभावित किसानों तथा बेघर हुए लोगों को तुरंत मुआवजा दिया जाए।



स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 14.07.2026

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सरकारी उपेक्षा के दो रूप: कहीं गंगा लील रही है जमीन, तो कहीं लापरवाही से बहे पुल

प्रकाशित: 14 जुलाई 2026 • 4 मिनट पठन

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केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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