पश्चिम बंगाल सरकार ने एक नए नोटिफिकेशन के जरिए आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कर्मियों और पैरा-टीचर्स को अन्नपूर्णा योजना के लाभ से बाहर कर दिया है। सरकार का तर्क है कि ये महिलाएं सरकारी प्रोजेक्ट कर्मी हैं, जबकि लंबे समय से इन्हें 'स्थायी सरकारी कर्मचारी' का दर्जा देने से लगातार इनकार किया जाता रहा है। इस नए तुगलकी फरमान के कारण राज्य भर के करीब 28 लाख गरीब आवेदकों का नाम योजना की सूची से कटने की आशंका पैदा हो गई है। 1 अगस्त से 5000 रुपये मानदेय बढ़ाने की आड़ में हक छीनने, आयुष्मान भारत का अतिरिक्त काम लादने और पड़ोसी राज्यों से कम मानदेय मिलने से कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है।
अन्नपूर्णा योजना से आशा और आंगनबाड़ी कर्मी बाहर, मानदेय बढ़ाकर हक छीनने की सरकारी साजिश
"काम का बोझ चौगुना, हक के नाम पर ठेंगा; स्कीम वर्कर्स के हक पर शुभेन्दु सरकार का डाका!"
अन्नपूर्णा योजना से बाहर हुईं आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता: मानदेय बढ़ाकर हक छीनने की सरकारी साजिश के खिलाफ फूटा गुस्सा
कोलकाता, 13 जुलाई। पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार ने एक बार फिर स्कीम वर्कर्स (परियोजना कर्मियों) के साथ बड़ा छल किया है। राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जारी एक नए नोटिफिकेशन (विज्ञप्ति) के अनुसार, राज्य की लाखों आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी (आईसीडीएस) कर्मी और पैरा-टीचर्स (पार्श्व शिक्षक) अब 'अन्नपूर्णा योजना' के दायरे से बाहर कर दिए गए हैं। सरकार के इस दोहरे रवैये को लेकर वामपंथी संगठनों और श्रमिक यूनियनों में भारी आक्रोश है।
सरकारी कर्मचारी का दर्जा भी नहीं और योजना से भी बाहर!
सरकार ने इस छंटनी के पीछे जो तर्क दिया है, वह बेहद हास्यास्पद और शोषक है। नए नियमों के मुताबिक, चूंकि ये महिलाएं सरकारी परियोजनाओं (स्कीम वर्कर्स) में काम करती हैं, इसलिए इन्हें अन्नपूर्णा योजना की राशि पाने के योग्य नहीं माना जाएगा। मजेदार बात यह है कि यही सरकार इन आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 'स्थायी सरकारी कर्मचारी' मानने से साफ इनकार करती रही है। उन्हें सरकारी कर्मचारी का न तो दर्जा मिलता है और न ही कोई पहचान पत्र। लेकिन जब किसी जन-कल्याणकारी योजना का लाभ देने की बात आई, तो उन्हें "सरकारी प्रोजेक्ट कर्मी" बताकर सूची से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
शुरुआत में सरकार ने नियम बनाया था कि जो महिलाएं सरकारी नौकरी में नहीं हैं और आयकर (इनकम टैक्स) नहीं देती हैं, वे अन्नपूर्णा योजना के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस नियम के तहत पिछले दो महीनों में राज्य की कुल 75 हजार आशा कार्यकर्ताओं में से कई के बैंक खातों में योजना की राशि आ भी चुकी है। 'वेस्ट बंगाल आशा स्वास्थ्य कर्मी यूनियन' की महासचिव सबीना यास्मिन ने बताया कि अभी तक पैसे वापस करने का कोई लिखित आदेश नहीं मिला है, लेकिन इस नए तुगलकी फरमान से कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस और डर का माहौल है। इस नए नियम के कारण राज्य भर के करीब 28 लाख आवेदक इस योजना से बाहर हो जाएंगे।
5 हजार का मानदेय बढ़ाकर हक छीनने की चाल?
इस साल के पूर्ण बजट में राज्य सरकार ने आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मासिक मानदेय 5,000 रुपये बढ़ाने की घोषणा की है, जो आगामी 1 अगस्त से लागू होने वाला है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार स्थायीकरण की जिम्मेदारी और उचित वेतन ढांचे से बचने के लिए यह खेल खेल रही है। एक तरफ नाममात्र का मानदेय बढ़ाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ उन्हें अन्नपूर्णा योजना से वंचित किया जा रहा है।
काम का जानलेवा बोझ, पर पड़ोसी राज्यों से कम मानदेय
'वेस्ट बंगाल आशा स्वास्थ्य कर्मी यूनियन' की महासचिव सबीना यास्मिन ने सरकार की अन्य विफलताएं गिनाते हुए कहा: "मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने आशा कार्यकर्ताओं का प्रोत्साहन भत्ता 2,000 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये करने की घोषणा की थी। देश के अन्य राज्यों की आशा कार्यकर्ताओं को यह बढ़ा हुआ भत्ता मिल रहा है, लेकिन बंगाल की कार्यकर्ताओं को इससे वंचित रखा गया है।" उन्होंने आगे कहा कि इस समय आशा कार्यकर्ताओं पर 'आयुष्मान भारत' योजना के तहत ई-केवाईसी (e-KYC) और फॉर्म भरने का अत्यधिक काम लाद दिया गया है। बिना किसी ट्रेनिंग या तकनीकी प्रशिक्षण के, उन्हें एक-एक हजार लोगों के घर जाकर ई-केवाईसी करने को मजबूर किया जा रहा है। तुलना की जाए तो बिहार और आंध्र प्रदेश में आशा कार्यकर्ताओं को 5,000 रुपये प्रोत्साहन भत्ता मिलता है। वहीं बिहार और पुडुचेरी में मासिक मानदेय क्रमशः 14,000 और 18,000 रुपये है, जो पश्चिम बंगाल की तुलना में कहीं अधिक है। अतिरिक्त काम का बोझ, स्थायी कर्मचारी के दर्जे की अनदेखी और अब अन्नपूर्णा योजना से बाहर किए जाने की इस साजिश के खिलाफ राज्य भर की आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी दी है।
स्रोत: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 14.07.2026
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