जन समाचार मंच

नाबालिग से दरिंदगी और हत्या मामले में 'सिट' (SIT) ने 3 आरोपियों को दिन में मौके पर ले जाकर दोहराया घटनाक्रम
पुलिस के दावों पर उठे गंभीर सवाल: अगर रात के अपराध का रीक्रिएशन दोपहर में हो सकता है, तो प्रभाष मंडल को आधी रात को क्यों ले जाया गया था?
माकपा नेता लाहेक अली की अवैध गिरफ्तारी पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा; सत्ता और भाजपा के गठजोड़ का पर्दाफाश करने की मिली सजा
बारूईपुर (पश्चिम बंगाल), 14 जुलाई।
पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित बारूईपुर नाबालिग सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड में पुलिसिया थ्योरी और तथाकथित 'एनकाउंटर' पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) के अधिकारियों ने मंगलवार को पुलिस हिरासत में मौजूद तीन आरोपियों को लेकर दिन-दहाड़े घटनास्थल का दौरा किया और 'क्राइम सीन रीक्रिएशन' (घटनाक्रम का पुनर्निर्माण) किया, जबकि इससे पहले एक आरोपी का रीक्रिएशन आधी रात को किया गया था जिसमें उसकी मौत हो गई थी। मंगलवार को कड़ी सुरक्षा के बीच गिरफ्तार आरोपी आनंद सरदार, दिवाकर मंडल और कबीर मोल्ला को सूर्यपुर स्थित घटनास्थल पर लाया गया। इस दौरान सीआईडी (CID) और फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीमें भी मौके पर मौजूद रहीं। बारूईपुर पुलिस जिला के अधीक्षक (SP) सहित कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की निगरानी में यह प्रक्रिया पूरी हुई।
पुलिसिया दावों का विरोधाभास: आधी रात की उस थ्योरी का सच क्या है?
इस ताजा घटनाक्रम के बाद पुलिस प्रशासन एक बार फिर कटघरे में है। सवाल उठ रहा है कि अगर इन तीन आरोपियों के साथ दोपहर के उजाले में घटनाक्रम का पुनर्निर्माण हो सकता है, तो पिछले मंगलवार को इसी मामले के अत्यंत महत्वपूर्ण आरोपी प्रभाष मंडल को गहरी रात में घटनास्थल पर क्यों ले जाया गया था, जहां पुलिस 'एनकाउंटर' में उसकी मौत हो गई थी?
उस समय पुलिस के एक धड़े ने यह दलील दी थी कि चूंकि अपराध रात के वक्त हुआ था, इसलिए आरोपी नाबालिग को किस रास्ते से लेकर गए थे, यह जानने के लिए रात में रीक्रिएशन जरूरी था। न्यूज़ पोर्टल यह सवाल उठाता है कि अगर पुलिस का वह तर्क सही था, तो आज दोपहर में यह रीक्रिएशन कैसे संभव हुआ? इस बेहद अहम गवाह और आरोपी प्रभाष मंडल को उस रात अकेले और गुपचुप तरीके से ले जाने के पीछे क्या मंशा थी? इन तीखे सवालों पर पुलिस अधिकारियों ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।
क्या था पुलिस का 'कथित एनकाउंटर' का दावा?
ज्ञात हो कि 7 जुलाई की रात को जब मुख्य आरोपियों में से एक प्रभाष मंडल को पुलिस रीक्रिएशन के नाम पर सूर्यपुर ले गई थी, तब पुलिस ने दावा किया था कि उसने भागने की कोशिश की और जवाबी फायरिंग में वह मारा गया। इस संदेहास्पद एनकाउंटर को लेकर मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों में भारी विवाद छिड़ गया था। सीआईडी (CID) के अधिकारी इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि उस रात किन परिस्थितियों में पुलिस ने प्रभाष पर गोलियां चलाई थीं। जिला पुलिस की आधिकारिक थ्योरी के मुताबिक, जिस समय पुलिस यह जांच कर रही थी कि आरोपी नाबालिग को किस रास्ते से उठाकर लाए थे और कहां ले जाकर दरिंदगी की थी, उसी समय आरोपी प्रभाष मंडल ने पुलिसकर्मी रॉनी सरकार की कमर से रिवॉल्वर छीन ली और दलदली जमीन की तरफ भागने लगा। भागते समय उसने पुलिस पर एक राउंड गोली चलाई। पुलिस का दावा है कि आत्मरक्षा में बारूईपुर थाने के पीसी इंचार्ज अर्घ्य मंडल ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से प्रभाष पर दो गोलियां दागीं। एक गोली प्रभाष के दाहिने सीने के ठीक नीचे और दूसरी कमर के थोड़ा ऊपर लगी, जिसके बाद अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
कटीली झाड़ियों और घने अंधेरे का रहस्य खंगाल रही सीआईडी
मंगलवार को तीनों आरोपियों को घटना स्थल पर लाने से पहले इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। सूर्यपुर रेल पटरी के किनारे लगभग 200 मीटर पैदल चलने के बाद दाहिनी ओर मुड़कर कंटीली झाड़ियों और दलदली रास्तों को पार करके ही उस गड्ढे (डोबा) तक पहुंचा जा सकता है, जहां से 5 जुलाई की सुबह नाबालिग का शव बरामद हुआ था। सीआईडी और फॉरेंसिक की टीमें इस बात की गहन जांच कर रही हैं कि बारिश के कारण कीचड़ से लथपथ इस बेहद दुर्गम रास्ते पर, रात के दो से ढाई बजे के बीच घने और घुप्प अंधेरे में पुलिस प्रभाष मंडल को कैसे लेकर आई थी और वहां असल में क्या हुआ था।
पीड़ित परिवार की अपील दरकिनार, निर्दोषों की धरपकड़ जारी; माकपा नेता को फंसाने की साजिश
दूसरी ओर, पीड़ित नाबालिग के माता-पिता द्वारा मुख्यमंत्री से गुहार लगाने के बावजूद कि बेकसूरों को तंग न किया जाए, पुलिस द्वारा सूर्यपुर और आसपास के इलाकों में अंधाधुंध धरपकड़ जारी है। हालांकि, दिन के समय सूर्यपुर हाट (बाजार) इलाके में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। मंगलवार सुबह इसी बाजार में कई ग्रामीण पुलिस द्वारा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के नेता लाहेक अली की गिरफ्तारी को लेकर खुलकर आक्रोश जताते नजर आए। नाम न छापने की शर्त पर कई ग्रामीणों ने पुलिस चौकी के पास कहा: "उस दिन प्रदर्शन के दौरान भीड़ में हमने लाहेक अली को कोई हिंसा करते नहीं देखा। बाद में कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें वे साफ तौर पर इलाके में शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था का पालन करने की अपील कर रहे थे।" एक अन्य ग्रामीण ने पुलिस और सत्ताधारी दल के गठजोड़ का भंडाफोड़ करते हुए कहा:
"लाहेक अली ने मीडिया के सामने खुलकर भाजपा नेता शांतनु का नाम ले लिया था, जिसने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुख्य आरोपी आनंद सरदार को पुलिस फाड़ी (चौकी) से छुड़ाया था। इसी सच को सामने लाने की खुंदक में सरकार और पुलिस का गुस्सा हमारे इस नेता पर फूटा है।" चौंकाने वाली बात यह है कि घटनास्थल से 8-9 किलोमीटर दूर बारूईपुर नगरपालिका के वार्ड नंबर 6 के निवासी और भाजपा मंडल अध्यक्ष गौतम चक्रवर्ती द्वारा दर्ज कराई गई एक मनगढ़ंत प्राथमिकी (FIR) के आधार पर रविवार रात लाहेक अली को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। रविवार को दर्ज इस नई एफआईआर का सूर्यपुर में हुए सामूहिक बलात्कार-हत्याकांड या उसके बाद हुए जन-प्रदर्शनों से कोई कानूनी लेना-देना नहीं है। अपनी शिकायत में भाजपा नेता गौतम चक्रवर्ती ने केवल अपनी 'आशंका और धारणा' व्यक्त की है कि लाहेक अली वहां 'सांप्रदायिक दंगा' भड़काने की कोशिश कर रहे थे और वे 'देशद्रोही' हैं। इस निराधार शिकायत के दर्ज होने के चंद घंटों के भीतर नरेंद्रपुर थाने की पुलिस ने बिना कोई कानूनी नोटिस दिए, रात के समय घर पर धावा बोलकर इस बेकसूर वामपंथी नेता को सलाखों के पीछे डाल दिया। सीपीआई(एम) ने इसे सत्ता और दक्षिणपंथी ताकतों की मिलीभगत से वामपंथ की आवाज दबाने की दमनकारी कार्रवाई बताया है।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 15 जुलाई 2026
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पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
28 अगस्त 2026

फिल्म 'चिटगाँव’ चमत्कृत करती है| मास्टर दा सूर्य सेन की भूमिका में एकमात्र मनोज वाजपई को छोड़कर कोई भी ‘स्टार’ अभिनेता या अभिनेत्री इस फिल्म में नहीं है| फिल्म में ‘झुंकु ’, सुबोध रॉय के बचपन का नाम, की भूमिका में दिलजाद हवाले ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है| एक बुझी-बुझी-सी आँखों वाला किशोर जिसकी दोनों आँखों में दुनिया भर का अबोध-आश्चर्य भरा है – उन्ही आँखों से वह समाज को बदलने का सपना देखता है| किशोरी क्रांतिकारी प्रीतिलता की भूमिका में वेगा तमोटिया ने प्रभावित किया| कोई व्यावसायिक मसाला, लटके झटके भी नहीं है| फिल्म में कैमरे का काम और संगीत का व्यवहार खूब ही जोरदार तरीके से लिया गया है| दर्शक के हिसाब से यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत में मील का पत्थर है| इस तरह की शुद्ध देश-प्रेम से भरपूर संपूर्ण अंतिम फिल्म कौन सी थी, कब देखी, याद नहीं| सामाजिक दायित्व-बोध न होने पर ऐसी फ़िल्में बनाना असंभव है|
27 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
26 अगस्त 2026

मोहम्मद सलीम • 25 अप्रैल 2026

नीट महाघोटाला: 'डार्लिंग' से 'डेथ' तक का मंजर
"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए,तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।
आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"
केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।
इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।
इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।
केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026
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