फाइलों में बंद विकास और नदियों में बहता कॉरपोरेट का जहर; बदहाल जनता का फूटा आक्रोश!
फाइलों में कैद आठ करोड़ का फंड और नदियों में तैरता अवैध बालू का मुनाफा... पूंजीवादी नीतियों की दिशाहीनता ने मेहनतकश अवाम की जिंदगियों को मुहाने पर ला खड़ा किया है!
सुवर्णरेखा का विनाश: झाड़ग्राम के गोपीबल्लभपुर में सरकारी लापरवाही और अवैध बालू खनन के कारण सुवर्णरेखा नदी का तटबंध टूट रहा है। बीते एक साल में 8 करोड़ के बजट की घोषणा के बाद भी टेंडर नहीं हुआ, जिससे 300 बीघा खेती की जमीन, 31 घर और स्कूल-अस्पताल नदी में समा चुके हैं।
चूर्णी नदी में कॉरपोरेट जहर: नदिया के राणाघाट में बांग्लादेश की एक चीनी मिल से निकलने वाले जहरीले कचरे के कारण चूर्णी नदी काली पड़ चुकी है। इससे भयानक बीमारियां फैल रही हैं और मछलियां मरने से हजारों मछुआरा परिवार भुखमरी की कगार पर हैं।
प्रशासनिक विफलता: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद केंद्र और राज्य की 'डबल इंजन' समन्वय व्यवस्था पूरी तरह पंगु बनी हुई है।
जन-आक्रोश: वाम-जनतांत्रिक ताकतों ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध खनन पर रोक लगाकर तटबंध का निर्माण और प्रदूषण मुक्ति का काम तुरंत शुरू नहीं हुआ, तो व्यापक जन-आंदोलन तेज किया जाएगा।
डबल इंजन का विनाशकारी मॉडल:
सुवर्णरेखा में समातीं गरीब आदिवासियों की जिंदगियां और चूर्णी नदी में बहता कॉरपोरेट का जहर; बदहाल जनता का फूटा आक्रोश!
झाड़ग्राम/नदिया, पश्चिम बंगाल। 16 जुलाई। पूंजीपतियों की तिजोरियां भरने और चुनाव में बड़े-बड़े वादे करके सत्ता हथियाने वाली 'डबल इंजन' सरकारों की दिशाहीनता और आपराधिक लापरवाही ने आज बंगाल के जल, जंगल, जमीन और इंसानी जिंदगियों को तबाह कर दिया है। एक तरफ झाड़ग्राम के गोपीबल्लभपुर में सरकारी तंत्र की सुस्ती के कारण सुवर्णरेखा नदी का किनारा लगातार टूट रहा है, जिससे गरीब और किसान परिवारों की जमीनें नदी में समा रही हैं। वहीं दूसरी तरफ, नदिया जिले के राणाघाट में चूर्णी नदी में खुलेआम बहते औद्योगिक कचरे और कॉरपोरेट जहर ने लाखों मछुआरों और स्थानीय निवासियों का जीना दूभर कर दिया है। अदालती आदेशों को ठेंगा दिखाने वाली और सिर्फ चुनावी रैलियों में व्यस्त रहने वाली केंद्र और राज्य की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अब नदी किनारे बसने वाले मेहनतकश आवाम का गुस्सा उबल पड़ा है।
पहला अध्याय: सुवर्णरेखा का खूनी कगार—8 करोड़ का झुनझुना और टेंडर की फाइलों में दबी जनता की आवाज़ें
झारग्राम जिले के गोपीबल्लभपुर-२ ब्लॉक के मालिंचा मौजा में सुवर्णरेखा नदी का लगभग 1400 मीटर का तट आज विनाश का मुहाना बन चुका है। पिछले साल अगस्त में जब बाढ़ आई थी, तो तत्कालीन मंत्री मानस भुइयां ने कैमरे के सामने धंसती हुई जमीन को देखकर 'सहानुभूति का नाटक' किया था और तत्काल स्थायी मरम्मत के लिए 8 करोड़ रुपये आवंटित करने की घोषणा की थी।
नतीजा? एक साल बीत गया, लेकिन एक टोकरी मिट्टी तक नहीं डाली गई! सरकारी अफसरशाही और मंत्रियों के इस संवेदनहीन रवैये के कारण आज 300 बीघा से अधिक उपजाऊ कृषि भूमि नदी के पेट में समा चुकी है। 31 गरीब परिवारों के घर ताश के पत्तों की तरह ढह गए। बच्चों का खेल का मैदान, एक आईसीडीएस केंद्र, एक सरकारी ग्रामीण पुस्तकालय और एक स्थानीय क्लब पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। मालिंचा गांव के निवासियों ने तीखे आक्रोश के साथ कहा, "नेता, मंत्री और बड़े अफसर सफेद गाड़ियों में सिर्फ घूमने आते हैं, देखकर चले जाते हैं। जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं होता।"
पूंजीवादी अवैध बालू खनन का नतीजा
स्थानीय वामपंथी कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की नाक के नीचे पिछले कई सालों से सुवर्णरेखा नदी से बेधड़क और नियम-कानूनों को ताक पर रखकर अवैध बालू का खनन (Illegal Sand Mining) किया जा रहा है। मुनाफाखोरों को फायदा पहुंचाने के लिए किए गए इस अंधाधुंध खनन ने नदी के स्वाभाविक प्रवाह को बदल दिया है। नदी का रुख अब गांव की तरफ मुड़ गया है, जिससे तटीय इलाकों का अस्तित्व ही खतरे में है। जब बारिश शुरू हुई, तो सिंचाई विभाग के अधिकारी दो हफ्ते पहले दौरा करने पहुंचे और रूटीन जवाब दे दिया कि "टेंडर प्रक्रिया चल रही है।" सवाल यह है कि जब गरीब जनता के घर और खेत नदी में समा रहे हैं, तब यह सरकार कौन सी फाइलों के नीचे सो रही है?
दूसरा अध्याय: चूर्णी नदी का घोंटा जा रहा दम—कॉरपोरेट कचरा और 'डबल इंजन' का सफेद झूठ
दूसरी ओर, नदिया जिले के राणाघाट में बहने वाली ऐतिहासिक चूर्णी नदी सरकारी उपेक्षा और अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट प्रदूषण का शिकार होकर दम तोड़ रही है। यह नदी कभी स्थानीय अर्थव्यवस्था और जैव विविधता की जीवनरेखा थी, लेकिन आज यह एक बदबूदार नाले में तब्दील हो चुकी है। स्थानीय निवासियों और मछुआरों का आरोप है कि बांग्लादेश की 'केरू एंड कंपनी' नामक चीनी मिल से निकलने वाला जहरीला रासायनिक कचरा लगातार चूर्णी नदी के पानी में बहाया जा रहा है। इसके कारण नदी का पानी पूरी तरह काला पड़ चुका है और हवा में तीव्र दुर्गंध फैली हुई है। पानी में उतरने से ग्रामीणों को चर्म रोग, भयानक खुजली और अन्य गंभीर शारीरिक बीमारियां हो रही हैं। नदी की गहराई (नव्यता) लगातार घट रही है और अनगिनत प्रजातियों की मछलियां मर चुकी हैं, जिससे नदी पर निर्भर रहने वाले हजारों गरीब मछुआरा परिवारों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों का मखौल
पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने अतीत में कई बार सख्त निर्देश जारी किए, लेकिन केंद्र और राज्य के लचर तालमेल के कारण उन आदेशों का एक चौथाई हिस्सा भी लागू नहीं हुआ। भारत और बांग्लादेश के बीच केवल कागजी बैठकें होती हैं, लेकिन जमीन पर कोई स्थायी समाधान नहीं दिखता।
जन-आक्रोश और निष्कर्ष: जब तक लड़ेंगे नहीं, तब तक बचेंगे नहीं!
राणाघाट के नदी किनारे रहने वाले स्थानीय लोगों का सब्र अब टूट चुका है। जनता तंज कसते हुए कह रही है, "अब तो देश और राज्यों में 'डबल इंजन' के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकारें हैं, फिर चूर्णी नदी को साफ क्यों नहीं किया जा रहा? क्यों हमारे बच्चों को बीमार होने के लिए छोड़ दिया गया है?"
सुवर्णरेखा के विस्थापित आदिवासी-किसान हों या चूर्णी नदी के तबाह हो चुके मछुआरे—यह पूरी स्थिति साबित करती है कि यह पूंजीवादी व्यवस्था नदियों को सिर्फ मुनाफे का जरिया मानती है और इंसानी जानों को कचरा। वामपंथी ताकतों ने ऐलान किया है कि अगर तुरंत सुवर्णरेखा के तटबंध का काम युद्धस्तर पर शुरू नहीं हुआ और चूर्णी नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए केंद्र-राज्य ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो सिंचाई दफ्तरों से लेकर प्रशासनिक मुख्यालयों तक घेराव और तीव्र जन-आंदोलन किया जाएगा।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 16 जुलाई 2026
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