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सांस्कृतिक केंद्र पर गेरुआ रंग: कलाकारों का फूटा गुस्सा

केशव कुमार भट्टड़•19 जुलाई 20263 मिनट पठन93 बार पढ़ा गया

कोलकाता के ऐतिहासिक 'अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स' जैसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र के परिसर में सुरक्षाकर्मियों के कमरे पर कथित कब्जे और उसे गेरुआ रंग में रंगने के खिलाफ कलाकारों ने तीखा विरोध जताया है। सांस्कृतिक जगत से जुड़े विशिष्ट जनों ने इस घटना को बंगाल की कला, वैज्ञानिक सोच, तर्कवाद और समृद्ध सांस्कृतिक परिसर पर एक सोची-समझी राजनीतिक चढ़ाई करार दिया है। आंदोलनकारियों ने प्रशासन को साफ अल्टीमेटम दिया है कि यदि अगले तीन दिनों के भीतर इस सांस्कृतिक परिसर से गेरुआ रंग हटाकर इसे कब्जा मुक्त नहीं किया गया, तो आम जनता खुद इसे पूर्ववत कर देगी। विरोध सभा में शामिल बुद्धिजीवियों और नाट्यकर्मियों ने इसे केवल एक कमरे का विवाद न मानकर सांस्कृतिक स्वतंत्रता की रक्षा की लड़ाई बताया और सभी आम लोगों से इसमें शामिल होने की अपील की।

सांस्कृतिक केंद्र पर गेरुआ रंग: कलाकारों का फूटा गुस्सा

गेरुआ (भगवा) आक्रमण’ नहीं हटाया तो लोग ही रंग बदल देंगे

अकादेमी परिसर में कलाकारों-सांस्कृतिक कर्मियों की चेतावनी

कोलकाता, 18 जुलाई। गेरुआ अगर साम्राज्यवाद, तानाशाही और आक्रमण का प्रतीक बन जाता है, तो वह रंग बंगाल की कला-संस्कृति और विरासत का प्रतिनिधि नहीं हो सकता। अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स परिसर के एक हिस्से में सरकारी शह पर शासक दल की पहल से जो "गेरुआकरण" किया गया है, उसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। अन्यथा लोग खुद अपनी पहल पर उस रंग को मिटा देंगे। शनिवार को अकादेमी परिसर में आयोजित विरोध सभा से यह सख्त संदेश विशिष्ट अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर की स्नेहभाजन लेडी रानू मुखर्जी, शंभु मित्र, उत्पल दत्त की स्मृतियों से जुड़े अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स पर 'गेरुआ आक्रमण' के खिलाफ मुखर होते हुए नाट्य कर्मियों, संगीतकारों, शिक्षाविदों, वामपंथी नेताओं-कार्यकर्ताओं और ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों ने आम जनता से सीधे इस आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया।

सीआईटीयू (CITU) अनुमोदित अकादेमी ऑफ आर्ट्स वर्कर्स यूनियन की पहल पर आयोजित इस विरोध सभा में बिकाश रंजन भट्टाचार्य, प्रोफेसर मालिनी भट्टाचार्य, सीपीआई (एम) की केन्द्रीय समिति के सदस्य शमीक लाहिड़ी, अभिनेता-नाट्यकार चंदन सेन, सीमा मुखर्जी, अरूप रॉय, एसएफआई राज्य सचिव देवांजन दे, सीआईटीयू नेता सुदीप सेनगुप्ता, सौम्यजीत रजक, नाट्यकार व फिल्म निर्देशक सौरव पालोधी आदि ने अपने विचार रखे। सभा की शुरुआत यूनियन के अध्यक्ष सत्यब्रत घोष और अजय मित्रा ने की।

यूनियन का आरोप है कि बीते 28 जून को बाहरी लोगों का एक दल अकादेमी परिसर में दाखिल हुआ और यूनियन की मांगों वाले पोस्टरों को फाड़ दिया। इतना ही नहीं, टिकट काउंटर के पास सुरक्षाकर्मियों के कमरे पर कब्जा करके रातों-रात उसे गेरुआ रंग में रंग दिया गया। आरोप यह भी है कि वर्तमान में इसे भाजपा के पार्टी कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस संदर्भ में बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा-

“राज्य भाजपा अध्यक्ष ने आश्वासन दिया है कि कार्रवाई की जाएगी। हम उसका मतलब समझ रहे हैं—कमरा कब्जे से मुक्त होगा और गेरुआ रंग हटाया जाएगा। अगर अगले तीन दिनों के भीतर ऐसा नहीं हुआ, तो लोगों को साथ लेकर हम खुद उस रंग को बदल देंगे। शंभु मित्र और लेडी रानू मुखर्जी की स्मृतियों से जुड़ा अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स एक ऐतिहासिक संस्थान है। हेरिटेज (धरोहर) संपत्ति का ऐसा विरूपण कानून के खिलाफ है। 2011 के बाद से ही सांस्कृतिक क्षेत्र में आक्रमण की राजनीति शुरू हुई है। वैज्ञानिक सोच और तर्कवाद को नष्ट करके धार्मिक अंधविश्वास को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। बाहुबल से गेरुआ थोप देने से उसका वास्तविक महत्व स्थापित नहीं होता, बल्कि गेरुआ की परंपरा को ही कलंकित किया जाता है।”

यूनियन का आरोप है कि सुरक्षाकर्मियों के कमरे पर कब्जा करने के दौरान वहां रहने वाले कर्मचारियों का सामान बाहर फेंक दिया गया। उनमें एक हिंदू सुरक्षाकर्मी भी थे, जिनके आराध्य देवता की तस्वीर और मूर्ति भी बाहर फेंक दी गई। इसके साथ ही उनके मुस्लिम सहकर्मी भी बेघर हो गए हैं।

शमीक लाहिड़ी ने कहा, “यह केवल एक कमरे पर कब्जे का सवाल नहीं है, यह सांस्कृतिक क्षेत्र की रक्षा की लड़ाई है। अंधकार से प्रकाश की ओर लौटने की लड़ाई में लोगों को ही आगे आना होगा।”

प्रो. मालिनी भट्टाचार्य और अभिनेता-नाट्यकार चंदन सेन ने भी सभी वर्गों के लोगों से इस आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया। विरोध सभा में अर्क मुखर्जी ने संगीत प्रस्तुत किया। सभा की अध्यक्षता सत्यब्रत घोष ने की।

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सांस्कृतिक केंद्र पर गेरुआ रंग: कलाकारों का फूटा गुस्सा

प्रकाशित: 19 जुलाई 2026 • 3 मिनट पठन

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