जिस इंटरनेट और सोशल मीडिया तकनीक का दुरुपयोग करके आरएसएस-भाजपा ने लोगों के मन में नफरत बोई, सामाजिक विभाजन पैदा किया और चुनाव जीते, उसी तकनीक को एक मजबूत विकल्प के रूप में इस्तेमाल करके 'इंस्टा जनरेशन' ने शासकों को पछाड़ दिया। तरह-तरह के रचनात्मक तरीकों से, रोजमर्रा के जिंदगी के संकटों का मुकाबला करते हुए उन्होंने रास्ते पर आंदोलन को उत्सव की तरह मनाकर दिखाया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन के समर्थन में देशभर में और हमारे कोलकाता शहर के धर्मतला में भी छात्र समाज ने आंदोलन करके प्रशासन के मुँह पर करारा थप्पड़ जड़ा है।
जन आंदोलन ही
जनता का मिलन स्थल है
- मोहम्मद सलीम

राज्य विधानसभा चुनाव का परिणाम निकले तीन महीने हो चुके हैं।नयी सरकार का गठन हो चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि 'आफत' टल गई है, लेकिन 'विपत्ति' आ खड़ी हुई है। नए मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी जिस तरह से धमकियां दे रहे हैं, उससे इस विपत्ति का दायरा लगातार साफ होता जा रहा है। चुनाव से पहले सरकार ने जो वादे किए थे, वे अब मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के बयानों से गायब हो चुके हैं। चुनाव जीतने के बाद 'फूलों का खेल' खेलने के बजाय वे कुछ दिनों तक दिखावे के लिए 'अंडों के खेल' में लगे रहे, और फिर उसके तुरंत बाद आरएसएस-भाजपा का घिनौना चेहरा सामने आ गया। तृणमूल कांग्रेस को ठीक करने के नाम पर उनकी लगभग पूरी पार्टी को या तो भाजपा में शामिल कर लिया गया है, या फिर उन्हें वफादार विपक्ष बनाकर कागजों पर दस्तखत करवाकर रिजर्व बेंच पर बैठा दिया गया है। गर्मी में बर्फ जितनी तेजी से पिघलती है, उससे भी कहीं ज्यादा तेजी से तृणमूल कांग्रेस पिघलकर भाजपा में विलीन हो रही है। पश्चिम बंगाल में ट्रॉय के घोड़े के पेट के भीतर आरएसएस पिछले पंद्रह सालों से इसी तरह घुसा हुआ था। तृणमूल कांग्रेस के पुराने नेताओ के भीतर ही भाजपा ने अपने 'सनातनियों' को ढूँढ लिया है।
बात यह तय हुई थी कि भाजपा सरकार में आने के बाद तमाम भ्रष्टाचार, आपराधिक शासन और अत्याचारों का अंत करेगी; राज्य की जनता ने इसी से मुक्ति पाने के लिए भाजपा को वोट दिया था। लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा ने ममता बनर्जी के पुराने तौर-तरीकों को अपना लिया है। मुख्यमंत्री शुरुआत से ही विरोधियों को ठिकाने लगाने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से कम्युनिस्टों, ईसाइयों और मुसलमानों को हमले के निशाने पर लिया है। विभाजन के मकसद से नफरत और घृणा फैलायी जा रही है, आम लोगों की रोजी-रोटी पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। इन तमाम अन्यायों के खिलाफ लोग आवाज न उठा सकें, इसके लिए वामपंथियों को खत्म करने की धमकियाँ दी जा रही हैं। यह कोई नई बात नहीं है, वही पुराना तरीका है; ममता बनर्जी ने भी मुख्यमंत्री की कुर्सी सँभालते ही यही धमकी दी थी, लेकिन वे वामपंथियों को खत्म नहीं कर सकीं।
इस बीच, देशभर में भाजपा के भ्रष्टाचार — खासकर सीबीएसई प्रश्नपत्र लीक समेत शिक्षा क्षेत्र में हो रहे घोटालों — के खिलाफ युवा पीढ़ी, यानी 'जेन ज़ी' आगे आकर सड़कों पर उतर आई है। नीट घोटाले की जानकारी होने के बावजूद केंद्र सरकार ने जाँच कराकर दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं की, वे साफ इन्कार करने के मूड में थे। लेकिन युवा पीढ़ी की प्रतिभाओं ने अपनी काबिलियत के दम पर इस घोटाले के सबूत देशवासियों के सामने रख दिए। जब देशभर का छात्र समुदाय विरोध में मुखर हुआ, तो समाज के अन्य तंग आ चुके तबके भी उनके साथ आ खड़े हुए; सोनम वांगचुक जैसी हस्तियां भी इस आंदोलन में शामिल हुईं। वामपंथी शुरू से ही इस आंदोलन के साथ खड़े रहे हैं। आंदोलन की तीव्रता और व्यापकता को देखकर घबराई भाजपा और उनकी सरकार के आकाओं ने पहले तो आंदोलन को 'डीप स्टेट', 'विदेशी साजिश' और 'देशद्रोही' बताकर बदनाम करने की कोशिश की। आखिरकार, दिल्ली में पुलिस ने कीलों से लैस लाठियां चलाईं, आँसू गैस के गोले दागे और यहाँ तक कि बर्बरतापूर्वक पैलेट गन का इस्तेमाल करके युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश की। लेकिन युवाओं के साहस और अटूट जिद के आगे सरकार को झुकने पर मजबूर होना पड़ा। युवा पीढ़ी ने धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने आरएसएस, भाजपा और उनके प्रशासन को पूरी तरह दिशाहीन कर दिया है।
आंदोलनकारियों ने जिस तरह एकजुट होकर, अनुशासित और अडिग होकर संघर्ष किया, उसने देशभर में एक नई उम्मीद जगाई है। घने अँधेरे और निराशा के बीच उम्मीद की रोशनी फैलाई है। शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार और रोजगार के अवसरों की कमी जैसी वजहों से युवाओं के भीतर लंबे समय से गुस्सा सुलग रहा था। लेकिन उनका आंदोलन संगठित न हो सके, इसके लिए गोदी मीडिया ने शुरू से ही उनके विरोध-प्रदर्शनों को कोई जगह नहीं दी। मुख्यधारा की मीडिया पर निर्भर रहे बिना इस बार छात्र समुदाय ने खुद आंदोलन को संगठित किया। जिस इंटरनेट और सोशल मीडिया तकनीक का दुरुपयोग करके आरएसएस-भाजपा ने लोगों के मन में नफरत बोई, सामाजिक विभाजन पैदा किया और चुनाव जीते, उसी तकनीक को एक मजबूत विकल्प के रूप में इस्तेमाल करके 'इंस्टा जनरेशन' ने शासकों को पछाड़ दिया। तरह-तरह के रचनात्मक तरीकों से, रोजमर्रा की जिंदगी के संकटों का मुकाबला करते हुए उन्होंने रास्ते पर आंदोलन को उत्सव की तरह मनाकर दिखाया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन के समर्थन में देशभर में और हमारे कोलकाता शहर के धर्मतल्ला में भी छात्र समाज ने आंदोलन करके प्रशासन के मुँह पर करारा थप्पड़ जड़ा है। उन्होंने आंदोलन में जीत हासिल की है, लेकिन उनका आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्टाचार और कॉर्पोरेट शिकंजे से मुक्त कराने के लिए छात्र समुदाय ने अब नई शिक्षा नीति को रद्द करने, एनटीए को खत्म करने और पूरी व्यवस्था में बदलाव का आह्वान किया है।
इसी पृष्ठभूमि में हम काकाबाबू, कॉमरेड मुज़फ़्फ़र अहमद का 138 वाँ जन्मदिन मनाने जा रहे हैं। वे उस पीढ़ी के चिंतक और विचारक थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असहयोग आंदोलन के वापस लिए जाने से उपजी निराशा को दूर कर किसानों और मजदूरों को एकजुट किया और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में उतरे। रूसी क्रांति की प्रेरणा लेकर, मार्क्सवादी विचारों व विचारधारा से लैस होकर पिछली सदी के दूसरे दशक में उन्होंने भी ब्रिटिश विरोधी संघर्ष की नींव रखी थी। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से लेकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन तक, भगत सिंह से लेकर चटगाँव युवा विद्रोह के संग्राम तक में हमें इसके उदाहरण देखने को मिलते हैं। बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने अपने औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने के लिए कम्युनिस्टों के खिलाफ एक के बाद एक साजिश के मुकदमे दर्ज किए थे। लाहौर षड्यंत्र केस, काकोरी षड्यंत्र केस, पेशावर षड्यंत्र केस, कानपुर षड्यंत्र केस और मेरठ षड्यंत्र केस के नाम पर कम्युनिस्टों और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया था। जिस तरह आज 'विदेशी साजिश' और 'डीप स्टेट' की बातें की जा रही हैं, ठीक वैसे ही उस वक्त भी ब्रिटिश शासकों ने ताशकंद में स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी का हवाला देकर यही बातें कही थीं। उन्होंने सोवियत की मदद से कम्युनिस्टों द्वारा रची जा रही साजिशों का हौवा खड़ा किया था। ब्रिटिश शासक सिर्फ मुकदमों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कई काले कानून भी बनाए। 1818 के रेगुलेशन 3 और 1925 के क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट के तहत बहुत लोगों को जेल के अंदर बंद कर दिया गया। 19 मई 1927 को 'गणवाणी' पत्रिका में काकाबाबू ने लिखा था कि इस काले कानून को पारित करने के समय थिएटर रोड के एक मकान में बैठक बुलाकर मौलवी अबुल कासिम ने इसका समर्थन किया था। लेकिन कुतुबुद्दीन अहमद समेत कुछ उदारवादी मुसलमानों को समय पर इसकी भनक लग गई और उन्होंने इसमें रुकावट डाली, जिससे उनकी यह नापाक कोशिश पूरी नहीं हो सकी। बाद में बड़िशाल में आयोजित बंगाल मुस्लिम सम्मेलन में अबुल कासिम ने अपना रुख बदला। जिन मुस्लिम नेताओं को लगता था कि ब्रिटिशों का यह कानून सिर्फ हिंदुओं पर लागू होगा, उनकी इस गलतफहमी को दूर करते हुए उस लेख में दूरदर्शी काकाबाबू ने याद दिलाया था: "यदि यह मान भी लिया जाए कि यह कानून केवल हिंदुओं के लिए ही पास किया गया है, तो भी क्या मुसलमानों को ऐसे घृणित कानून का समर्थन करना चाहिए? क्या एक समुदाय के रूप में मुसलमान इतने अनुदार हैं?... कोई भी कानून केवल किसी विशेष समुदाय के लिए पास नहीं होता। कानून की चपेट में सभी को आना पड़ता है। ...दो-तीन साल तक स्थगित रखने के बाद जब दोबारा रेगुलेशन 3 का हथियार उठाया गया, तो वह हथियार सबसे पहले हिंदुस्तान के 3 मुसलमान नेताओं के सिर पर ही गिरा था।" इसी तरह 1926 में कलकत्ता के सांप्रदायिक दंगों में भूमिका निभाने वाले एक हिंदू व्यक्ति की तस्वीर कांग्रेस कार्यालय में लगाए जाने पर उनके राष्ट्रवादी रवैये की भी काकाबाबू ने तीखी आलोचना की थी। धार्मिक संकीर्णता की दृष्टि होने पर किस तरह का खतरा पैदा हो सकता है, इसे समझने के लिए उनकी ये चेतावनियाँ आज भी बेहद प्रासंगिक हैं।
जिस अंडमान सेल्यूलर जेल को बीस के दशक में बंद कर दिया गया था, उसे तीस के दशक में फिर से चालू कर दिया गया। शासकों को लगता है कि जेल की दीवारों के पीछे बंद करके विरोध और प्रतिरोध को कुचला जा सकता है। लेकिन भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास और साथियों के साथ काकाबाबू का जीवन और संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि ऐसी कोशिशें बार-बार नाकाम हुई हैं। जेलों में डालना, छापेखाने बंद कर देना, राजनीतिक किताबों-दस्तावेज़ों को जब्त करना, पार्टी पर प्रतिबंध लगाना, दफ़्तरों में ताले लगा देना — ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन नतीजा उल्टा हुआ। जिन युवाओं ने आजादी के लिए सशस्त्र क्रांति का रास्ता चुना था, उनमें से ज्यादातर लोग अंडमान सेल्यूलर जेल जैसी तमाम जेलों से बाहर आकर वामपंथी आंदोलन, खासकर कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए। यह साबित हो गया कि धमकियों, डर और दमनकारी रास्तों से आंदोलनों को रोका नहीं जा सकता; बल्कि ये चिंगारी को दावानल में बदल देते हैं।
सौ साल पहले जब कम्युनिस्टों की पहचान और प्रभाव बहुत कम था, संगठन नाममात्र का था, तब भी काकाबाबू और उनके साथियों ने मेरठ षड्यंत्र केस के कठघरे का इस्तेमाल अपनी बात रखने के लिए किया था। कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं, इसका उन्होंने खुलेआम ऐलान किया और जनता के बीच गहरी छाप छोड़ी। बिना कोई तुलना किए भी यह कहा जा सकता है कि आज के दौर में भी हमने देखा कि जंतर-मंतर के जिस आंदोलन मंच को पुलिस ने घेर रखा था, जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने कोई जगह नहीं दी, वहाँ भी वैकल्पिक मीडिया का इस्तेमाल करके आंदोलनकारी युवा पीढ़ी अपनी बात पूरे देश के सामने रखने में सफल रही। सोशल मीडिया पोस्ट ब्लॉक करके और पोस्ट करने वालों की बड़े पैमाने पर धरपकड़ करके भी सरकार इसे रोक नहीं सकी। यह एक बार फिर साबित हुआ कि सही विचारों को इस तरह कैद करके नहीं रखा जा सकता; वे खुद एक भौतिक ताकत का रूप ले लेते हैं।
इन सब के बावजूद पश्चिम बंगाल के शासक इतिहास से कोई सबक नहीं ले रहे हैं। नबारुण भट्टाचार्य के शब्दों में — "जो लात मारते हैं, इतिहास उन्हें मिटा देता है। जो लात खाते हैं, वही मुट्ठी भींचकर खड़े हो जाते हैं।" 15 सालों तक जिन्होंने पुलिस का इस्तेमाल करके, सत्ता के घमंड में झूठे केस दर्ज करके लोकतांत्रिक अधिकारों, मूल्यबोध और विपक्ष के अधिकारों का हनन किया — यहाँ तक कि धमकियों और विज्ञापनों के दबाब से मीडिया की आजादी को नष्ट कर दिया — वे भी लाल झंडे को खत्म नहीं कर सके; बल्कि वे खुद मिटने की कगार पर हैं। उसी सरकार के पूर्व मंत्री, जो अब मुख्यमंत्री बन चुके हैं, उसी ढर्रे पर चल रहे हैं। बेहद घटिया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करके सांप्रदायिक उकसावे दिए जा रहे हैं और वामपंथियों को खत्म करने की धमकियां दी जा रही हैं। इन तीन महीनों में बलात्कार की 44 घटनाएं घट चुकी हैं। बारुईपुर की घटना में एक दोषी/आरोपी/मुख्य गवाह को एनकाउंटर में ढेर करके वाहवाही लूटने की कोशिश की गई। दूसरी तरफ, असली दोषियों के सत्तारूढ़ दल से सम्बंध होने के कारण प्रशासन उन्हें बचाने में लगा हुआ है। सीपीआई(एम) नेता लाहेक अली ने जब सच उजागर करने के लिए आवाज उठाई और स्थानीय लोगों के गुस्से को शांत करने में पुलिस की मदद की, तो उल्टा उन्हीं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वामपंथियों के आंदोलन, विरोध-प्रदर्शन और सभाएं होते ही हमले तेज कर दिए जाते हैं। ये तमाम हथकंडे हमारे देखे-परखे हुए हैं।
इस कठिन परिस्थिति और संकट के समय में अपने वर्ग के लोगों को लामबंद करके मेहनतकश जनता की लड़ाई को दोगुने उत्साह के साथ आगे बढ़ाना होगा। यह लड़ाई लूटने वालों के खिलाफ मेहनत करने वालों की है। एक लुटेरा हारा है, लेकिन मेहनतकश जनता नहीं जीती है; दूसरे लुटेरे ने बस अपनी जगह और झंडा बदल लिया है। कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया है। बल्कि और अधिक 'प्रबल पराक्रम' दिखाते हुए बुलडोजर पर सवार होकर मेहनतकश लोगों के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया गया है। लोगों को बाँटकर ही वे यहाँ तक पहुँचे हैं।
काकाबाबू की सीख यही है कि जनआंदोलन ही हिंदू-मुस्लिम के भेद से परे सभी लोगों का असली मिलन स्थल है, उन्हें एकजुट करने का एकमात्र रास्ता है। मौजूदा आंदोलन भी यही दिखा रहा है कि रोजी-रोटी की लड़ाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, शिक्षा-स्वास्थ्य की लड़ाई, रोजगार की लड़ाई और सुरक्षा व सम्मान के साथ जीने की लड़ाई लोगों को जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर एकजुट करती है; लोगों के बीच एकजुटता, प्रेम और सहानुभूति को बढ़ावा देती है। इसीलिए नए दौर के फ़ासीवादी इस जनआंदोलन से सबसे ज्यादा घबराते हैं।
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{ लेखक सीपीआई (एम) पोलिटब्यूरो के सदस्य, पूर्व सांसद तथा पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी के सचिव हैं}
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति | 5 अगस्त,2026
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