शिक्षकों की कमी की तस्वीर भी चिंताजनक है। 520 स्कूलों में 8,596 छात्र होने के बावजूद एक भी शिक्षक नहीं है। वहीं 5 हजार 152 अन्य स्कूलों में 1.76 लाख से अधिक छात्रों के लिए केवल एक-एक शिक्षक है।
जन समाचार मंच
शिक्षकों की कमी की तस्वीर भी चिंताजनक है। 520 स्कूलों में 8,596 छात्र होने के बावजूद एक भी शिक्षक नहीं है। वहीं 5 हजार 152 अन्य स्कूलों में 1.76 लाख से अधिक छात्रों के लिए केवल एक-एक शिक्षक है।
पश्चिम बंगाल के 4 हजार 133 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है, जबकि वहाँ 19 हजार 502 शिक्षक कार्यरत हैं। वहीं राज्य के 6,769 स्कूलों में केवल एक-एक शिक्षक हैं, जहाँ छात्रों की संख्या 2 लाख 29 हजार 569 है। केंद्र की यूडाइस+ (UDISE+) 2025-26 की रिपोर्ट में यह विस्फोटक जानकारी सामने आई है।
जुलाई में जारी इस रिपोर्ट को अगस्त में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में छात्रविहीन स्कूलों की संख्या 5,663 है। इनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में लगभग 73 प्रतिशत यानी 4,133 स्कूल हैं। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहाँ ऐसे 313 स्कूल हैं और उनमें 177 शिक्षक तैनात हैं।

राज्य में स्कूली छात्रों की संख्या लगातार घट रही है और ड्रॉपआउट (स्कूल छोड़ना) बढ़ रहा है। 2023-24 शैक्षणिक वर्ष में राज्य में छात्रविहीन स्कूलों की संख्या 3 हजार 254 थी, जो अगले ही शैक्षणिक वर्ष में लगभग 900 बढ़कर आगे निकल गई। छात्रविहीन स्कूलों के मामले में यह राज्य सालों से पहले स्थान पर है। पिछले साल इन स्कूलों में कुल 14 हजार 627 शिक्षक कार्यरत थे। उसी शैक्षणिक वर्ष में 6 हजार 366 स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे थे, इस साल यह संख्या भी लगभग 400 बढ़ गई है। इन स्कूलों में छात्रों की संख्या में भी भारी गिरावट आई है। 2023-2024 शैक्षणिक वर्ष में ऐसे स्कूलों में 2 लाख 48 हजार 696 छात्र थे।

राज्य के वर्तमान स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने हालांकि इस विषमता के लिए कुछ निजी स्कूलों द्वारा डेटा अपलोड करने में की गई गलती को जिम्मेदार ठहराया है। उनका दावा है कि कुछ स्कूलों ने शिक्षकों की जानकारी तो दे दी, लेकिन छात्रों का डेटा ठीक से अपलोड नहीं किया। इसके चलते रिपोर्ट में छात्रों की संख्या शून्य दिख रही है, जबकि शिक्षक मौजूद हैं।
मंत्री ने आगे बताया कि समस्या के समाधान के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि भ्रष्टाचार के कारण पिछले 15 वर्षों में लगभग कोई शिक्षक नियुक्ति नहीं हुई है। शिक्षकों की संख्या का 'रैशनलाइजेशन' (संतुलन) करने का काम शुरू हो गया है। अतिरिक्त शिक्षकों वाले स्कूलों से शिक्षकों को हटाकर शिक्षकविहीन या एक-शिक्षक वाले स्कूलों में भेजा जा रहा है।
इससे पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल उठे थे। 2019-20 से 2023-24 तक समग्र शिक्षा अभियान (SSA) के क्रियान्वयन पर किए गए परफॉर्मेंस ऑडिट से पता चलता है कि उच्च प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक 28 से 42 प्रतिशत छात्रों का 'ट्रांजिशन लॉस' (आगे की कक्षा में न जाना) हुआ है।
स्कूल छोड़ने के मुख्य कारणों में गरीबी, वित्तीय समस्याएं, पढ़ाई जारी रखने में अनिच्छा, काम के सिलसिले में दूसरी जगह जाना और शादी शामिल हैं। सर्वेक्षण में शामिल 53 प्रतिशत ड्रॉपआउट छात्रों ने बताया कि गरीबी या वित्तीय तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। 14 प्रतिशत आगे पढ़ाई नहीं करना चाहते थे, 13 प्रतिशत काम के सिलसिले में चले गए और 12 प्रतिशत ने शादी के कारण पढ़ाई छोड़ दी।

शिक्षकों की कमी की तस्वीर भी चिंताजनक है। 520 स्कूलों में 8,596 छात्र होने के बावजूद एक भी शिक्षक नहीं है। वहीं 5 हजार 152 अन्य स्कूलों में 1.76 लाख से अधिक छात्रों के लिए केवल एक-एक शिक्षक है।
दूसरी ओर, 150 से कम छात्रों वाले स्कूलों में 40,530 प्रधानाध्यापक नियुक्त किए गए थे, जो शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के नियमों के अनुकूल नहीं है—ऐसा कैग (CAG) ने बताया है।
प्राथमिक स्तर के 29 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक स्तर के 30 प्रतिशत स्कूल निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात को पूरा नहीं कर सके। शिक्षकों की कमी क्रमशः 31,684 और 2,058 है। उच्च माध्यमिक स्तर पर फिर 79 प्रतिशत स्कूलों में निर्धारित अनुपात की तुलना में शिक्षकों की संख्या अधिक है।
यूडाइस+ रिपोर्ट के अनुसार, छात्र-शिक्षक अनुपात के मामले में पश्चिम बंगाल देश में दूसरे सबसे खराब स्थान पर है। राज्य में औसतन प्रति 30 छात्रों पर एक शिक्षक है। झारखंड में यह अनुपात 1:36 है। राज्य के कुल 93,147 स्कूलों में से लगभग 8 प्रतिशत में छात्रों की संख्या 10 या उससे कम है। वहीं 8.5 प्रतिशत स्कूलों में छात्रों की संख्या 500 से अधिक है।
डिजिटल बुनियादी ढांचे की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। केवल 403 स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी है। कंप्यूटर 23,894 स्कूलों में हैं और इंटरनेट कनेक्शन 18,374 स्कूलों में उपलब्ध है।

दोनों रिपोर्टों को आमने-सामने रखने पर बंगाल की स्कूली शिक्षा का संकट और स्पष्ट हो जाता है। कहीं शिक्षक हैं तो छात्र नहीं हैं, वहीं कहीं हजारों छात्र हैं और शिक्षक सिर्फ एक। यानी समस्या केवल शिक्षक नियुक्ति की नहीं है; शिक्षक वितरण, स्कूलों की वास्तविक मांग, बुनियादी ढांचे और ड्रॉपआउट—इन सब का एक मिला-जुला संकट सामने आया है। और इस तस्वीर के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि जिस स्कूल में छात्र ही नहीं हैं, वहाँ इतने शिक्षक क्यों हैं? और जहाँ सैकड़ों छात्र हैं, वहाँ केवल एक ही शिक्षक क्यों?
ABTA के महासचिव सुजीत दास का कहना है कि सरकार द्वारा स्कूल शिक्षा की उपेक्षा ही इसकी मूल वजह है। चुनाव जीतने के 45 दिनों के भीतर शिक्षकों की नियुक्ति का वादा किया गया था, लेकिन लगभग 4 महीने बीत जाने के बाद भी भाजपा सरकार ने कोई नई नियुक्ति अधिसूचना जारी नहीं की। दूसरी ओर 'विद्यांजलि' के माध्यम से किसी भी व्यक्ति को स्वयंसेवक (वॉलंटियर) के रूप में पढ़ाने के लिए बुलाया जा रहा है, और अतिरिक्त तबादलों के जरिए शिक्षकों का रैशनलाइजेशन किया जा रहा है, लेकिन नई नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। इसके अलावा CAG रिपोर्ट कहती है कि पिछले पांच वर्षों में शिक्षा बजट का केवल 46 से 65 प्रतिशत ही खर्च किया गया है। वर्तमान सरकार की ओर से स्कूलों के विकास मद में कोई फंड नहीं पहुंचा है। पीएम श्री (PM SHRI) के नाम पर केवल चुनिंदा स्कूलों का विकास किया जाएगा। सरकार इस तरह समस्या का वास्तविक समाधान करना चाहती है या निजीकरण का रास्ता साफ करना चाहती है?
ABPTA के महासचिव ध्रुवशेखर मंडल के अनुसार, यदि पूर्ववर्ती तृणमूल सरकार की तरह यह सरकार भी शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था की उपेक्षा करती रही, तो यह समस्या और बढ़ेगी। सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाना होगा। उचित बुनियादी ढांचा न होने पर निजी शिक्षण संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा में टिक पाना संभव नहीं होगा। अगर छत टपकने से छात्रों के सिर पर पानी गिरे या छत गिरने की आशंका हो, तो अभिभावक ऐसे स्कूल में बच्चे क्यों भेजेंगे? इसके अलावा बढ़ती गरीबी और जागरूकता की कमी से बढ़ रहे ड्रॉपआउट को रोकने के लिए स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच समन्वय आवश्यक है। छात्रों को आकर्षित करने के साथ-साथ स्कूल में पढ़ाई योग्य बुनियादी ढांचा और माहौल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार को उठानी ही होगी।
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साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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