प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।
जन समाचार मंच
प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।
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प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।

राम जन्मभूमि विवाद और मंडल आयोग को प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा लागू करने की घोषणा के समय राजेन्द्र यादव का 'हंस' में लिखा संपादकीय ऐतिहासिक दस्तावेज है।
उनके लिखे संपादकीय पर 'आदर्श क्लब', काशीपुर ने एक संगोष्ठी का आयोजन किया था,जिसकी पूरी रिपोर्ट 'हंस' में छपी थी। कोयलांचल कुल्टी के मशहूर कथाकार संजीव की पचासवीं जयंती पर उनके साहित्य प्रेमियों ने रानीगंज में दो दिन का अविस्मरणीय आयोजन किया था। राजेन्द्र यादव प्रधान अतिथि के तौर पर मौजूद थे। यहाँ उल्लेख करना जरूरी लगता है कि 1988 में 'हंस' में आसनसोल के युवा कथाकार सृंजय की कहानी "कामरेड का कोट" कहानी प्रकाशित हुयी थी। देश के वामपंथी आंदोलन पर यह गहरा आघात था।कहानी पर लगातार बहस होती रही। कलकत्ता के शिशिर मंच में फरवरी 1989 में जनवादी लेखक संघ पश्चिम बंगाल द्वारा आयोजित भैरव प्रसाद गुप्त के नागरिक अभिनंदन समारोह में कथाकार मार्कंडेय ने 'हंस' में इस कहानी के प्रकाशन पर जलेस के उपाध्यक्ष और 'हंस 'के संपादक राजेन्द्र यादव पर आक्रमण किया।राजेन्द्र यादव के पास संभवतः उत्तर नहीं था। वे जलेस छोड़ने की मानसिकता में बोल रहे थे। किसी तरह जलेस पश्चिम बंगाल के सचिव कथाकार इसराइल ने स्थिति को संभाला था।
जनसत्ता कलकत्ता के समाचार संपादक अमित प्रकाश सिंह से बात कर मैं कार्यक्रम में गया। अगले दिन जनसत्ता ने मेरी लिखी रिपोर्ट को "मैं प्रेमचंद को छूना चाहता हूँ -- संजीव "शीर्षक से प्रकाशित किया।यह कलकत्ता की साहित्यिक पत्रकारिता की पहली घटना थी जब कोयलांचल की साहित्यिक खबर अगले दिन दैनिक जनसत्ता समाचार पत्र में प्रकाशित हुयी थी मैंने एक लम्बी रिपोर्ट 'हंस' को भेजी थी।रिपोर्ट में राजेन्द्र यादव पर की गयी आलोचना का हिस्सा भी था।एक भी शब्द को बिना सम्पादित किए पूरी रिपोर्ट 'हंस' में प्रकाशित हुयी। यहीं से उनके साथ विश्वास का रिश्ता बना।
सांप्रदायिकता के खिलाफ, आरक्षण के पक्ष में हंस' की भूमिका ऐतिहासिक रही। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को 'हंस' ने चर्चा में ला दिया था। प्रेमचंद के जन्मदिन पर 31 जुलाई को 'हंस' के सेमिनार के विषय ज्वलंत विषयों पर होते थे।
मनमोहन ठाकौर की आत्मकथा "अंतरंग " पुस्तक पर ज्ञान मंच कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम में राजेन्द्र यादव का भाषण बहुत प्रभावशाली था।उन्होंने कहा था कि सच लिखना है तो उपन्यास लिखना चाहिए। आत्मकथा में सच लिखना कठिन है।
राजेन्द्र यादव कलकत्ता में कई साल तक रहे थे।यहाँ के हिन्दी और बांग्ला के लेखकों से उनका संपर्क था। आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप की मासिक साहित्यिक पत्रिका 'देश' के कार्यालय में उन्होंने सुनील गंगोपाध्याय से मिलने के लिए साथ चलने को कहा था।मैं उनके साथ गया था। मैं जानना चाहता था कि कलकत्ता में रहे दो लेखकों की बातचीत किस भाषा में होती है।वहाँ बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक सुनील गंगोपाध्याय से उन्होंने अंग्रेजी में बात शुरू की। राजेन्द्र यादव के समय बांग्लाभाषी मध्यवर्ग के साथ संवाद की भाषा अंग्रेजी थी।
नयी कहानी मेरा प्रिय विषय था।मैंने नयी कहानी की त्रयी में से एक राजेन्द्र यादव से पूछा था -आपका गाँव से कोई सम्बन्ध है? उनका उत्तर था "- मेरे जीवन की सबसे बड़ी ट्रैजेडी है कि मेरा गाँव से कोई सम्बन्ध नहीं रहा "।
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{लेखक सुरेंद्रनाथ इवनिंग कालेज, कोलकाता के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष।}
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प्रकाशित: 28 अगस्त 2026 • 3 मिनट पठन

'सरकार डर गई है, वे डगमगा गए हैं। इसलिए वे फासीवादी तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाना चाहते हैं। उन्होंने लोगों के आंदोलन पर फासीवादी शैली में हमला बोला है। सरकार चाहती तो चर्चा के लिए बैठ सकती थी, बात कर सकती थी। कुछ माँगों को स्वीकार भी किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस रास्ते पर नहीं गई। असल में उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता है, इसलिए यह आक्रामकता है। पहले से ही ट्रेनें रद्द कर दी गईं, मेट्रो बंद कर दी गई, उड़ानों (एयरपोर्ट) से लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। मैंने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा, आपातकाल के समय भी नहीं देखा।'
12 अक्टूबर 2026

किसी कार्यक्रम में सरकार विरोधी भावना हो सकती है, इस आशंका से पहले से दी गई अनुमति को रद्द करना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रवृत्ति में फासीवादी मानसिकता झलकता है।
11 अक्टूबर 2026

SFI की नेत्री आइशी घोष ने एक वीडियो संदेश में बताया है कि उन्हें मुंडका पुलिस थाने में रखा गया है। उन्हें काफी समय से पीने का पानी नहीं दिया गया है। धरपकड़ के कारण सभी लोग घायल हैं। उन्होंने कहा कि सरकार यह सोचकर गलतफहमी में है कि पानी या खाना न देकर और लोगों को कैद करके वह इस विरोध को दबा सकती है।
10 अक्टूबर 2026

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक और लेखक सत्यजीत राय ने महानायक उत्तम कुमार के आकस्मिक निधन (24 जुलाई 1980) पर आनंदबाज़ार पत्रिका में 26 जुलाई 1980 को एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक आलेख लिखा था, जिसका बांग्ला शीर्षक था - "অস্তমিত নক্ষত্র" - 'अस्तमित नक्षत्र'। यह आलेख 24 जुलाई 2019 को 'अस्तमित उत्तम' (অস্তমিত উত্তম) के नाम से पुनः प्रकाशित हुआ। इस शीर्षक में बहुत ही सुंदर शब्दावली का खेल किया गया , जिसके दो समानांतर अर्थ निकलते हैं: उत्तम कुमार के नाम के संदर्भ में - यहाँ 'उत्तम' का सीधा अर्थ अभिनेता 'उत्तम कुमार' से है। यानी "उत्तम कुमार का अस्त हो जाना (निधन हो जाना)"। बांग्ला और हिन्दी दोनों में 'उत्तम' का गुणवाचक अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' या 'सबसे अच्छा' होता है। इसके अनुसार इस शीर्षक का भावार्थ है—"श्रेष्ठता का ढल जाना" या "एक स्वर्णिम युग का अंत"। अपने इस आलेख में महानायक के निधन के बाद उनकी अभिनय क्षमता का विश्लेषण किया था महान निर्देशक सत्यजीत राय ने। आनंदबाज़ार पत्रिका का आभार व्यक्त करते हुए उत्तम कुमार (03 नवंबर 1926- 24 जुलाई 1980) जन्मशती वर्ष में हिन्दी पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस ऐतिहासिक आलेख का हिन्दी में भावानुवाद । भावानुवाद करते समय मूल लेख का भाव, विश्लेषण और महान निर्देशक सत्यजीत राय की भाषा की गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की गई है। जन्मशती वर्ष में किवदंती महानायक का सादर स्मरण, श्रद्धांजलि ।
केशव कुमार भट्टड़ • 10 सितंबर 2026

28 सितंबर 2026 - शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती है। उनका प्रसिद्ध नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आदमी होने की असली तमीज़ और चेतना का महाकाव्य है। यह वर्ष 'नौजवान भारत सभा' का शताब्दी वर्ष और 'शहीद यादगार समिति' का रजत जयंती वर्ष भी है। भगत सिंह की क्रांतिकारी आवाज़ केवल शोर नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा अध्ययन, सामाजिक न्याय और विश्व के महान विचारकों का वैचारिक आधार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत ने डरकर 23 मार्च 1931 को उन्हें फाँसी दे दी, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ बाज़ारवाद, शोषण और अन्याय के खिलाफ आम आदमी की चेतना और बदलाव के लिए संघर्ष का प्रतीक है। आज के अवसरवादी राजनीतिक दौर में भगत सिंह के विचार एक न्यायपूर्ण भविष्य गढ़ने की प्रेरणा देते हैं और मशाल बनकर राह दिखाते हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 27 सितंबर 2026

"ठाकुर राम सिंह - काले पानी की यातनाओं से लेकर जन-संघर्ष तक, आजादी और अधिकारों के लिए समर्पित रहा जिनका जीवन " - अजमेर में जन्मे महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में 'डोगरा शूटिंग केस' के तहत काले पानी (अंडमान जेल) की कठोर सजा काटी। आजादी के बाद वे कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा से जुड़कर आजीवन गरीबों व किसानों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे। उन्होंने आगरा को अपनी कर्मभूमि बनाया और संजय प्लेस में ऐतिहासिक 'शहीद स्मारक' व पुस्तकालय का निर्माण कराया। सादगी पसंद ठाकुर साहब 98 वर्ष की आयु तक क्रांतिकारी विचारों और सामाजिक न्याय के प्रतीक बने रहे। आगरा का शहीद स्मारक, पुस्तकालय-वाचनालय, उनके द्वारा प्रकाशित स्मारिकाएं और उनसे जुड़े लोगों की स्मृतियां आज भी उनके संघर्ष की कहानी कहती हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। महान क्रांतिकारी ठाकुर राम सिंह को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।
नवाब उद्दीन • 16 सितंबर 2026
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