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'हंस'के अविस्मरणीय संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव की जयंती पर श्रद्धांजलि! - अशोक सिंह

अपराजिता•28 अगस्त 20263 मिनट पठन64 बार पढ़ा गया

प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।

'हंस'के अविस्मरणीय संपादक

और कथाकार राजेन्द्र यादव की जयंती पर श्रद्धांजलि!

अशोक सिंह

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प्रेमचंद के 'हंस' को अस्सी के दशक में फिर से प्रकाशित कर सम्पादक राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में सबसे ज्यादा चर्चित रहे।

राम जन्मभूमि विवाद और मंडल आयोग को प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा लागू करने की घोषणा के समय राजेन्द्र यादव का 'हंस' में लिखा संपादकीय ऐतिहासिक दस्तावेज है।

उनके लिखे संपादकीय पर 'आदर्श क्लब', काशीपुर ने एक संगोष्ठी का आयोजन किया था,जिसकी पूरी रिपोर्ट 'हंस' में छपी थी। कोयलांचल कुल्टी के मशहूर कथाकार संजीव की पचासवीं जयंती पर उनके साहित्य प्रेमियों ने रानीगंज में दो दिन का अविस्मरणीय आयोजन किया था। राजेन्द्र यादव प्रधान अतिथि के तौर पर मौजूद थे। यहाँ उल्लेख करना जरूरी लगता है कि 1988 में 'हंस' में आसनसोल के युवा कथाकार सृंजय की कहानी "कामरेड का कोट" कहानी प्रकाशित हुयी थी। देश के वामपंथी आंदोलन पर यह गहरा आघात था।कहानी पर लगातार बहस होती रही। कलकत्ता के शिशिर मंच में फरवरी 1989 में जनवादी लेखक संघ पश्चिम बंगाल द्वारा आयोजित भैरव प्रसाद गुप्त के नागरिक अभिनंदन समारोह में कथाकार मार्कंडेय ने 'हंस' में इस कहानी के प्रकाशन पर जलेस के उपाध्यक्ष और 'हंस 'के संपादक राजेन्द्र यादव पर आक्रमण किया।राजेन्द्र यादव के पास संभवतः उत्तर नहीं था। वे जलेस छोड़ने की मानसिकता में बोल रहे थे। किसी तरह जलेस पश्चिम बंगाल के सचिव कथाकार इसराइल ने स्थिति को संभाला था।

जनसत्ता कलकत्ता के समाचार संपादक अमित प्रकाश सिंह से बात कर मैं कार्यक्रम में गया। अगले दिन जनसत्ता ने मेरी लिखी रिपोर्ट को "मैं प्रेमचंद को छूना चाहता हूँ -- संजीव "शीर्षक से प्रकाशित किया।यह कलकत्ता की साहित्यिक पत्रकारिता की पहली घटना थी जब कोयलांचल की साहित्यिक खबर अगले दिन दैनिक जनसत्ता समाचार पत्र में प्रकाशित हुयी थी मैंने एक लम्बी रिपोर्ट 'हंस' को भेजी थी।रिपोर्ट में राजेन्द्र यादव पर की गयी आलोचना का हिस्सा भी था।एक भी शब्द को बिना सम्पादित किए पूरी रिपोर्ट 'हंस' में प्रकाशित हुयी। यहीं से उनके साथ विश्वास का रिश्ता बना।

सांप्रदायिकता के खिलाफ, आरक्षण के पक्ष में हंस' की भूमिका ऐतिहासिक रही। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को 'हंस' ने चर्चा में ला दिया था। प्रेमचंद के जन्मदिन पर 31 जुलाई को 'हंस' के सेमिनार के विषय ज्वलंत विषयों पर होते थे।

मनमोहन ठाकौर की आत्मकथा "अंतरंग " पुस्तक पर ज्ञान मंच कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम में राजेन्द्र यादव का भाषण बहुत प्रभावशाली था।उन्होंने कहा था कि सच लिखना है तो उपन्यास लिखना चाहिए। आत्मकथा में सच लिखना कठिन है।

राजेन्द्र यादव कलकत्ता में कई साल तक रहे थे।यहाँ के हिन्दी और बांग्ला के लेखकों से उनका संपर्क था। आनंद बाजार पत्रिका ग्रुप की मासिक साहित्यिक पत्रिका 'देश' के कार्यालय में उन्होंने सुनील गंगोपाध्याय से मिलने के लिए साथ चलने को कहा था।मैं उनके साथ गया था। मैं जानना चाहता था कि कलकत्ता में रहे दो लेखकों की बातचीत किस भाषा में होती है।वहाँ बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक सुनील गंगोपाध्याय से उन्होंने अंग्रेजी में बात शुरू की। राजेन्द्र यादव के समय बांग्लाभाषी मध्यवर्ग के साथ संवाद की भाषा अंग्रेजी थी।

नयी कहानी मेरा प्रिय विषय था।मैंने नयी कहानी की त्रयी में से एक राजेन्द्र यादव से पूछा था -आपका गाँव से कोई सम्बन्ध है? उनका उत्तर था "- मेरे जीवन की सबसे बड़ी ट्रैजेडी है कि मेरा गाँव से कोई सम्बन्ध नहीं रहा "।

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{लेखक सुरेंद्रनाथ इवनिंग कालेज, कोलकाता के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष।}

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'हंस'के अविस्मरणीय संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव की जयंती पर श्रद्धांजलि! - अशोक सिंह

प्रकाशित: 28 अगस्त 2026 • 3 मिनट पठन

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