"सिनेमा जब केवल मनोरंजन न रहकर विचार का हथियार बन जाता है, तो सत्ता की नींद उड़ना स्वाभाविक है!" यह आलेख सिनेमा को केवल मनोरंजन के बजाय एक गंभीर विचार और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में देखता है। इसमें 'लेनिन' के काल से लेकर स्वतंत्र भारत में ('जवाहरलाल नेहरू' की पहल और 'सत्यजित राय-ऋत्विक घटक के योगदान से) FTII और SRFTI जैसे फिल्म शिक्षण संस्थानों के उदय और उनके इतिहास पर चर्चा की गई है। लेखक 'संजय मुखोपाध्याय' बताते हैं कि कैसे ये संस्थान नए और सचेत फिल्मकार तैयार करते हैं, जो व्यवस्था के सामने उसके खिलाफ सवाल खड़े करते हैं, और यही वजह है कि सत्ता इन सांस्कृतिक केंद्रों पर निरंतर हमले करती है।
'सिनेमा की पाठशाला में'
~संजय मुखोपाध्याय~
अक्सर यह मान लिया जाता है कि सिनेमा औद्योगिक क्रांति की उपज है और चलचित्र लगभग पूरी तरह से मशीनों पर निर्भर हैं। यही वजह है कि बहुत से लोग यह सोचते हैं कि ललित कलाओं की तरह चलती-फिरती छवियों में तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) का कोई सूक्ष्म काम नहीं होता; इसे तो बस कैमरे में कैद करते ही दृश्यों को सजाकर कहानी कहने के साथ ही खत्म किया जा सकता है। गनीमत है कि लेनिन की सोच ऐसी नहीं थी। सोवियत क्रांति के महज दो साल के भीतर लेनिन ने राजनीतिक नेताओं में सबसे पहले सिनेमा का राष्ट्रीयकरण किया और लगभग तुरंत ही एक फिल्म शिक्षण संस्थान की स्थापना की, जिसका नाम था - 'वीजीआईसी' (VGIK)। दुनिया के उस सबसे पुराने फिल्म संस्थान में सर्गेई आइजेनस्टीन, कुलेशोव और पुडोवकिन जैसे दिग्गज शिक्षक थे। वहाँ के अत्यंत प्रसिद्ध छात्रों में तारकोवस्की और विदेशी छात्राओं में मार्ता मेसजारोस के नाम प्रमुख हैं। ऐसे और भी कितने ही छात्र हैं जो आगे चलकर फिल्म जगत के बड़े स्तंभ बने!

सोवियत फिल्म शिक्षण संस्थान का इतिहास अपने आप में अनूठा है। दरअसल, अन्य विषयों को लेकर मार्क्सवादियों के योगदान पर भले ही किसी को संदेह रहा हो, लेकिन सिनेमा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए अपूर्व श्रम की कोई तुलना नहीं हो सकती। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद पूर्वी यूरोप के लगभग हर समाजवादी देश में फिल्म प्रशिक्षण केंद्र खुले, जैसे पोलैंड में 'लॉड्ज फिल्म स्कूल' और हंगरी में 'फामा'। यहाँ तक कि 1959 की क्यूबा क्रांति के बाद वहाँ भी फिल्म स्कूल की स्थापना की गई। इन तमाम संस्थानों ने आधुनिक सिनेमा को बड़ी-बड़ी प्रतिभाएँ दी हैं। मार्क्सवादी अच्छी तरह जानते थे कि सिनेमा के लिए 'चिन्ह साक्षरता' (साइन लिटरेसी) की कोई अनिवार्यता नहीं होती; इसके लिए 'दृश्य साक्षरता' (विजुअल लिटरेसी) ही पर्याप्त है, जो एक निरक्षर इंसान तक आसानी से पहुँच सकती है। यही वजह थी कि उन्होंने फिल्म शिक्षा पर इतना अधिक जोर दिया था।

[बेहद दुर्लभ फुटेज...
(1954) मास्को फिल्म महोत्सव के लिए प्रधानमंत्री नेहरू का 14 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल। सोवियत रूस के इस फोटो में देव आनंद, नरगिस, बिमल रॉय, राज कपूर, निरूपा रॉय, के. अब्बास और बलराज साहनी दिखाई दे रहें हैं ।]
इन बातों को याद करने की वजह यह है कि आजादी के ठीक बाद भारत सरकार की सोच भी कुछ ऐसी ही थी, जो मुख्य रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रोत्साहन से उपजी थी। जब एस.के. पाटिल ने संसद में यह प्रस्ताव रखा कि देश में सिनेमा का एक बेहतर प्रशिक्षण संस्थान होना चाहिए, तो उसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया। बॉम्बे के वी. शांताराम और कलकत्ता के सर बी.एन. सरकार के प्रत्यक्ष सहयोग से पुणे के 'प्रभात स्टूडियो' का राष्ट्रीयकरण करके 'पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट' की नींव रखी गई, जिसे आज 'फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' (FTII) के नाम से जाना जाता है। पुणे के लॉ कॉलेज रोड से गुजरते हुए आज भी रास्ते के एक तरफ 'नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया' और दूसरी तरफ 'फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' नजर आते हैं।

इस तरह के फिल्म प्रशिक्षण केंद्र के साकार होने के पीछे एक बड़ा कारण यह था कि देश के प्रधानमंत्री शिक्षित थे। सोवियत संघ के साथ उनकी मैत्री और विलायत में बिताए समय के कारण उनकी रुचि का दायरा काफी विकसित था; वे यह भली-भांति समझ चुके थे कि सिनेमा केवल मनोरंजन या नाच-गाने का झुरमुट भर नहीं है। 'पथेर पांचाली' (पगदंडी का गीत) जैसी फिल्में यदि बन सकती हैं, तो हमारे जैसे विकासशील देश में सरकार अपनी पहल से जन-प्रचार या लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार के लिए इन फिल्म शिक्षण संस्थानों से तमाम रचनात्मक उपादान प्राप्त कर सकती है।

पुणे फिल्म प्रशिक्षण संस्थान के शुरुआती दौर में जब जगत मुरारी जैसे लोग इसके प्रबंधन से जुड़े थे, तब इसका स्वरूप कुछ अलग था। लेकिन जब ऋत्विक घटक ने वाइस-प्रिंसिपल (उप-प्राचार्य) के रूप में कार्यभार संभाला, तो इस संस्थान का चेहरा ही पूरी तरह बदल गया। ऋत्विक जी ने अपने खास अंदाज में पूरे पाठ्यक्रम को नए सिरे से गढ़ा। हम सब जानते हैं कि इस कायाकल्प के पीछे कलकत्ता के एक और लंबे-कद के निर्देशक की सक्रिय भूमिका थी, और उनका नाम था - सत्यजित राय। इन दोनों के संयुक्त प्रयासों से हमें फिल्म शिक्षा का एक आधुनिक पाठ्यक्रम मिला, जिसके परिणाम बहुत जल्द सामने आने लगे। अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, कुमार साहनी और जॉन अब्राहम जैसे निर्देशकों ने इस संस्थान से निकलकर भारतीय सिनेमा का पूरा परिदृश्य ही बदल डाला। आज के भारतीय सिनेमा में पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से पढ़कर निकले कितने ही प्रतिभावान लोग सक्रिय हैं। यहाँ तक कि मिथुन चक्रवर्ती भी इसी संस्थान के छात्र रहे हैं। के.के. महाजन जैसे बेहतरीन कैमरामैन और भास्कर चंद्रवरकर जैसे प्रख्यात साउंड डिज़ाइनर इसी संस्थान की देन हैं।
इसके अलावा, भारत जैसे नव-स्वतंत्र देश में फिल्मों के लिए एक वित्तीय और निवेश की रूपरेखा तैयार होना भी बेहद जरूरी था। माध्यम के तौर पर सिनेमा भारी-भरकम निवेश की मांग करता है, और फिल्म निर्माण के शुरुआती अभ्यास बजट प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट ने इस मोर्चे पर भी एक अहम भूमिका निभाई, जिससे देश में - खासकर पश्चिम और दक्षिण भारत में - फिल्मों का नक्शा काफी हद तक बदल गया। 1969-70 के दशक से जहाँ वरिष्ठों में राजिंदर सिंह बेदी की 'दस्तक' और मृणाल सेन की 'भुवन सोम' जैसी फिल्मों ने दस्तक दी, वहीं नवोदित निर्देशकों जैसे मणि कौल और जॉन अब्राहम की कृतियों ने भारतीय सिनेमा के सामने कई गंभीर सवाल खड़े किए।
कलकत्ता में तो इस दौर से बहुत पहले से ही वैकल्पिक सिनेमा का आंदोलन शुरू हो चुका था। फिल्म निर्माण, संपादन, कलर करेक्शन, सिनेमा की तकनीकी बारीकियों और यहाँ तक कि अभिनय के क्षेत्र में हमें जो युवा और शिक्षित कलाकारों का जो दस्ता मिला, उसके लिए हम पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट की सफलता को कभी नजरअंदाज नहीं कर सकते। हम इसके लिए हमेशा कृतज्ञ रहेंगे, और विशेष तौर पर ऋत्विक घटक के प्रति ऋणी रहेंगे, जिन्होंने अपने छात्रों को सचमुच सिनेमा की भाषा पढ़ना सिखाया। कुमार साहनी और मणि कौल दोनों ने ही मुझे कक्षा के बाहर के उस अनुभव के बारे में बताया है, जिसे 'विजडम ट्री' (ज्ञान वृक्ष) कहा जाता है।

पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के उसी प्रसिद्ध बोधिवृक्ष के नीचे शाम के वक्त ऋत्विक घटक अपने चुनिंदा छात्रों के साथ फिल्मों पर लंबी चर्चा किया करते थे। आज भी उस संस्थान में कदम रखते ही उस बोधिवृक्ष के पास ऋत्विक जी की प्रसिद्ध तस्वीर दिखाई देती है, जिसे पुणे के छात्र हर साल बड़े स्नेह से कोयले से उकेरकर ताजा करते हैं।
1995 में सत्यजित राय के निधन के बाद, पूर्वी क्षेत्र में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पहल पर एक और फिल्म प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गई, जिसका नाम 'सत्यजित राय फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट' (SRFTI) है। भारत सरकार का निवेश इस केंद्र में आज भी तुलनात्मक रूप से अधिक है, और यहाँ आधुनिक तकनीकी उपकरण व बेहतर बुनियादी ढांचा मौजूद है। यहाँ पढ़ने वाले युवा छात्र पूरे देश से आते हैं, सिर्फ बंगाल से नहीं। ठीक वैसे ही जैसे पुणे में भी छात्र देश के कोने-कोने से आते हैं, केवल महाराष्ट्र से नहीं। इसके परिणामस्वरुप, राष्ट्रीय स्तर पर विचारों के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक एकात्मता को बढ़ावा मिला है। 'नेशनल आर्ट' यानी राष्ट्र की अपनी कला की जो संकल्पना ऋत्विक घटक ने पुणे में रोपी थी, वह अब और अधिक व्यापक रूप ले रही है। और शायद यही बात नए शासक वर्ग को रास नहीं आती।
यदि फिल्मकार और कलाकार सचमुच वैचारिक रूप से प्रशिक्षित होंगे, उनका विवेक और तंत्रिका तंत्र जीवंत होगा, तो फिर "राम एक बार राजा थे" जैसे घिसे-पिटे आख्यान हमेशा नहीं चल पाएंगे। जब राम के राजा बनने की कहानी ऋत्विक घटक जैसे निर्देशक के हाथ में पड़ती है, तो वह 'सुवर्णरेखा' जैसी गहन कृति में बदल जाती है। और जब सत्यजित राय उत्तर प्रदेश के किसी गाँव की कहानी पर काम करते हैं, तो मुंशी प्रेमचंद की कहानी से 'सदगति' जैसी फिल्म जन्म लेती है। इन तमाम क्रांतिकारी और तीखी संभावनाओं को भाँपकर ही बाद में पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में ऐसे लोगों को निदेशक पद पर बिठाया गया जो उस संस्थान के मूल मिजाज और आबोहवा से पूरी तरह बेमेल थे।
हम यह बात भूल जाते हैं कि साठ के दशक में खुद 'पोलिश स्टेट फिल्म स्कूल' के प्राचार्य गेयर्गत्ये पोलिट्ज यहाँ आए थे और उन्होंने ही इस संस्थान की समग्र रूपरेखा तैयार की थी - कि कहाँ संपादन विभाग होगा और कहाँ सिनेमैटोग्राफी। तब सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग लेती थी और दुनिया भर से फिल्म विशेषज्ञ यहाँ आते थे। मैरी सिटन जैसी विदेशी विदुषी और अन्य कई विदेशी गुरु पुणे इंस्टीट्यूट में आकर नियमित रूप से कक्षाएँ लेते थे। एसआरएफटीआई (SRFTI) में भी बाहरी प्रशिक्षक आकर छात्रों के साथ खुले मन से वैचारिक संवाद करते हैं।

यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पश्चिम बंगाल सरकार के तत्कालीन सूचना एवं संस्कृति मंत्री और बाद के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की विशेष रुचि तथा सत्यजित राय की सीधी पहल पर ही पूर्वी भारत में इस फिल्म शिक्षण केंद्र की स्थापना संभव हो पाई थी। बुद्धदेव बाबू ने सत्यजित राय को इस बात के लिए राजी किया था कि यदि राज्य सरकार एक ऐसा फिल्म संस्थान बनाए, तो पूरे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के युवाओं को लाभ मिलेगा और तकनीकी कामों के खर्चे भी घटेंगे। सत्यजित राय ने व्यक्तिगत रूप से तत्कालीन प्रसारण सचिव गोपीनाथ को पत्र लिखा, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पश्चिम बंगाल सरकार के साथ हुई वार्ताओं के बाद साल्ट लेक सेक्टर-5 में इंडो-इटालियन प्रोजेक्ट के तहत 'रूपकला केंद्र' की स्थापना हुई, जिसके एक समय लेखक स्वयं निदेशक रहे थे।

चाहे वह रूपकला केंद्र हो, एसआरएफटीआई हो या पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट - इन सभी ने सिनेमा को सड़क के किसी नुक्कड़ नाटक, पथ-नाट्य या पलभर के मनोरंजन के साधन के रूप में देखने के बजाये चिंतन और विचार के एक जटिल सूत्र के रूप में स्थापित किया।
इन्होंने लोगों को सोचने के लिए विवश किया। और अक्सर यही वैचारिक गहराई शासक वर्ग के लिए असहज और खतरनाक बन जाती है। जब कोई युवा फिल्मकार या कवि स्वतंत्र रूप से सोचना शुरू करता है, तो उसकी यह सोच अमूमन व्यवस्था की यथास्थिति (स्टेटस को) को चुनौती देती है। पुणे और कलकत्ता दोनों ही जगहों पर शायद हुकूमत ने यह महसूस किया होगा कि यहाँ उनकी मर्जी की कठपुतलियाँ तैयार नहीं हो रही हैं। इन संस्थानों से जो युवा निकल रहे हैं, वे जागृत इंसान हैं, जो सिनेमा के जरिए दुनिया को बदलने का सपना देखते हैं - और सिर्फ सपना ही नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज के निर्माण का संकल्प भी लेते हैं। शायद यही मुख्य कारण है कि सत्यजीत राय फिल्म इंस्टीट्यूट जैसी संस्थाओं पर बार-बार हमले किए जाते हैं।
जब पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में गजेंद्र चौहान जैसे ऐसे शख्स को निदेशक बना दिया जाता है, जिन्हें फिल्म कला की एबीसीडी तक की समझ न हो, तो मंशा साफ समझ आ जाती है।


(2 अक्टूबर को अजयनगर मोड़ पर विरोध सभा और SRFTI पर हुए हमले का प्रतिवाद करते छात्र)
हम यह उम्मीद जरूर करते हैं कि जनता के कर के पैसों से खड़े ये संस्थान सिनेमा के फलक को बदलेंगे, जैसा कि दक्षिण भारत और कुछ हद तक महाराष्ट्र में हुआ है। पश्चिम बंगाल में भी नए दौर के फिल्मकारों ने हमेशा लीक से हटकर काम किया है। आज इक्कीसवीं सदी में कई कारणों से बांग्ला फिल्म उद्योग एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। लेकिन इस संकट का समाधान फिल्म शिक्षण संस्थानों पर ताला लगाना नहीं है, बल्कि उन्हें और अधिक ऊर्जावान और जीवंत बनाना है, ताकि वे नए विचारों के साथ हमें भविष्य के नए क्षितिज की ओर ले जा सकें।
आज के इन छात्र-युवाओं के बीच से ही कल का कोई नया अडूर गोपालकृष्णन, सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक या मृणाल सेन हमारे लिए तैयार नहीं हो रहा है - यह कौन कह सकता है ?

प्रो. संजय मुखोपाध्याय (Sanjoy Mukhopadhyay) भारत के प्रख्यात फिल्म विद्वान, निबंधकार और सांस्कृतिक आलोचक हैं। वह जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के फिल्म अध्ययन विभाग (Department of Film Studies) के संस्थापक अध्यक्ष तथा 'स्कूल ऑफ मीडिया, कम्युनिकेशन एंड कल्चरल स्टडीज' के पूर्व निदेशक रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार के फिल्म निर्माण संस्थान 'रूपकला केंद्र' के निदेशक और सीईओ (CEO) के रूप में भी सेवाएं दी हैं। सिनेमाई इतिहास, बांग्ला संस्कृति और सत्यजीत राय एवं ऋत्विक घटक के सिनेमा पर उनके आलोचनात्मक लेखन को अकादमिक जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
साभार: बांग्ला साप्ताहिक पत्रिका 'देशहितैषी'। 16.10.2026
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