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ब्राजील: उग्र दक्षिणपंथ की करारी हार। 'लूला' की ऐतिहासिक वापसी

केशव कुमार भट्टड़•26 अक्टूबर 20266 मिनट पठन69 बार पढ़ा गया

"ब्राज़ील किसी का पिछवाड़ा (backyard) नहीं है—विदेशी हस्तक्षेप और दक्षिणपंथी ताकतों को पछाड़कर वामपंथी 'लूला' की ऐतिहासिक जीत।"

लैटिन अमरीकी देश ब्राज़ील में राष्ट्रपति चुनाव जीतकर लूला ने धुर दक्षिणपंथी ताकतों के उदय को करारी शिकस्त दी है। अमरीकी दबाव और मेटा के एल्गोरिदम जैसे विदेशी हस्तक्षेपों के बावजूद, लूला ने ऐतिहासिक राजनीतिक वापसी की है। पहले दौर में पिछड़ने के बाद, वामपंथी-प्रगतिशील एकजुटता और कार्य सप्ताह घटाने जैसे फैसलों ने उनकी बड़ी जीत तय की। यह नतीजा पूर्व राष्ट्रपति बोल्सोनारो और वाशिंगटन के लिए बड़ा झटका है, हालांकि संसद में दक्षिणपंथियों का दबदबा बना हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी सहित वैश्विक नेताओं ने इस जीत पर बधाई दी है, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगी। लूला ने स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र सुरक्षित है और ब्राज़ील किसी भी विदेशी ताकत का पिछलग्गू नहीं बनेगा।

ब्राजील: उग्र दक्षिणपंथ की करारी हार। 'लूला' की ऐतिहासिक वापसी

उग्र दक्षिणपंथ को ब्राज़ील की जनता का करारा जवाब

वामपंथी 'लूला' की ऐतिहासिक जीत


लुइस इनासियो लूला डा सिल्वा (Luiz Inácio Lula da Silva) ब्राज़ील के एक बेहद प्रभावशाली और अनुभवी वामपंथी नेता हैं, जो वर्तमान में ब्राज़ील के राष्ट्रपति हैं। एक अत्यंत गरीब परिवार में जन्म लेने वाले लूला ने अपने शुरुआती जीवन में मूंगफली बेचने और कारखाने में मेटलवर्कर (धातु कर्मी) के रूप में काम किया। आगे चलकर वे देश के एक प्रमुख ट्रेड यूनियन (मजदूर संघ) नेता बने और 1980 में उन्होंने 'वर्कर्स पार्टी' (PT) की स्थापना की।


अपने पिछले कार्यकालों (2003-2010 और 2023 से) के दौरान उन्होंने 'बोल्सा फामिलिया' जैसी विशाल सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से करोड़ों लोगों को गरीबी से उबारा। राजनीति के उतार-चढ़ाव और तमाम बाधाओं को पार करते हुए, 25 अक्टूबर 2026 को हुए ऐतिहासिक चुनाव में उन्होंने दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ़्लैवियो बोल्सोनारो को पराजित कर चौथी बार देश की बागडोर संभाली है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे पर्यावरण संरक्षण (अमेज़न वर्षावन सुरक्षा), लैटिन अमरीकी एकजुटता और BRICS में ब्राज़ील के सशक्त नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं। - 'वाम की आवाज'

"चुनाव परिणाम के तुरंत बाद अपने संबोधन में लूला ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "देश में लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। इस चुनाव में नकारात्मकता और झूठ की हार हुई है। हम देश के शासन संचालन में सभी पक्षों को साथ लेकर आम सहमति बनाने का पूरा प्रयास करेंगे।" वाशिंगटन को कड़ा संदेश देते हुए उन्होंने दो टूक कहा— "ब्राज़ील किसी का पिछवाड़ा (backyard) नहीं है।"


इस चुनाव में लूला को 51.79 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ। दोनों के बीच वोटों का यह अंतर 44,30,191 का रहा। खास बात यह है कि पहले दौर की तुलना में लूला के पक्ष में 1 करोड़ से अधिक वोट बढ़े। इस ऐतिहासिक जीत के बाद पूरे लैटिन अमरीका में राहत की लहर दौड़ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प के उम्मीदवार को शिकस्त देने वाली इस जीत का क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर गहरा असर पड़ेगा।

अल जज़ीरा की हेडलाइन:
लूला की जीत लैटिन अमरीका के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। एक तरफ जहाँ ब्राज़ील में फिलिस्तीन समर्थक लूला की जीत हुई, वहीं दूसरी ओर सर्बिया में बेंजामिन नेतन्याहू के सहयोगी अलेक्जेंडर वुसिक को हार का सामना करना पड़ा।

विदेशी हस्तक्षेप और बाधाओं को किया पार

वाशिंगटन शुरू से ही लूला को हराने के लिए हरसंभव कोशिश में जुटा था। डोनाल्ड ट्रंप और मार्को रुबियो ने हस्तक्षेप के पुराने राजनीतिक हथियार—टै्रफ (शुल्क) बढ़ाने की धमकी—का खुलकर इस्तेमाल किया। ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए ब्राज़ील पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क थोप दिया था, हालांकि बाद में उन्हें कुछ नरमी बरतनी पड़ी।

इस साल अमरीका ने ब्राज़ील पर अवैध व्यापार का मनगढ़ंत आरोप लगाते हुए एक बार फिर शुल्क लगा दिया। इस मुहिम में ट्रंप और रुबियो के साथ अमरीकी राष्ट्रपति के भरोसेमंद सहयोगी मार्क ज़करबर्ग और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘मेटा’ भी शामिल हो गए। लूला और उनकी वर्कर्स पार्टी (पीटी) के प्रचार अभियानों को दबाने के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया गया। इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए अपनी शानदार जीत के बाद लूला ने ऐलान किया, "हमने विदेशी हस्तक्षेप को पूरी तरह हरा दिया है।"


एक अभूतपूर्व राजनीतिक वापसी

लूला की यह जीत किसी चमत्कारिक राजनीतिक वापसी से कम नहीं है। 5 अक्टूबर को हुए पहले चरण के मतदान में लूला बोल्सोनारो से मामूली अंतर से पीछे रह गए थे। उस समय कुल मतदाताओं में से करीब 21.08 प्रतिशत (यानी 3 करोड़ 34 लाख) लोगों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था, जो 1998 के आम चुनाव के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा था। इससे लूला के राजनीतिक भविष्य को लेकर संदेह के बादल मंडराने लगे थे।

हालांकि, अंतिम चरण आते-आते यह उदासीनता कम हुई और मतदान न करने की दर घटकर 19.21 प्रतिशत रह गई। दक्षिणपंथी ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए वामपंथी और तमाम प्रगतिशील दल एकजुट हो गए। लूला के समर्थन में देश भर में प्रचार का एक ऐसा तूफान खड़ा हुआ कि ‘लूलाज आर्मी’ (LuLa’s Army) के व्हाट्सएप चैनल के फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। इस साल अप्रैल में जहाँ इसके फॉलोअर्स मात्र 53 हजार थे, वहीं छह महीनों में यह आंकड़ा एक करोड़ पार कर गया। चुनाव के आखिरी तीन हफ्तों में इसमें भारी उछाल आया और संख्या 13 लाख से बढ़कर 1,08,17,000 पर पहुँच गई।

इसी बीच, लूला की निवर्तमान सरकार ने एक बड़ा जनहितैषी कदम उठाते हुए कार्य सप्ताह को छह दिन से घटाकर पांच दिन कर दिया। इस नीतिगत फैसले ने अंतिम चरण के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई। पहले दौर में 22 लाख वोटों से पिछड़ने के बाद लूला ने अंतिम दौर में 44 लाख वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। 1980 के दशक में देश में लोकतंत्र की बहाली के बाद यह पहला मौका है जब पहले दौर में दूसरे स्थान पर रहने वाले किसी उम्मीदवार ने अंतिम चरण में इतनी बड़ी जीत हासिल की हो।

बड़ा झटका और चुनौतियाँ

यह चुनावी नतीजा पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। तख्तापलट की साजिश रचने के मामलों में फिलहाल 27 साल की जेल की सजा काट रहे बोल्सोनारो को उम्मीद थी कि यदि उनका बेटा चुनाव जीत जाता है, तो उन्हें रिहाई मिल जाएगी और सरकार में कोई ओहदा मिल जाएगा। दूसरी ओर, ट्रंप भी यह मानकर चल रहे थे कि बोल्सोनारो लैटिन अमरीका में उनके सबसे बड़े समर्थक राष्ट्राध्यक्ष साबित होंगे। यह जनादेश वाशिंगटन के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है।

हालाँकि, लूला की राह आसान नहीं होगी। चुनाव से तीन हफ्ते पहले हुए संसद के ऊपरी सदन (सीनेट) और निचले सदन के चुनावों में दक्षिणपंथी दलों ने अपना वर्चस्व मजबूत कर लिया है। ऐसे में नई सरकार को कई अहम मुद्दों पर संसद की मंजूरी हासिल करने के लिए कड़े संघर्ष और बातचीत से गुजरना होगा। देश की राजनीति का झुकाव जहाँ दक्षिणपंथ की ओर हो रहा है, वहीं लूला को एक गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण के माहौल में वामपंथी राष्ट्रपति के तौर पर देश चलाना है। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना लूला के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।


लूला की इस ऐतिहासिक जीत पर क्यूबा के राष्ट्रपति डियाज़-कैनेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनिया भर के नेताओं ने उन्हें बधाई दी है।

चुनाव परिणाम के तुरंत बाद अपने संबोधन में लूला ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "देश में लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। इस चुनाव में नकारात्मकता और झूठ की हार हुई है। हम देश के शासन संचालन में सभी पक्षों को साथ लेकर आम सहमति बनाने का पूरा प्रयास करेंगे।" वाशिंगटन को कड़ा संदेश देते हुए उन्होंने दो टूक कहा— "ब्राज़ील किसी का पिछवाड़ा (backyard) नहीं है।"

ब्राज़ील का यह जनादेश यह साबित करता है कि लैटिन अमरीका में धुर दक्षिणपंथियों की जीत कोई अटल सत्य नहीं है।


समाचार साभार बांग्ला पत्रिका 'मार्क्सवादी पथ'। प्रकाशन तिथि: 26 अक्टूबर 2026

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ब्राजील: उग्र दक्षिणपंथ की करारी हार। 'लूला' की ऐतिहासिक वापसी

प्रकाशित: 26 अक्टूबर 2026 • 6 मिनट पठन

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