शासक जाति, धर्म और भाषा के नाम पर हिंसा और नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर हमारी लड़ाई शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, सौहार्द और परंपरा को बचाने की है। हम शोषण-मुक्त समाज की ओर बढ़ने की शपथ लेते हैं। मजदूर, किसान और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की एकजुटता बनाकर ही उस दिशा में आगे बढ़ना होगा।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के
107 वें स्थापना दिवस पर
'नई पीढ़ी तक पार्टी के संघर्ष का संदेश और अधिक पहुँचाना होगा'
मोहम्मद सलीम

अक्टूबर— पार्टी के 107 वें स्थापना दिवस पर सीपीआई (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने पार्टी के सभी सदस्यों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बधाई व शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि
" नई पीढ़ी के बीच कम्युनिस्टों के संघर्ष के प्रति रुचि पैदा हुई है। उनके पास हमें पार्टी के संघर्ष का संदेश और अधिक से अधिक पहुँचाना होगा। "
1917 में कॉमरेड वी.आई. लेनिन के नेतृत्व में रूस में समाजवादी क्रांति सफल होने के बाद, कई अन्य देशों की तरह भारत में भी साम्यवादी विचारधारा को प्रोत्साहन मिला। ब्रिटिश भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन करने में बाधाएँ थीं, इसलिए 17 अक्टूबर 1920 को विदेश में ताशकंद में कुछ नेताओं की पहल पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। इसके बाद धीरे-धीरे भारत में विभिन्न कम्युनिस्ट व्यक्तियों और समूहों को एकजुट करके पार्टी संगठन का निर्माण हुआ। शनिवार को स्थापना दिवस के अवसर पर कोलकाता और जिलों में सीपीआई (एम) के कार्यालयों पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने लाल झंडा फहराया और सभाएँ कीं। हालाँकि शारदोत्सव के कारण कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया।

स्थापना दिवस पर शुरुआती दौर को याद दिलाते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि
"भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद एक के बाद एक षड्यंत्र के मामलों (कॉन्स्पिरेसी केसेज) को लेकर टूट पड़ा था। पेशावर, मेरठ, कानपुर और लाहौर षड्यंत्र मामले में, जो लोग वहाँ कम्युनिस्ट आंदोलन के अग्रदूत थे और आंदोलन को संगठित कर रहे थे, उन्हें जेल भेज दिया गया। इसके बावजूद पार्टी का काम रुका नहीं। पार्टी ने मेहनतकश लोगों को संगठित किया और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी माँगें उठाईं। इसके अलावा, स्वतंत्रता आंदोलन केवल शिक्षित मध्यमवर्गीय शहरी वर्ग का आंदोलन बन कर न रह जाए, बल्कि मेहनतकश लोगों का आंदोलन बने, इसके लिए उसने आजादी की लड़ाई में मेहनतकश जनता को इकट्ठा किया।"
मजदूर-किसान-छात्र-युवा-महिला सांस्कृतिक आंदोलन खड़े किए। साथ ही, जब भी प्राकृतिक आपदा, युद्ध, अकाल या दंगों में लोग मुसीबत में पड़े, कम्युनिस्ट पार्टी लोगों की मदद के लिए आगे आई।
इसी परंपरा की धारा में आज के दिन भी पार्टी के आगे बढ़ने के संकल्प को दोहराते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि मालदा में इस त्योहार के समय भी भूतनी के चौर (दियारा क्षेत्र) में असहाय लोगों के साथ पार्टी कार्यकर्ता ही खड़े हुए हैं। जिन पर मदद करने की जिम्मेदारी थी, वह सरकार उत्सव मनाने में व्यस्त है, लेकिन असहाय लोगों के साथ नहीं खड़ी हुई। वर्तमान समय में सरकार गुंडा-दमन कानून के नाम पर धमकियाँ दे रही है, पार्टी कार्यालयों और किताबों के स्टॉलों पर हमले व तोड़फोड़ कर रही है। पुलिस कहीं अति-सक्रिय तो कहीं निष्क्रिय रहकर हमलावरों को बढ़ावा दे रही है। हम त्योहार के दौरान कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं कर रहे हैं, हम चाहते हैं कि उत्सव शांतिपूर्वक मनाया जाए।

लेकिन अगर वामपंथियों के बुक स्टॉलों पर हमले होते हैं, तो आम जनता को साथ लेकर उसका मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा। अधिक से अधिक लोग कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में जानने में रुचि ले रहे हैं, किताबें पढ़ रहे हैं और खरीद रहे हैं। देश भर में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए, शिक्षा को बचाने के लिए, ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नई पीढ़ी सड़कों पर उतरी है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और वामपंथियों की भूमिका के प्रति उनकी उत्सुकता बढ़ी है। शोषण-मुक्त समतामूलक समाज के लिए कम्युनिस्टों के संघर्ष के बारे में वे जानना चाहते हैं। उनके पास हमें अपना प्रचार और किताबें और अधिक संख्या में ले जानी होंगी।
शासक जाति, धर्म और भाषा के नाम पर हिंसा और नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर हमारी लड़ाई शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, सौहार्द और परंपरा को बचाने की है। हम शोषण-मुक्त समाज की ओर बढ़ने की शपथ लेते हैं। मजदूर, किसान और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की एकजुटता बनाकर ही उस दिशा में आगे बढ़ना होगा।
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साभार बांग्ला दैनिक गणशक्ति
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