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अस्थिर अरुणाचल, मीडिया खामोश!- अबिन मित्र

अपराजिता•26 अक्टूबर 20266 मिनट पठन20 बार पढ़ा गया
अरुणाचल प्रदेश का सियांग सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि विकास किसके लिए है, फैसले कौन ले रहा है, और इसकी सबसे बड़ी कीमत किसे चुकानी पड़ रही है? क्या प्रगति के नाम पर जल-जमीन-जंगल के अधिकार छीन लिए जाएंगे? क्या तरक्की के नाम पर आदिवासियों का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा? क्या सियांग के लोगों की आवाज आखिरकार बाँध के रुके हुए पानी में हमेशा के लिए डूब जाएगी? या फिर देश के लोग इस खामोशी की दीवार को तोड़ेंगे?

अस्थिर अरुणाचल, मीडिया खामोश!

*अबिन मित्र *

विकास के बहाने आखिर किसका घर डूब रहा है?

एक तरफ 11,200 मेगावाट का मेगा बाँध, तो दूसरी तरफ लाखों लोगों के अपने घर-बार खोने की आशंका। एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा का ढोल, तो दूसरी तरफ आदिवासियों के अस्तित्व का संकट। अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में जो हो रहा है, वह सिर्फ बाँध विरोधी कोई आंदोलन नहीं है। यह विकास के मॉडल, पर्यावरण और इंसानों के जीने के अधिकार के बीच का सीधा टकराव है। इसके बावजूद, देश के मुख्यधारा की मीडिया के न्यूज़ फीड से यह संकट लगभग गायब है! चीन सीमा के पास सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है। सर्वे और ड्रिलिंग के लिए भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बाद से ही स्थानीय आदिवासी लोग भारी मुसीबत में हैं। इलाके में सीआईएसएफ और पुलिस की तैनाती, आंदोलनकारियों को झूठे मामलों में गिरफ्तार करना, और बंद—इन सबने मिलकर स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। अरुणाचल प्रदेश "गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (APUAPA), 2014" के तहत चार आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन और भी तेज हो गए हैं। विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा बुलाया गया 12 घंटे का बंद भी इसी गुस्से का प्रकटीकरण है। और कल की घटना ने यह दिखा दिया है कि हालात कितने विस्फोटक हो चुके हैं। बीजेपी विधायक और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के घर पर तोड़फोड़ की गई है।

वैसे, इस घटना की शुरुआत आज की नहीं है। पिछले साल सितंबर के आखिर में मुख्यमंत्री पेमा खांडू के दौरे के दौरान तनाव चरम पर पहुंच गया था। प्रदर्शनकारियों पर एक विधायक के घर पर हमला करने और पुलिस की गाड़ी में आग लगाने का आरोप लगा था। 4 अक्टूबर को पुलिस और आम जनता के बीच हुई झड़प के दौरान पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज की घटना सामने आई थी। अब एक बार फिर से तनाव पैदा हो गया है।

लेकिन क्या बीजेपी की राजनीतिक याददाश्त में अतीत के वे रुख अभी भी सुरक्षित हैं? साल 2010 में, यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान, सियांग पीपुल्स फोरम के बाँध विरोधी आंदोलन के नेता ओजिंग तासिंग के घर पर अचानक पुलिस ने छापा मारा था। बाद में, तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के सामने इस परियोजना को रद्द करने की माँग भी रखी गई थी। तब राज्यसभा में बीजेपी ने स्थानीय लोगों के इस गुस्से का समर्थन किया था। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने भी विशाल बाँधों के विकल्प के रूप में पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हुए छोटे-छोटे जलविद्युत प्रोजेक्ट्स बनाने की वकालत की थी। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल अलग है। केंद्र की बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री पेमा खांडू इस मेगा प्रोजेक्ट के मुख्य मददगारों में से हैं। यहाँ तक कि इस मुख्यमंत्री ने सरकारी कर्मचारियों को भी चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने इस परियोजना का विरोध किया, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। और इस राजनीतिक यू-टर्न का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि एक समय जो शख्स बाँध विरोधी आंदोलन का जाना-पहचाना चेहरा थे, वही ओजिंग तासिंग अब राज्य के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री हैं और इस परियोजना के समर्थक बन चुके हैं!

लेकिन क्या सियांग नदी सिर्फ मेगावाट का हिसाब-किताब है? सियांग केवल बिजली उत्पादन का जरिया नहीं है। यह नदी स्थानीय आदिवासियों की आस्था, परंपरा, संस्कृति और उनके अस्तित्व से गहराई से जुड़ी हुई है। उनकी मान्यता है कि यह जमीन और सियांग नदी उनके पूर्वजों 'आबो तानी' और 'आने सियांग' यानी मां सियांग से जुड़ी हुई है। इसलिए इस नदी को लेकर यह लड़ाई उनके लिए सिर्फ किसी बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) प्रोजेक्ट का विरोध भर नहीं है, बल्कि यह उनकी अपनी जड़ों, परंपरा और विरासत का सवाल है।

लगभग 25 साल बाद, अगस्त 2025 में विभिन्न आदिवासी गोत्र एकजुट हुए और ‘बोगुम बोकांग केबांग’ (Bogum Bokang Kebang) नाम से एक महापरिषद का आयोजन कर औपचारिक रूप से बाँध के निर्माण का विरोध जताया। ‘सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम’ (SIFF) का दावा है कि इस परियोजना के जलाशय (रिजर्वॉयर) के कारण 27 गाँव पूरी तरह डूब सकते हैं। लगभग डेढ़ लाख आदिवासी लोगों के विस्थापित होने की आशंका है। जरा सोचिए, इतने सारे गाँवों का भविष्य अनिश्चित है। लोगों की ज़मीन, मकान, सामान, स्कूल, संस्कृति, पूर्वजों की स्मृतियाँ—सब कुछ 11,200 मेगावाट के इस झटके से खतरे में पड़ने की आशंका है। क्या इस नुकसान की भरपाई या हिसाब सिर्फ बिजली उत्पादन की मात्रा से लगाया जा सकता है?

और यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है! राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बीजेपी इसका इस्तेमाल लोगों को उजाड़ने के हथियार के रूप में करे! विकास भी जरूरी है, लेकिन अगर उस विकास की कीमत सीमावर्ती इलाकों के हाशिए पर रह रहे लाखों आदिवासी लोगों को चुकानी पड़े, तो उनकी राय, उनकी सहमति, उनके अधिकार और उनका भविष्य कहाँ जाकर टिकेगा?

और देश का तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया? इतना बड़ा संघर्ष, इतने सारे लोगों का भविष्य, इतने गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक सवाल—फिर भी प्राइम टाइम और स्क्रीन टाइम में इसकी उपस्थिति कहाँ है? जो खबर लोगों के घर छिन जाने की आशंका से जुड़ी है, जो खबर प्रकृति और जनजातियों के अस्तित्व का सवाल उठाती है, वही खबर यदि न्यूज़ फीड में जगह न पा सके, तो इस चुप्पी का साफ मतलब है—योजनाबद्ध तरीके से आदिवासियों को खत्म करने में मदद देना!

अरुणाचल प्रदेश का सियांग सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है। यह इस बात की याद दिलाता है कि विकास किसके लिए है, फैसले कौन ले रहा है, और इसकी सबसे बड़ी कीमत किसे चुकानी पड़ रही है? क्या प्रगति के नाम पर जल-जमीन-जंगल के अधिकार छीन लिए जाएंगे? क्या तरक्की के नाम पर आदिवासियों का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा? क्या सियांग के लोगों की आवाज आखिरकार बाँध के रुके हुए पानी में हमेशा के लिए डूब जाएगी? या फिर देश के लोग इस खामोशी की दीवार को तोड़ेंगे?


(तस्वीर सियांग नदी उत्सव की है। इस नदी घाटी के आदिवासी कई सालों से इस उत्सव को मनाते आ रहे हैं। आज वे खुद अस्तित्व के गम्भीर संकट के सामने खड़े हैं।)


{लेखक सीपीआई (एम) केंद्र राज्य सोशल मीडिया के सदस्य हैं}

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प्रकाशित: 26 अक्टूबर 2026 • 6 मिनट पठन

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