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🔴ज्ञानरंजन की पहल पर ऋत्विक घटक का सांस्कृतिक फ्रंट पर लिखा लेख पहली बार हिन्दी के लेखकों के बीच चर्चा में आया ___श्रेया जायसवाल | वाम की आवाज़ | जन समाचार मंच
" 'पहल' का प्रकाशन एक बड़ी घटना थी। वह केवल साहित्यिक पत्रिका न थी। उसके प्रत्येक अंक में एक साथ कई फूल खिले होते थे, की किस्म की वहां सुगंध थी। वैसी फुलवारी फिर किसी ने कभी नहीं बनाई। 125 अंकों को देखने से ही नहीं, पढ़ने से पता चलता है कि 'पहल' ने अपने समय में कितने बड़े काम किए हैं।
'पहल' एक आंदोलन था। ज्ञानरंजन ने अपना सारा ईंधन कोयला से परमाणु ऊर्जा तक 'पहल' में झोक दिया।" (पहल संग-साथः रविभूषण)
🔴ज्ञानरंजन की पहल पर ऋत्विक घटक का सांस्कृतिक फ्रंट पर लिखा लेख पहली बार हिन्दी के लेखकों के बीच चर्चा में आया ___श्रेया जायसवाल
🔵हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार और 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन ने 7 जनवरी की रात को जबलपुर में अंतिम साँस ली। उनकी आयु 89 वर्ष की थी। ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवम्बर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला में हुआ था। उनके पिता प्रसिद्ध गाँधीवादी विचारक और लेखक श्रीरामनाथ सुमन थे। उनकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई।
ज्ञानरंजन के समय का इलाहाबाद हिंदी साहित्य का सबसे मजबूत केंद्र था। 20 वर्ष की उम्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते समय ज्ञानरंजन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महासचिव पी. सी. जोशी के सम्पर्क में आए। पी.सी. जोशी के महासचिव रहते हुए प्रगतिशील लेखक संघ, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) अखिल भारतीय स्टुडेंट फेडरेशन (AISF) जैसे संगठन उन्हीं की दृष्टिसंपन्न परिकल्पना का नतीजा है। इलाहाबाद में ज्ञानरंजन को 20 वर्ष की उम्र में पी.सी. जोशी ने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता दिलाई। 20 वर्ष की उम्र में ज्ञानरंजन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ओपन इलेक्शन लड़ा और शानदार जीत दर्ज की।
1960 में ज्ञानरंजन ने जबलपुर के एक कालेज में हिंदी के शिक्षक की नौकरी शुरू की। जबलपुर रहते हुए हरिशंकर परसाई से उनकी घनिष्ठता बढ़ी। ज्ञानरंजन नयी कहानी के दौर के बाद साठोत्तरी पीढ़ी के चर्चित कथाकार रहे हैं। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया ये चारों यार साठोत्तरी पीढ़ी के प्रसिद्ध कथाकार के रुप में चर्चित हैं। ज्ञानरंजन ने कुल 25 कहानियां लिखी। 'बहिर्गमन', 'घंटा', 'पिता', 'फेंस के इधर और उधर 'उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
जिस समय ज्ञानरंजन कहानी के चमकते हुए सितारे थे, उसी समय 1973 में उन्होंने जबलपुर से प्रगतिशील चेतना की पत्रिका 'पहल' का प्रकाशन शुरू किया, जो 1973 से लगातार 2021 तक प्रकाशित होती रही। 'पहल' के 125 अंक ज्ञानरंजन की प्रतिबद्धता, संकल्प और ऊर्जा के दस्तावेज हैं।
" 'पहल' का प्रकाशन एक बड़ी घटना थी। वह केवल साहित्यिक पत्रिका न थी। उसके प्रत्येक अंक में एक साथ कई फूल खिले होते थे, की किस्म की वहां सुगंध थी। वैसी फुलवारी फिर किसी ने कभी नहीं बनाई। 125 अंकों को देखने से ही नहीं, पढ़ने से पता चलता है कि 'पहल' ने अपने समय में कितने बड़े काम किए हैं।
'पहल' एक आंदोलन था। ज्ञानरंजन ने अपना सारा ईंधन कोयला से परमाणु ऊर्जा तक 'पहल' में झोक दिया।" (पहल संग-साथः रविभूषण)
इलाहाबाद में कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद ज्ञानरंजन के वैचारिक जीवन की शुरुआत हुई। 'पहल' जिस हिंदी भाषी प्रदेश से प्रकाशित हो रही थी, उसकी स्मृति 1857 के पहले ब्रिटिश विरोधी साम्राज्यवादी ताकत के खिलाफ महासंग्राम से जुड़ी है।
'पहल' के पहले संपादकीय में ज्ञानरंजन की जो मार्क्सवादी निष्ठा और दृढ़ता दिखाई देती है, वह अंत तक बनी रही है। उनके पिता रामनाथ सुमन गांधीवादी थे और उनके पुत्र ज्ञानरंजन मार्क्सवादी। उन्होंने लिखा है--" मैं अपने जीवन में बहुत लुम्पेन किस्म का व्यक्ति था। जब कम्युनिस्ट विचारधारा के निकट में आया तब मेरा ये तत्व घटा, खत्म हुआ।"
ज्ञानरंजन ने कभी 'पहल' को पत्रिका नहीं कहा है, वह या तो 'किताब' रही या 'पुस्तक'। 'पहल' 3 और 4 में उसे क्रांतिकारी रचना और विचार की किताब कहा गया। 5 वें से 8 वें अंक तक इसे 'इस महादेश' की चेतना के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रतिक्रिया और प्रतिक्रांति का सामना करनेवाली क्रांतिकारी रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक हो गयी। उनकी चिंता में 'महादेश' की चेतना का वैज्ञानिक विकास था। प्रगतिशील रचनाओं के लिए 'पहल' के दरवाजे खुले रहे हैं, उसकी मुठभेड़ प्रगति विरोधी, साम्प्रदायिक और तानाशाही शक्तियों और घरानों से होती रही है। 'पहल' की तुलना किसी अन्य पत्रिका से नहीं की जा सकती है। ज्ञानरंजन के समान हिंदी का कोई संपादक नहीं रहा। 'पहल' के प्रकाशन के पीछे कोई संस्था नहीं थी। 'पहल' का ध्यान सदैव अपने समय पर रहा है। ज्ञानरंजन की पहल पर ऋत्विक घटक का सांस्कृतिक फ्रंट पर लिखा लेख पहली बार हिंदी भाषी लेखकों के बीच चर्चा में आया। दूसरे अंक में संपादकीय में उन्होंने लिखा--" पहल का प्रकाशन मुख्य रूप से लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए नहीं, बल्कि पाठकों की उस बड़ी संख्या के लिए हुआ है, जो एक खास तरह की तैयारी के लिए तैयार होने को है। उन्होंने इसी संपादकीय में यह स्पष्ट घोषित किया कि हमारा उद्देश्य क्रांतिकारी चेतना की व्यापक शिक्षा का है, क्योंकि हमसे ज्यादा हमारे पाठकों की भूख को कोई नहीं जानता। 'पहल' के माध्यम से ज्ञानरंजन ने पूरे देश में लेखकों और पाठकों का एक विशाल नेटवर्क बनाया। 'पहल' द्वारा लेखकों को सम्मानित करने की 'पहल सम्मान' योजना ने इतिहास रचा। पहली बार लेखक के शहर जाकर सम्मानित करने की शुरुआत 'पहल' ने की। 'पहल सम्मान' में ज्ञानरंजन की भूमिका हमेशा नेपथ्य की रही। मंच पर उनकी युवा टीम दिखाई देती थी। ज्ञानरंजन की तरह विलक्षण सांगठनिक प्रतिभा का दूसरा संपादक हिंदी में दिखाई नहीं दिया।
वे जबलपुर के साहित्य और संस्कृति के संरक्षक थे। कोलकाता में आलोकधन्वा को 'पहल सम्मान' से सम्मानित किया गया था। भारतीय भाषा परिषद के सभागार में कोलकाता के हिंदीभाषी साहित्य प्रेमियों ने कविता के नाट्य मंचन का साक्षात्कार पहली बार किया। जबलपुर की "विवेचना रंगमंडल" के कलाकारों का कोलकाता से परिचय कराने में ज्ञानरंजन की मुख्य भूमिका रही है। 2007 में पश्चिम बंग हिन्दीभाषी समाज ने भारतीय रंगमंच के इतिहास में पहली बार विवेचना रंगमंडल जबलपुर की 23 साल की अभिनेत्री सिल्की जैन के नाटकों का रेट्रोस्पेक्टिव रवींद्र सदन, शिशिर मंच और ज्ञानमंच में आयोजित किया था।
ज्ञानरंजन हिंदी की साहित्यिक पत्रिका के इतिहास में मील के पत्थर के रुप में याद किए जायेंगे। 'पहल' के 125 अंक पचास साल के साम्राज्यवाद विरोधी साहित्यिक आंदोलन का दस्तावेज है।
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