जन समाचार मंच


नई दिल्ली: संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र आज समाप्त होने जा रहा है। इस दौरान काफी राजनीतिक नाटक देखने को मिला। भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा है। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ-साथ परिसीमन (delimitation) का प्रस्ताव लोकसभा में पास नहीं हो सका।
सरकार का यह कदम तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसी राज्यों के आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले किया गया था, लेकिन यह उल्टा पड़ गया। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि सरकार महिलाओं के आरक्षण के नाम पर देश के संघीय ढांचे को बदलने की कोशिश कर रही थी।
संवैधानिक संशोधन विधेयक के हार जाने के बाद भाजपा सांसदों ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया और विपक्ष पर महिलाओं के खिलाफ होने का आरोप लगाया। विपक्ष ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया।

विपक्षी नेताओं ने कहा कि वे महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का पूरा समर्थन करते हैं, लेकिन इसे पुराने 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन से जोड़ने का विरोध करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बहुत बढ़ाना चाहती है और नए सिरे से सीटों का बंटवारा करना चाहती है, जिससे दक्षिण भारत और विपक्ष शासित राज्यों की राजनीतिक भागीदारी कम हो जाएगी। विपक्ष ने केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि इतने बड़े संशोधन लाने से पहले राज्य सरकारों से सलाह नहीं ली गई और न ही सभी दलों की बैठक बुलाई गई। दक्षिण भारतीय राज्यों के अधिकारों पर पड़ने वाले असर को लेकर विपक्षी दल एकजुट हो गए और सरकार का प्रस्ताव लोकसभा में हार गया। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे कई दक्षिणी राज्यों में परिसीमन के प्रस्ताव के खिलाफ आम लोगों में भी विरोध दिख रहा है। आंध्र प्रदेश की कुछ पार्टियों ने विधेयक का समर्थन किया, लेकिन क्षेत्र में आम जनता का रुख ज्यादातर नकारात्मक रहा।
सीपीआई(एम) के महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा कि विपक्ष की एकजुटता ने सरकार और संघ परिवार की राजनीतिक मंशा वाली “असंवैधानिक” कोशिश को रोक दिया। उन्होंने याद दिलाया कि विपक्ष ने 2023 में ही महिलाओं का आरक्षण 2024 के चुनावों में लागू करने की मांग की थी, जिसे सरकार ने उस समय ठुकरा दिया था।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि विशेष सत्र बुलाकर सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव समेत आने वाले चुनावों में राजनीतिक फायदा उठाना चाहती थी। लेकिन सरकार दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रही। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट पड़े। इसे पास होने के लिए कम से कम 352 वोट चाहिए थे। विधेयक हारने के बाद संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि इस प्रस्ताव से जुड़े दो अन्य विधेयक, जिनमें परिसीमन वाला विधेयक भी शामिल है, वापस ले लिए जाएंगे।
वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, परिसीमन 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर होना है। विपक्ष ने कहा कि 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन करना व्यावहारिक नहीं है और यह राजनीतिक मकसद से किया जा रहा था। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि लोकसभा की सीटें 850 तक बढ़ाने का प्रस्ताव बिना सहमति के लोकतंत्र की प्रतिनिधित्व व्यवस्था को बिगाड़ सकता है। विपक्षी दलों ने यह सवाल भी उठाया कि महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से क्यों जोड़ा जा रहा है। दोनों मुद्दों को अलग-अलग रखना चाहिए। वामपंथी दलों ने 2023 के कानून में दी गई देरी का भी विरोध किया था और तत्काल लागू करने की मांग की थी।
आलोचकों का कहना है कि सरकार का यह रुख महिलाओं के सशक्तिकरण पर उसके दावों में विरोधाभास दिखाता है। पहले संसद में आरक्षण कानून पास हुआ, लेकिन उसे लागू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब इसे विवादित परिसीमन के साथ जोड़कर सरकार दोनों चीजों पर जनता का विश्वास कम कर रही है।
सत्र समाप्त होने के साथ सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ गया है। यह मुद्दा आने वाले राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहेगा।
अपलोडर: VKA-FD9RRG
क्या यह लेख उपयोगी था?
अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 18 अप्रैल 2026 • 4 मिनट पठन

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
28 अगस्त 2026

फिल्म 'चिटगाँव’ चमत्कृत करती है| मास्टर दा सूर्य सेन की भूमिका में एकमात्र मनोज वाजपई को छोड़कर कोई भी ‘स्टार’ अभिनेता या अभिनेत्री इस फिल्म में नहीं है| फिल्म में ‘झुंकु ’, सुबोध रॉय के बचपन का नाम, की भूमिका में दिलजाद हवाले ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है| एक बुझी-बुझी-सी आँखों वाला किशोर जिसकी दोनों आँखों में दुनिया भर का अबोध-आश्चर्य भरा है – उन्ही आँखों से वह समाज को बदलने का सपना देखता है| किशोरी क्रांतिकारी प्रीतिलता की भूमिका में वेगा तमोटिया ने प्रभावित किया| कोई व्यावसायिक मसाला, लटके झटके भी नहीं है| फिल्म में कैमरे का काम और संगीत का व्यवहार खूब ही जोरदार तरीके से लिया गया है| दर्शक के हिसाब से यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत में मील का पत्थर है| इस तरह की शुद्ध देश-प्रेम से भरपूर संपूर्ण अंतिम फिल्म कौन सी थी, कब देखी, याद नहीं| सामाजिक दायित्व-बोध न होने पर ऐसी फ़िल्में बनाना असंभव है|
27 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
26 अगस्त 2026

पेपर माफिया बेलगाम। जिम्मेदार कौन ?
नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे एक अत्यंत संगठित गिरोह होने की बात जांचकर्ता मान रहे है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्रश्नपत्र राजस्थान, हरियाणा, केरल, जम्मू- काश्मीर, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में फैल गया था पूरा काम अत्यंत संगठित तरीके से होता है । प्रश्नपत्र विभिन्न चरणों में अलग-अलग स्तरों पर बेचे जाते हैं ये सीधे छात्रों को नहीं बेचे जाते। प्रश्नपत्र बेचने के लिए अलग 'थोक' और 'खुदरा' बाजार होते हैं। किसी भी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक गिरोह में 100 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन की संभावना है।
केशव कुमार भट्टड़ • 12 मई 2026

सीबीआई ने आरोपी की पहचान पीवी कुलकर्णी के रूप में की है। जांच में सामने आया है कि कुलकर्णी न केवल रसायन शास्त्र (Chemistry) के प्रोफेसर थे, बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था 'एनटीए' के एक प्रभावशाली अधिकारी भी थे। इसी पद पर रहने के कारण प्रश्नपत्रों तक उनकी आसान पहुंच थी।
केशव कुमार भट्टड़ • 15 मई 2026

पश्चिम बंगाल के रानीगंज से हाल ही में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब कर दिए जाने पर प्रोफेसर जेता सांकृत्यायन की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आई है। जेता सांकृत्यायन अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। राहुल सांकृत्यायन और उनकी पत्नी डॉ. कमला सांकृत्यायन (जो स्वयं एक लेखिका और विद्वान थीं) के बेटे हैं। उन्होंने उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय (North Bengal University) और सिक्किम यूनिवर्सिटी (गंगटोक) में लंबे समय तक अर्थशास्त्र विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं। प्रो. जेता सांकृत्यायन अपने पिता महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साहित्यिक और ऐतिहासिक योगदान को संजोने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 17 जुलाई 2026
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...