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द्वंद्व तोड़ो: बंगाल का भविष्य वामपंथ की वापसी पर टिका है
- पलाश दास
पलाश दास भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े हुए पश्चिम बंगाल की वामपंथी राजनीति के नेता हैं। वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पश्चिम बंगाल राज्य कमिटी के सदस्य , राज्य सचिवालय के सदस्य (State Secretariat Member) और उत्तर 24 परगना जिले के जिला सचिव (District Secretary) हैं । पलाश दास ने 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में दम दम विधानसभा क्षेत्र से CPI(M) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। वे सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। वे राज्य में वामपंथी आंदोलनों, विशेषकर SIR (Special Intensive Revision) जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों और जन-मुद्दों पर सक्रिय रूप से भाग लेते रहते हैं। CPI(M) के कई कार्यक्रमों और विरोध प्रदर्शनों में उनकी प्रमुख भूमिका देखी जाती है। वे एक अनुभवी संगठनकर्ता हैं और बंगाल में वामपंथ की पुनरुत्थान की दिशा में कार्यरत हैं। उनके बारे में कोई आपराधिक मामले दर्ज नहीं हैं।
1987 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ साइंस (B.Sc.) - 1994 में NIIT से सिस्टम मैनेजमेंट में एडवांस डिप्लोमा।
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इस वर्ष हायर सेकंडरी की परीक्षा देने वाले युवा, जो पहली बार वोट डालेंगे, या जो स्नातक हो रहे हैं, उन्होंने केवल मोदी और ममता की सरकारों को ही देखा है। वे भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, हिंदू-मुस्लिम नफरत, सांप्रदायिक हिंसा, बलात्कार, बेरोजगारी, सरकारी स्कूलों-हास्पिटलों की बदहाली, निराशा, अनिश्चित नौकरियों और अमीर-गरीब की बढ़ती खाई के बीच बड़े हुए हैं। इस पीढ़ी को कभी वामपंथी सरकार देखने का अवसर ही नहीं मिला। इसके बजाय, छल-वंचना, गरीबी और हताशा उनके जीवन के स्थायी साथी बन गए हैं।गाँव-गाँव में 13-14 साल के बच्चे स्कूल छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने चले जाते हैं।शहरों में पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के युवा भी नौकरी की तलाश में दूसरे राज्यों या विदेश भाग रहे हैं। बंगाल में नौकरियाँ नहीं हैं। शिक्षा के प्रति रुचि घट रही है। गरीब और निम्न आय वाले परिवार निजी शिक्षा का खर्च नहीं उठा पाते। आज “काम” का मतलब सिर्फ टोटो चलाना, पार्सल डिलीवरी करना या “डियर लॉटरी” के टिकट बेचना रह गया है। एक भी नया कारखाना नहीं बना। मोदी और ममता दोनों ने सरकारी पद खाली रखे हैं। खेती की लागत बढ़ गई है, लेकिन फसलों के दाम नहीं बढ़े। जरूरी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। जिन लोगों की आय ट्रिकल-डाउन वाली नौकरियों पर टिकी है, उनकी औसत कमाई मात्र 11,000 रुपये है। नौकरियाँ अस्थायी हैं, कोई सुरक्षा नहीं। कमाई 4,000 से 15,000 रुपये मासिक तक सीमित है। केरल जैसे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरों और कुशल कामगारों की मजदूरी बंगाल से दोगुनी से भी अधिक है।
चुनाव के मुद्दे
राज्य चुनावों में जीवन और आजीविका के मुद्दे अब केंद्र में नहीं रह गए हैं। दोनों सत्ताधारी पार्टियाँ “पेड मीडिया” की मदद से मंदिर-मस्जिद, धर्म और हिंदू-मुस्लिम विभाजन को भड़काकर वोट माँग रही हैं। अब कोई “विकास” या “सबका साथ, सबका विकास” की बात नहीं करता। यह साबित हो चुका है कि हर वादा सिर्फ जुमला था। इसलिए अब वे खुद भी इन नारों में दिलचस्पी नहीं रखते। चुनाव नजदीक आने पर भाजपा किसी भी तरह दंगे भड़काने को उतावली है, जबकि तृणमूल कांग्रेस उसे पूरा सहयोग दे रही है। विभाजन की एक गणित पहले से तैयार कर ली गई है। “पोल कंपनियाँ” पहले ही सीटों की संख्या और खास-खास क्षेत्र तय कर चुकी हैं। ये कंपनियाँ तय करती हैं कि कहाँ मजबूत उम्मीदवार उतारना है, कहाँ कमजोर और कितना प्रचार करना है। अब सब आरएसएस द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट में अपना रोल निभा रहे हैं, जिसका निर्देशन पोल कंपनियाँ कर रही हैं।
चुनावी गणित
भाजपा “70-30” का जाप लगाती रहती है। उन्हें “घुसपैठिए” बताकर 60 लाख मतदाताओं को संदिग्ध (SIR) घोषित किया गया है और 8 लाख नाम वोटर सूची से हटा दिए गए हैं। इनमें ज्यादातर गरीब और कामकाजी लोग हैं। कई माटुआ और हिंदू भी बाहर किए गए, लेकिन बहुसंख्यक मुस्लिम हैं। इससे भाजपा की चुनावी गणित सीधे फायदे में आती है और विभाजन भी होता है। जिन्हें बाहर किया गया—जो वोट नहीं डाल पाएँगे या परेशान होंगे—वे और उनका परिवार ज्यादातर मामलों में भाजपा के खिलाफ वोट देगा।
2019 से दोनों पार्टियाँ, दोनों सरकारें और मीडिया ने चुनाव को सिर्फ दो खिलाड़ियों तक सीमित कर दिया है। यह “द्वंद्व राजनीति” है, जो धार्मिक ध्रुवीकरण पर टिकी हुई है। कई लोग आरएसएस, दोनों पार्टियों और मीडिया के प्रचार से प्रभावित होकर सोचते हैं कि भाजपा सत्ता बदलकर राज्य सरकार की अन्याय और अक्षमता खत्म कर देगी।
वामपंथी दृष्टिकोण
तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए धार्मिक वोटिंग और दो-दलीय राजनीति के जाल से बाहर निकलना जरूरी है। भाजपा 12 साल से सत्ता में है और तृणमूल 15 साल से। दोनों सरकारों ने बंगाल के संसाधनों को लूटा है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, मजदूरी और सुरक्षा—बंगाल सब कुछ खो चुका है और अब गंभीर संकट में है। इनके हाथ में और पाँच साल मत दो, वरना आपके परिवार और बच्चों का भविष्य पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। बंगाल को बचाने के लिए वामपंथ ही एकमात्र उम्मीद है।
तृणमूल की जीत का राज क्या है?
2016 के विधानसभा चुनाव से मीडिया यह प्रचार करने लगा कि वामपंथ खत्म हो गया है और लड़ाई सिर्फ तृणमूल और भाजपा के बीच है। 2016 में भाजपा को सिर्फ 10 प्रतिशत वोट मिले थे। वाम-कांग्रेस गठबंधन को 38.6 प्रतिशत और तृणमूल को 45.6 प्रतिशत वोट मिले—सिर्फ 7 प्रतिशत का अंतर। 2021 में तृणमूल की वापसी असंभव थी। उसी दिन से वामपंथी वोटों को बाँटने के लिए भाजपा का इस्तेमाल करके तृणमूल सरकार बचाने की साजिश शुरू हो गई।
“वोट कटर” कौन है?
भाजपा कहती है कि तृणमूल इसलिए जीतती है क्योंकि वामपंथ वोट काटता है, इसलिए वामपंथ को वोट न दें। लेकिन ध्यान दें: बंगाल में वामपंथ का इतिहास स्वतंत्रता से पहले का है। 34 साल की वाम मोर्चा सरकार से पहले उन्होंने दो यूनाइटेड फ्रंट सरकारें चलाईं। वामपंथ हमेशा मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग और वंचितों के साथ खड़ा रहा। सब कोशिशों के बावजूद वामपंथ को मिटाया नहीं जा सकता।
भाजपा अचानक आई है—इसका कोई इतिहास, जड़ें या संगठन नहीं। यह पूरी तरह मीडिया पर टिकी है। इसे बंगाल की समझ नहीं है। यह पहले तृणमूल के साथ गठबंधन करके बंगाल में घुसी। ज्योति बसु कहा करते थे कि ममता का सबसे बड़ा अपराध भाजपा को बंगाल लाना था। पूर्व सहयोगी तृणमूल और भाजपा कई सालों से धार्मिक ध्रुवीकरण और नकली “मॉक वॉर” के जरिए लोगों को बाँट रही हैं और एक-दूसरे की मदद कर रही हैं। उनका साझा लक्ष्य वामपंथ को सत्ता से दूर रखना है।
भाजपा तृणमूल को जीत दिलाती है, उसे हराती नहीं है
2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा 121 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी, तृणमूल 164 में। 2021 में भाजपा का नारा था “उन्नीस में हाफ, इक्कीस में साफ”। नतीजा उलटा—भाजपा 121 से घटकर 77 रह गई। भारी भ्रष्टाचार और अपराध के बावजूद तृणमूल 164 से बढ़कर 213 सीटों पर पहुँच गई। 2024 लोकसभा चुनाव में फिर धार्मिक ध्रुवीकरण और दोनों पार्टियों के नाटक से लोग भ्रमित हुए। इस बार भाजपा 18 से घटकर 12 रह गई, जबकि तृणमूल 22 से बढ़कर 29 पर पहुँच गई।
भाजपा सफल क्यों नहीं हो सकती?
SIR से नाम हटाकर भाजपा जो फायदा चाहती थी, उससे ज्यादा नुकसान हो गया। बाहर किए गए या संदिग्ध मतदाता और उनके परिवार मिलाकर कम से कम 1.5 से 2 करोड़ वोटर हैं। इनमें सब मुस्लिम नहीं—बहुत से माटुआ, शरणार्थी, अनुसूचित जाति, जनजाति, आदिवासी, महिलाएँ और वंचित वर्ग शामिल हैं। वे भाजपा को हराने को बेताब हैं।
जितना ज्यादा हिंदू-मुस्लिम विभाजन होगा और भाजपा जितना ज्यादा गरजती रहेगी, अल्पसंख्यक समुदाय उतना ही डर से एकजुट होगा। कुछ धर्मनिरपेक्ष और सख्ती से भाजपा-विरोधी मतदाता तृणमूल के कोर वोट और सरकारी भत्ते पाने वालों के साथ जुड़ जाएँगे। असल में भाजपा ठीक वही करती है जिससे तृणमूल इन वोटों को एकत्र कर सके।
क्या भाजपा वाकई तृणमूल को हटाना चाहती है?
अगर तृणमूल नहीं हटी तो बंगाल पूरी तरह बरबाद हो जाएगा। शिक्षा और रोजगार के अवसर खत्म हो चुके हैं। डिग्री का यहाँ कोई मूल्य नहीं। अन्य राज्यों की तुलना में मजदूरी बहुत कम है। युवाओं का भविष्य बर्बाद हो गया। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था भ्रष्टाचार, हत्या और बलात्कार का अड्डा बन गई है। तृणमूल ने भ्रष्टाचार और अपराध को सरकार और समाज की रगों में उतार दिया है।
सरकार, गुंडे, अफसर और पुलिस के गठजोड़ से अनगिनत अन्याय हो रहे हैं। इस “अपराधियों के स्वर्ग” में महिलाओं की सुरक्षा गायब हो गई है। लोकतंत्र नष्ट हो चुका है और “माफिया राज” कायम हो गया है।
इतने अत्याचारों के बावजूद भ्रष्ट और अपराधी सत्ता में बने हुए हैं। सीबीआई-ईडी जांच के बावजूद भयानक भ्रष्टाचार के कई आरोपी बख्शे गए और चुनाव लड़ रहे हैं। आरजी कर बलात्कार-हत्या जैसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामले में सीबीआई ने कोलकाता पुलिस की जांच को सही ठहराया और मामले को बंद कर दिया। जब “भतीजे” की पत्नी एयरपोर्ट पर सोने के साथ पकड़ी गई, तो केंद्रीय बलों ने आरोपी को सामान समेत सम्मानपूर्वक छोड़ दिया। कलिघाट के काकू के “साहब” को छूने की तो बात ही छोड़िए—ईडी-सीबीआई ने उनके नाम तक का जिक्र नहीं किया।
जब अल्पसंख्यक समुदाय तृणमूल से दूर होने लगता है, भाजपा भाजपा-शासित राज्यों में बंगालियों को परेशान करके या SIR से बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाताओं को बाहर करके डर का माहौल बनाती है। तृणमूल इसका पूरा फायदा उठाती है। तृणमूल के बिना धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं चल सकती, दो-दलीय व्यवस्था टूट जाएगी और भाजपा का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इसी तरह भाजपा के बिना तृणमूल को इतने मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोट नहीं मिल सकते। दोनों एक-दूसरे के लिए जीवनदायी हैं।
दो फूलों की “मृत चीखें”
दोनों “फूल” (कमल और घास-फूल) सरकार बनाने की बात करते हैं, लेकिन हाल में दोनों शिकायत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वामपंथ उनकी राह में रोड़ा है। भाजपा कहती है वामपंथ वोट ले रहा है इसलिए वह नहीं जीत सकती; अब मुख्यमंत्री भी यही कह रही हैं—जिन्हें जीत की उम्मीद नहीं, उन्हें वोट न दें। भाजपा कहती है तृणमूल को हराने के लिए सब उनके पीछे एक हो जाएँ, जबकि तृणमूल कहती है भाजपा के खिलाफ दाएँ-बाएँ सब एक हो जाएँ। दोनों बच्चे की तरह कह रहे हैं कि कोई और लड़ाई न करे; खेल सिर्फ उनके बीच हो। दो सरकारें, अकूत धन और पूरा मीडिया होने के बावजूद वे अपनी ताकत पर भरोसा नहीं कर पा रहे। दोनों वामपंथ की बढ़ती ताकत से डरे हुए हैं। इन दोनों पार्टियों का प्रचार साफ बता रहा है कि 2026 का चुनाव उनके बारे में नहीं है—यह वामपंथ का चुनाव बनता जा रहा है।
तो फिर बदलाव कैसे होगा?
हमें दो-दलीय राजनीति के जाल को तोड़ना होगा। धर्म को राजनीतिक हथियार नहीं बनने देना होगा। मुकाबला तीन-तरफा बनाना होगा। बिना हिचक, टूटने की कगार पर खड़े राज्य को बचाने के लिए आपको अपने परखे हुए साथी—वामपंथ—को विधानसभा भेजना होगा। भाजपा की वजह से जो भाजपा के लिए असंभव है, वही वामपंथ को समर्थन देने से संभव हो जाएगा।
लगातार मीडिया प्रचार के कारण कुछ लोग सोचते हैं कि वामपंथ की ताकत नहीं है और उनका वोट “वेस्ट” हो जाएगा। ताकत का आकलन कैसे करें? चाँद की सुंदर चाँदनी उसकी अपनी नहीं, सूरज से आती है। किसी राजनीतिक पार्टी की असली ताकत उसके कार्यकर्ता और समर्थक होते हैं। इस पैमाने पर देखें: 15 साल सत्ता से बाहर रहने, हत्या, आतंक, अत्याचार और झूठे मुकदमों के बावजूद वामपंथ लाखों लोगों को जुटा सकता है। भाजपा सत्ता में होने, मीडिया समर्थन और अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद ब्रिगेड ग्राउंड में कुर्सियाँ भी नहीं भर पाती।
तृणमूल ब्रिगेड ग्राउंड से बचती है और धर्मतला में बैठक करती है। SIR संकट के दौरान पूरे राज्य में पाँच लोग भी नहीं मिलेंगे जिनकी फॉर्म भाजपा ने भरी हो। कोविड महामारी में वामपंथ ने ऑक्सीजन का इंतजाम किया और जान जोखिम में डालकर मरीजों को बचाया—दोनों पार्टियाँ नहीं। असल में लोगों की ताकत ही पार्टी की ताकत है। ज्योति बसु कहा करते थे, “इतिहास लोग लिखते हैं।” 34 साल तक लोग वामपंथ के साथ खड़े रहे, इसलिए पंचायत से लेकर सरकार तक सब वामपंथ चला पाया और लोग कहते थे वामपंथ मजबूत है। 2011 में जब बड़ी संख्या में लोग तृणमूल की ओर गए, सरकार उनकी हो गई और वे मजबूत हो गए। जब कुछ लोग भाजपा की ओर गए, उन्हें कुछ विधायक और सांसद मिल गए। आज अगर आप चोरों और दंगाइयों को नकारकर वामपंथ को वोट देने का फैसला करेंगे, तो मई 2026 में सब कहेंगे—ताकत वामपंथ की है।
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अपलोडर: VKA-FD9RRG • प्रकाशित: 18 अप्रैल 2026 • 11 मिनट पठन

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का साहित्य और सिनेमा के प्रति गहरा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने ऋत्विक घटक के दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज को सहेजकर प्रकाशित करवाया तथा 'रूपकला केंद्र' जैसी संस्था के माध्यम से युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण दिलाया। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों का उत्साहवर्धन करने से लेकर कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में विश्वस्तरीय सिनेमा को बढ़ावा देने तक, वे सदैव तत्पर रहे। राजनीति की व्यस्तताओं के बीच भी कला, विचारों और आम जनता की रुचि को बेहतर बनाने के प्रति उनका यह समर्पण अतुलनीय था। सौम्य राजनीतिक व्यक्तित्व के धनी बुद्धदेव भट्टाचार्य के आम जनता की रुचियों को समृद्ध करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले एक सचेतन पहलू को याद कर रहें हैं प्रो. संजय मुखोपाध्याय। पढ़ें मूल बांग्ला देशहितैषी (06.09.2024) में छपे आलेख ''आम जनता की पसंद और सोच को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था' का हिन्दी अनुवाद।
28 अगस्त 2026

फिल्म 'चिटगाँव’ चमत्कृत करती है| मास्टर दा सूर्य सेन की भूमिका में एकमात्र मनोज वाजपई को छोड़कर कोई भी ‘स्टार’ अभिनेता या अभिनेत्री इस फिल्म में नहीं है| फिल्म में ‘झुंकु ’, सुबोध रॉय के बचपन का नाम, की भूमिका में दिलजाद हवाले ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है| एक बुझी-बुझी-सी आँखों वाला किशोर जिसकी दोनों आँखों में दुनिया भर का अबोध-आश्चर्य भरा है – उन्ही आँखों से वह समाज को बदलने का सपना देखता है| किशोरी क्रांतिकारी प्रीतिलता की भूमिका में वेगा तमोटिया ने प्रभावित किया| कोई व्यावसायिक मसाला, लटके झटके भी नहीं है| फिल्म में कैमरे का काम और संगीत का व्यवहार खूब ही जोरदार तरीके से लिया गया है| दर्शक के हिसाब से यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत में मील का पत्थर है| इस तरह की शुद्ध देश-प्रेम से भरपूर संपूर्ण अंतिम फिल्म कौन सी थी, कब देखी, याद नहीं| सामाजिक दायित्व-बोध न होने पर ऐसी फ़िल्में बनाना असंभव है|
27 अगस्त 2026

सुबोध राय (झुंकु राय) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने मास्टरदा सूर्यसेन के नेतृत्व में 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे और जलालाबाद युद्ध में वीरतापूर्वक भाग लिया। कम उम्र में सेलुलर जेल (काला पानी) की कठिन सजा काटने के बाद भी उनका राष्ट्रप्रेम डिगा नहीं। आजादी के बाद उन्होंने पेंशन या अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर सादगीपूर्ण जीवन बिताया। उनका निष्कलंक और त्यागमय जीवन भावी पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। चटगांव आंदोलन पर बनी बॉलीवुड फिल्म 'Chittagong' (2012) की कहानी मुख्य रूप से युवा झुंकु राय (सुबोध राय) के जीवन और उनके दृष्टिकोण पर ही आधारित है।
26 अगस्त 2026

किसी भी बड़े घोटाले में अपराधी भले ही व्यक्ति हों, व्यक्तियों का समूह हो, लेकिन "छात्रों का भरोसा टूटना" सरकार की बड़ी असफलता है। सरकार केवल जांच तक सीमित न रहकर, पूरी चयन और सुरक्षा प्रक्रिया का 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (जड़ से सफाई) करे। यह करना जरूरी है। किसी भी परीक्षा पेपर का लीक होना मतलब सरकारी सुरक्षा को भेद कर परीक्षा पेपर की बिक्री करने वाले गिरोह उसे सही समय पर उड़ा लेते हैं और मुंह-मांगी कीमत पर आगे बेच देते हैं। नीट पेपर का लीक होना सरकार के काम-काज की गंभीरता पर सीधा सवालिया निशान (?) है।
केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।
केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।
जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।
भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।
एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।
मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।
लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।
केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026
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