जन समाचार मंच

चंदन दास-
- पद्मा नदी ने लोगों के पते मिटा दिए हैं। इसका कारण यह है कि सरकार ने नदी के कटाव को रोकने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया, बल्कि सत्ताधारी दल ने ठेकेदारों की रेत की बोरियों से आने वाले कमीशन को गिना है।
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से नाम काट दिए हैं। कारण, न तो सरकार ने और न ही आयोग ने दस्तावेजों को अपलोड करने में कोई सावधानी बरतने की जरूरत महसूस की। जमिरुल ने नदी के पार धुंधले गांवों की ओर इशारा करते हुए कहा, "कल को अगर कोई आकर यह कहता है कि वो बांग्लादेश तुम्हारा देश है और यह देश तुम्हारा नहीं, तो मैं कैसे साबित करूँगा कि मैं भारतीय हूँ?"
अस्तित्व का यह गहरा संकट एक विनाशकारी नदी की तरह पूरे राष्ट्र को घेरे हुए है। पद्मा की अचानक उठी लहरों की तरह ही '46-'47 का दौर सिर उठा रहा है। जिन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण किया था, उन्होंने नए आजाद देश के बाजार के लालच में एक भूभाग के दो टुकड़े कर दिए। और उस भूभाग के गांवों और शहरों में जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर आजादी की लड़ाई लड़ी, उन्हें बार-बार ‘घुसपैठिए’ और ‘शरणार्थी’ कहकर तोड़ने की कोशिश की गई है।
जब हम जमिरुल के सवालों के सामने खड़े हैं, तभी बंगाल की मिट्टी को लूटने की फिराक में लगे देश के "बनिया" प्रतिनिधियों में से एक ने उत्तर बंगाल के सीमावर्ती इलाके में कार्यकर्ताओं को उकसाते हुए कहा है, "अब तो चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से नाम हटा दिए हैं, अब उन्हें भारत की भूमि से बाहर निकाल दिया जाएगा।"
जमिरुल से मुलाकात लालगोला के पद्मा तट पर हुई। गांव का नाम है तारानगर। पिछले छह महीनों में इस गांव के करीब 150 परिवारों के घर नदी में समा गए हैं। जमिरुल शेख जैसे कई लोगों का बचपन का आंगन, यादों से जुड़े पेड़, सड़कें और फुटबॉल का मैदान महज एक शाम में गायब हो गए।
उस शाम क्या हुआ था? कटाव जहां फिलहाल रुका हुआ है, वहां बीड़ी, सिगरेट और चाय की एक छोटी सी दुकान है। वहां आठ-दस युवक बैठे थे, जो बचपन के दोस्त हैं। कभी वे साथ मिलकर इसी नदी में छलांग लगाया करते थे, लेकिन आज उसी नदी ने उनकी जमीन छीन ली। जमिरुल ने बताया, "नौ महीने पहले की बात है। नदी घर के पास आ गई थी। हमने जरूरी सामान और बक्से निकालकर तिरपाल के नीचे रख दिए थे। शाम 8 बजे के करीब पानी बढ़ने लगा, नदी उफान पर थी। हम घर छोड़कर बाहर आ गए और देखते ही देखते हमारा घर नदी में समा गया।"
उस दिन तारानगर के कई और परिवार बेघर हुए थे। उनमें से कई आज भी नदी के किनारे तिरपाल के नीचे किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। बच्चों के लिए स्कूल नहीं है, बड़ों के पास काम नहीं है। जो सक्षम थे, वे चेन्नई या केरल चले गए हैं ताकि अपने बेघर परिवारों का पेट पाल सकें।
सरकार ने कटाव से प्रभावित कुछ परिवारों को जमीन दी है, लेकिन उसका अनुभव भी भयानक रहा। जमिरुल बताते हैं, "सरकार ने हमें डलसारा गौरीदासपुर में रहने के लिए खस (सरकारी) जमीन दी। जैसे ही हमने वहां बांस गाड़ना शुरू किया, वहां के किसान दौड़ते हुए आए। वे लंबे समय से वहां खेती कर रहे हैं, वे जगह क्यों छोड़ेंगे? क्या हम उन लोगों से लड़ते? हम वापस आ गए और फिर से तिरपाल के नीचे रहने लगे।"
यह कैसी सरकार है जो दो गुटों के बीच झगड़ा करवा देती है? वही सरकार, जिसके कार्यकर्ता उन परित्यक्त घरों की दीवारों पर फेस्टून लगा रहे हैं जो नदी में गिरने ही वाले हैं। उन पर लिखा है— ‘इमाम, मुअज्जिन और पुजारियों को भत्ता मिलता है, इसलिए ममता बनर्जी के स्नेही उम्मीदवार डॉ. अब्दुल अजीज को वोट दें’।
लालकोला ब्लॉक तृणमूल कांग्रेस का यह चुनाव प्रचार जमिरुल, पिंटू शेख और फुलेरा बीबी जैसे लोगों के लिए एक मजाक है। फुलेरा बीबी ने कहा, "मेरा नाम तो वोटर लिस्ट में रखा ही नहीं गया। मैंने सारे दस्तावेज जमा किए थे, फिर भी नाम कट गया। नाम नहीं होगा तो क्या कल मुझे बांग्लादेशी कहेंगे?"
इस सवाल का दूसरा नाम आतंक है। जिनके पास घर नहीं है और जिन्हें सरकार छत नहीं दे पाई, उनके नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं। दूसरी ओर, केंद्रीय गृह मंत्री कह रहे हैं कि अब देश से बाहर निकालेंगे।
मुकुंदपुर (कोलकाता) में राजमिस्त्री का काम करके लौटे जमिरुल ने कहा, "हमारे घर में तीन भाइयों, दो पत्नियों, मां और दो शादीशुदा बहनों के नाम वोटर लिस्ट में थे। 2002 में भी माता-पिता ने वोट दिया था। अब पिता नहीं हैं, मां हैं। फिर भी मेरा और मेरी दो भाभियों का नाम कट गया है। अब अगर वे कहें कि तुम इस देश के नहीं हो, तो मैं क्या करूँगा?"
सीपीएम उम्मीदवार बाबलुज्जमां ने प्रचार के दौरान कहा, "मेरे पास तारानगर के लोगों का डर और दुख कम करने का कोई मंत्र नहीं है। उनकी हालत अकल्पनीय है। बचाव के नाम पर केवल रेत की बोरियां फेंकी जा रही हैं, जिससे केवल ठेकेदारों और नेताओं को कमीशन मिल रहा है। हमारी सरकार आई तो हम इसके लिए एक ठोस योजना बनाएंगे।"
तिरपाल के नीचे रहने वाले कुछ बच्चे नदी के पानी में खेल रहे थे। उनमें से एक छोटी बच्ची रुकसाना ने आकर कहा, "देखा, हमारे घर के ऊपर झंडा लगाया है।"
वहां सत्ताधारी दल के चमकदार झंडे बांस के खंभों पर लहरा रहे थे। यह उन लोगों की निर्लज्जता का प्रतीक था जो बेघर लोगों को छत तो न दे सके, लेकिन अपनी "सफलता" का प्रचार करने वहां जरूर पहुँच गए। पद्मा बह रही थी और दूसरी ओर बीएसएफ के जवान अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। इस बड़े प्रहसन के सामने पद्मा के तट पर लोकतंत्र निशब्द खड़ा था।
- साभार "गणशक्ति"
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 20 अप्रैल 2026 • 5 मिनट पठन

जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
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