जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।
जन समाचार मंच
जो लोग/
गाली से भी बदतर हैं/
उन्हें शिकायत है/
कि लड़कियां/
गाली दे रही हैं।
दरअसल/
लड़कियां/
वह सब कुछ/
सूद समेत लौटा रही हैं।

लड़कियां गाली दे रही हैं!
-हूबनाथ
*
जिस देश में
निन्यानबे प्रतिशत
गालियां बनी ही हैं
लड़कियों के लिए
गाली के केंद्र में
हमेशा लड़की ही रही है
एक लड़का
दूसरे लड़के को
जब गाली देता है
तो वह
लड़की को गाली
दे रहा होता है
जो समाज
लड़कियों की
ज़िंदगी को ही
गाली बना दे
जो देश
अपनी मर्दानगी
लड़कियों को
बेइज़्ज़त करके
कुचल मसल कर
साबित करे
जो ख़ुद
इन्सानियत के चेहरे पर
भद्दी गाली से
अधिक नहीं
जो लोग
गाली से भी बदतर हैं
उन्हें शिकायत है
कि लड़कियां
गाली दे रही हैं
दरअसल
लड़कियां
वह सब कुछ
सूद समेत लौटा रही हैं
जो उन्हें
हज़ारों साल से
तथाकथित
सभ्य समाज
देता आया है
सनातन समाज में
होली के दिन
सदियों से
घिनौनी गालियां
दी जाती हैं
लड़कियों को
आज तक
किसी ने आपत्ति
दर्ज नहीं कराई
हर रोज़
हर पल
हर जगह
गालियों पर गालियां
दी जाती हैं
लड़कियों को
कभी
सीधे-सीधे
कभी
लड़कों के हवाले से
सुसंस्कृत समाज वह
जहां सिर झुका कर
लड़कियां
खाती रहें गालियां
लात-घूंसे खाने के बाद
सभ्यता की
बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई
सिर्फ़ लड़कियों ने
अब वे
ज़रा-सा
असभ्य होना चाहती हैं
और कोई आज़ादी
मिले न मिले
पर सदियों से दी गई
गालियां
सूद समेत लौटाने की
आज़ादी चाहती हैं
लड़कियां
आज़ादी के
अमृत-काल के
सावन में
क्या इतना-सा ज़हर
नहीं पचाया जा सकता!
लगभग 20 पुस्तकों के अनुवाद एवं संपादन का काम कर चुके लेखक हूबनाथ 'बाजा', 'हमारी बेटी' और 'अंतर्ध्वनि' फिल्मों में संवाद लेखन कर चुके है। आपकी 'कौए', 'लोअर परेल', 'अकाल' व 'मिट्टी' नाम से काव्य संग्रह सहित 'ललित निबंध', 'सिनेमा समाज साहित्य' समेत अनेक किताबें प्रकाशित है। आप मुंबई में रहते है।]
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अपलोडर: VKA-N9LYCE • प्रकाशित: 29 अगस्त 2026 • 2 मिनट पठन

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