"इतिहास के कुछ ऐसे दस दिन भी होते हैं जो बड़े क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं।" जून में शुरू हुए 'जेन-जी' आंदोलन ने नव-उदारवादी वित्तीय पूंजी के वैश्विक संकट और अमेरिकी वर्चस्व को उजागर कर दिया है, जिससे यूरोप से लेकर भारत तक जन-असंतोष का ज्वार उठा है। भारत में कॉरपोरेटपरस्त नीतियों, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के खिलाफ छात्र-छात्राओं, विशेषकर युवा लड़कियों ने पितृसत्ता और सामंती मूल्यों को ऐतिहासिक चुनौती दी है। अब क्रांतिकारी ताकतों और वामपंथी संगठनों का यह मुख्य दायित्व है कि वे इस जन-आंदोलन को प्रतिक्रिया तक सीमित न रखकर साम्राज्यवाद-विरोधी और पूंजीवाद-विरोधी वर्ग-संघर्ष में बदलें।
जेन-जी आंदोलन और क्रांतिकारी शक्तियों के कार्यभार
~ अरुण कुमार मिश्रा ~
जून के महीने में शुरू हुए छात्र-छात्राओं, युवा और युवतियों के 'जेन-जी' आंदोलन ने समाज के सभी परिवर्तनकारी तबकों के बीच एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। भारत में उपजे इस आंदोलन का विस्तार अब तमाम यूरोपीय देशों में भी हो चुका है। जहाँ इन आंदोलनों के प्रति शासक वर्गों का रवैया लगभग एक जैसा दमनकारी रहा है और वे इन्हें अराजक व विदेशी साजिशों का हिस्सा बता रहे हैं, वहीं परिवर्तनकारी शक्तियों के बीच भी इन आंदोलनों की प्रकृति और उनके लक्ष्यों को लेकर ढेरों सवाल बने हुए हैं।
आखिर इन आंदोलनों के इस अचानक विस्फोट के पीछे कौन-से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारक छिपे हैं? यदि हम उन कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं करेंगे, तो न तो हम सही निष्कर्षों पर पहुँच सकेंगे और न ही इस आंदोलन को किसी सही क्रांतिकारी दिशा में ले जाने के लिए कोई ठोस कार्यक्रम अपना सकेंगे।
इन आंदोलनों को बारूद मुहैया कराने के पीछे मुख्य रूप से पिछले चार दशकों से पूरी दुनिया पर लादी जा रही नव-उदारवादी वित्तीय पूंजी का साम्राज्यवाद है, और आज खुद अमेरिका इसी वित्तीय जाल का शिकार बनता जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठन अमेरिकी साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने में अब पूरी तरह अक्षम साबित हो चुके हैं, इसलिए अमेरिका के लिए ये संगठन अब लगभग बेमानी हो चुके हैं। सोवियत रूस के विघटन के बाद अमेरिका द्वारा स्थापित एक-ध्रुवीय दुनिया में अब बड़ी-बड़ी दरारें पड़ चुकी हैं। वर्ष 2008 से शुरू हुए वैश्विक आर्थिक संकट से उबरने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। जैसा कि लेनिन ने अपनी महान कृति - ' साम्राज्यवाद: पूँजीवाद की सर्वोच्च अवस्था' - में स्पष्ट किया था कि साम्राज्यवाद बिना युद्ध के जिंदा नहीं रह सकता, ठीक उसी प्रकार आज पूरी दुनिया में जारी युद्ध दरअसल इसी गहरे संकट से उबरने की छटपटाहट का परिणाम हैं। हालांकि, फिलिस्तीन और यूक्रेन के युद्धों में अमेरिका के पीछे चलने वाले यूरोपीय साम्राज्यवादी देश भी अब एकतरफा अमेरिकी नीतियों के खिलाफ अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर करने लगे हैं, भले ही इस अंतर्विरोध ने अभी पूरी तरह शत्रुतापूर्ण रूप न लिया हो।
अमेरिका द्वारा रूस के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों और उसके साथ तेल-गैस व व्यापारिक रिश्ते रखने वाले देशों पर दबाव का सबसे अधिक नुकसान यूरोपीय देशों और भारत जैसे मित्र एशियाई देशों को उठाना पड़ा है। दूसरी ओर, वित्तीय संसाधनों पर अमेरिकी और यूरोपीय वर्चस्व की इन दमनकारी कार्रवाइयों के चलते ही 'ब्रिक्स' जैसे नए अंतरराष्ट्रीय संगठनों का उभार हुआ है, जिससे पहली बार वैश्विक व्यापार पर डॉलर के एकछत्र राज पर सवाल उठने लगे हैं। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा एक संप्रभु देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति व उनकी पत्नी की गिरफ्तारी और वहाँ के तेल संसाधनों पर अवैध कब्जे की कोशिशों ने ग्लोबल साउथ के हर देश को एक नए आतंक के साये में ला खड़ा किया है।
नव-उदारवादी दौर का फायदा उठाकर चीन ने जिस तरह आर्थिक, व्यापारिक और तकनीकी क्षेत्रों में अमेरिका के सामने बड़ी चुनौतियाँ खड़ी की हैं, उससे अमेरिकी बौखलाहट और अधिक बढ़ गई है। नब्बे के दशक की 'वाशिंगटन सहमति' का दौर अब पूरी तरह तार-तार हो चुका है। अमेरिका अब व्यापारिक दीवारें खड़ी करके अपने ही बाजार पर शिकंजा कस रहा है और दूसरे देशों के बाजारों पर कब्जा करने, उनके संसाधनों को लूटने तथा दुनिया भर में फैले अपने सैनिक अड्डों के खर्च को निकालने के लिए अपनी दमनकारी ताकत का खुलकर इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी अपनी कमियाँ भी खुलकर सामने आने लगी हैं। आज अमेरिकी सामरिक छतरी उतनी मजबूत नहीं रही, उसमें बड़े-बड़े छेद हो चुके हैं; नतीजतन, वह अपने पिछलग्गू देशों को रक्षा पर अधिक खर्च करने और अमेरिकी सैन्य साजो-सामान की ही खरीद करने के लिए लगातार बाध्य कर रहा है।
ईरान का युद्ध अब अमेरिका के लिए गले की हड्डी बन चुका है और उसके पारंपरिक अरब पिछलग्गू भी अब अपनी अलग राह तलाशने लगे हैं। इस पूरे संघर्ष के दौरान सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और यूएई जैसे देशों को यह अहसास हो चुका है कि अमेरिकी सामरिक छतरी अब उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी दुनिया और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के दौर में रूस से सटे तमाम यूरोपीय मुल्कों में मुफ्त सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और आवास का जो ढांचा खड़ा किया गया था, वह सोवियत रूस के बिखरने के बाद वित्तीय पूंजी के निरंतर दबाव के कारण धीरे-धीरे ध्वस्त होना शुरू हुआ। यूक्रेन युद्ध के चलते रूस से सस्ते तेल की खरीद पर लगी रोक ने यूरोपीय अर्थतंत्र की कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है। बजट में कटौती की भारी मार सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ी है; आवासीय किरायों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और श्रमिक वर्ग की वास्तविक आय में ठहराव आ गया है। औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी में वृद्धि और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने यूरोपीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़कर रख दिया है।
फ्रांस, इटली और स्पेन जैसे देशों में शिक्षा, आवास और बुनियादी जनसमस्याओं को लेकर उठ रहा आंदोलनों का यह ज्वार क्रांतिकारी परिवर्तन के कई अहम लक्षणों को प्रकट करता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आंदोलनों को सही क्रांतिकारी दिशा देने वाली शक्तियाँ वहाँ मौजूद हैं?
यूरोप के इस परिदृश्य से आगे बढ़कर अब हमें भारतीय संदर्भ में विचार करने की आवश्यकता है। नब्बे के दशक की नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों ने ही एक ऐसी राजनैतिक ताकत के लिए रास्ते साफ किए, जो इन नीतियों को आक्रामक ढंग से लागू करते हुए इनसे उपजे जन-आक्रोश को दबा सके और श्रमजीवी वर्ग को आपस में विभाजित कर सके। आरएसएस के निर्देशन में भाजपा का सत्ता में आना कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि शासक वर्गों की सोची-समझी राजनीति का ही परिणाम है।
पिछले बारह वर्षों में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की आर्थिक नीतियों ने देश में गहरी आर्थिक असमानता को जन्म दिया है। सभी सार्वजनिक क्षेत्रों का अंधाधुंध निजीकरण किया गया है, कॉरपोरेट घरानों के 16 लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए गए हैं, कृषि के कॉरपोरेटिकरण के लिए कानून थोपने की कोशिशें हुई हैं और मजदूरों के अधिकारों को कुचलने वाले मजदूर-विरोधी दस्तावेज पारित किए गए हैं।
श्रमिकों, किसानों और अन्य श्रमजीवी तबकों की बदहाली के साथ-साथ मध्यम वर्ग से आने वाले शिक्षित युवा-युवतियों के सामने भी रोजगार का संकट मुँह बाए खड़ा है। सूचना तकनीक (IT) के क्षेत्र में मोटे वेतन पर देशी-विदेशी कंपनियों में नौकरी पाने का सपना अब एक छलावा साबित हो रहा है। आज बड़ी-बड़ी कंपनियाँ बड़े पैमाने पर छंटनी करने में लगी हैं; बैंक, एलआईसी और रेलवे समेत तमाम सरकारी विभागों में नई नियुक्तियाँ पूरी तरह बंद हैं। देश का लगभग 40 प्रतिशत युवा स्नातक बेरोजगार है। रोजगार के नाम पर आज अस्थायी और ठेका मजदूरों, गिग वर्कर्स तथा ठेला-रेहड़ी लगाकर जीवन बसर करने वालों की बाढ़ आ गई है। आज ओला-उबर या टोटो चलाने वालों में अच्छी डिग्रियाँ प्राप्त करने वाले नौजवानों की एक बहुत बड़ी संख्या ड्राइवरों के रूप में काम करने को विवश है। बढ़ती महंगाई और शिक्षा-स्वास्थ्य के निजीकरण से आसमान छूते खर्चों के बीच अब "मोदी है तो मुमकिन है" जैसे जुमलों का स्वर भी धीमा पड़ने लगा है।

रही-सही कसर अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकने और ईरान पर अमेरिकी हमलों के कारण तेल व गैस की कीमतों में आई बेतहाशा उछाल ने पूरी कर दी है। इस दौर में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का खात्मा, न्यायपालिका और गोदी मीडिया पर शासक वर्ग के शिकंजे ने आम जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। किसानों के साल भर चले ऐतिहासिक आंदोलन और उसकी सफलता के बाद, गुरुग्राम से लेकर नोएडा तक के मजदूरों की हड़तालों और ट्रेड यूनियनों द्वारा आयोजित आम हड़तालों में करोड़ों मेहनतकशों की सहभागिता इसी सिलसिले की एक मजबूत कड़ी है।

इस पूरे दौर के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसमें विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने विशेषकर लड़कियों ने बेहद साहसिक भागीदारी निभाई है। परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और शिक्षा व्यवस्था को रसातल में धकेलने की साजिशों के खिलाफ जिस रचनात्मक ढंग से उन्होंने सवाल उठाए और पितृसत्ता को चुनौती दी है, वह शासक वर्ग की राष्ट्रवाद और संस्कृति से जुड़ी प्रतिक्रियावादी परियोजनाओं पर करारा प्रहार है। सामंती मूल्यों और रूढ़ियों को करारा जवाब देते हुए देश की युवा लड़कियों ने पुरुष-महिला समानता के संघर्ष को एक नया आयाम दिया है। महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु समझने और बलात्कारियों को महिमामंडित करने वाली भाजपा-आरएसएस की राजनीति के बरक्स, दिल्ली के जंतर-मंतर पर रात-दिन अपने पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर पुलिस की लाठियाँ खाने, पानी की बौछारें और आँसू गैस के गोले झेलने वाली महिलाओं के दृश्य उन तमाम संकीर्ण ताकतों के मुँह पर करारा तमाचा हैं, जो महिलाओं को या तो घर की चारदीवारी में कैद रखना चाहते हैं या फिर बाजार की वस्तु बनाना चाहते हैं। निजी संपत्ति की शुरुआत के साथ ही महिलाओं की गुलामी और उनकी यौनिकता पर नियंत्रण रखने के जो नियम-कानून गढ़े गए थे, वे आज इस संघर्ष के दबाव में लगातार टूट रहे हैं, और यही आज के शासक वर्ग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
क्रांतिकारी शक्तियों के समक्ष कार्यभार और आह्वान

नेहा बोरा, आइशी घोष, कांति कुमारी, शरण्या वर्मा, दानिश अली और ऐसे ही अनेक युवा चेहरों ने जिस उत्कृष्ट नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया
है, वह पारंपरिक दायरों से बाहर आकर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा, किसानों व मजदूरों के मुद्दों से जुड़े परिवर्तनकारी सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को इस पूरे आंदोलन को एक सही क्रांतिकारी दिशा देने का बेहतरीन अवसर प्रदान कर रहा है।
आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या क्रांतिकारी संगठन इस ऐतिहासिक अवसर का लाभ उठाने के लिए सांगठनिक रूप से तैयार हैं, या वे केवल इसी बात का छिद्रान्वेशण करते रहेंगे कि दीपके, रांका और दास के पीछे कौन सी शक्तियाँ हैं।
भारत में लंबे समय से सुलग रही सामाजिक-आर्थिक असंतोष की आग में इन युवाओं ने चिंगारी का काम किया है, जिसकी लपटें अब दूर-दूर तक फैल रही हैं। केवल इनसे ही सब कुछ पा लेने की उम्मीद करना बेमानी होगा; असली जिम्मेदारी उन क्रांतिकारी शक्तियों पर है जो किसानों, मजदूरों और तमाम श्रमजीवी तबकों के बीच लगातार काम कर रही हैं कि वे इसे एक स्पष्ट क्रांतिकारी दिशा प्रदान करें।
आइए, इस जन-आंदोलन को साम्राज्यवाद-विरोधी और पूंजीवाद-विरोधी संघर्ष में रूपांतरित करते हुए, व्यापक स्तर पर वर्ग-संघर्ष को तेज करें और इसके लिए हर प्रकार के आत्मबलिदान के वास्ते खुद को तैयार रखें।
लेनिन के शब्दों में, "दस वर्ष कुछ नहीं होते, लेकिन इतिहास के कुछ ऐसे दस दिन भी होते हैं जो बड़े क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं। क्रांतिकारियों को हर पल इन 'दस दिनों' के लिए अपनी सांगठनिक और संघर्ष की मारक क्षमता को धारदार बनाने के वास्ते सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए।

अरुण कुमार मिश्रा
लेखक सी पी आई (एम) की केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य हैं।
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