'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी'
अनीश अंकुर ( लेखक व संस्कृतिकर्मी )
‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ - गणेश शंकर विद्यार्थी (1924–2021): एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट
हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। हिन्दी के, खासकर बिहार के वामपंथी हलकों में इस पुस्तक का लंबे समय से इंतजार था। गणेश शंकर विद्यार्थी की यह पुस्तक उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित हो गई होती, यदि इसके तैयार होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले साहित्यकार सिद्धेश्वर नाथ पांडे का अचानक निधन न हो गया होता। कई वर्षों तक विभिन्न बैठकों में सिद्धेश्वर नाथ पांडे ने गणेश शंकर विद्यार्थी से बातचीत की और उनके संस्मरणों को लिपिबद्ध करते हुए पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की। गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी स्मृतियों के आधार पर उन्हें अपने लंबे राजनीतिक जीवन की घटनाएं बताते जाते और सिद्धेश्वर नाथ पांडे उन्हें व्यवस्थित रूप से दर्ज करते जाते। अब उसी पुस्तक का 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलिटब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है।

बिहार के कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए इस पुस्तक का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण परिघटना है। बिहार के कम्युनिस्ट आंदोलन का अब तक बहुत कम दस्तावेजीकरण हुआ है और सीपीआई(एम) की धारा के इतिहास का दस्तावेजीकरण तो और भी कम हुआ है। ऐसे में गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर आधारित यह पुस्तक न केवल एक व्यक्ति के राजनीतिक जीवन का दस्तावेज है, बल्कि बिहार के वाम आंदोलन के कई महत्वपूर्ण दौरों और घटनाओं को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत भी साबित हो सकती है।
गणेश शंकर विद्यार्थी : जमींदार परिवार में जन्म और समाजवादी चेतना का निर्माण
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 1924 में नवादा जिले के रजौली में एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके चाचा गौरीशंकर सिंह बिहार कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे। उनके घर स्वामी सहजानंद सरस्वती और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं का आना-जाना था। घर में ‘जनता’ और ‘चिंगारी’ जैसे अखबार आते थे। इस माहौल ने किशोर गणेश शंकर विद्यार्थी के भीतर समाजवादी विचारों के बीज डाले। बाद में छात्र आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन और किसान आंदोलन के रास्ते वे कम्युनिस्ट आंदोलन में आए। उनके करीब आठ दशकों के लंबे सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एआईएसएफ से हुई और उन्होंने 1942 में कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। गणेश शंकर विद्यार्थी को उनके साथी और अनुयायी स्नेह से ‘गणेश दा’ कहा करते थे।
उनके राजनीतिक संस्कार केवल पुस्तकों और राजनीतिक बहसों से नहीं बने थे। जिस सामाजिक परिवेश में उनका बचपन बीता, वहीं उन्होंने जमींदारी शोषण को भी करीब से देखा। रेवड़ा का प्रसिद्ध किसान सत्याग्रह जब शुरू हुआ, तब गणेश दा स्कूल में ही थे। बाद के वर्षों में वे अपने भाषणों में उस दौर के जमींदारी अत्याचारों का उल्लेख किया करते थे। वे बताते थे कि 1930 के आर्थिक संकट के दौरान मालगुजारी न चुका पाने के कारण भूमिहार, कुर्मी, कोइरी और दलित किसानों की जमीनें नीलाम होने लगी थीं। रेवड़ा का जमींदार इतना क्रूर था कि वह किसानों से अमानवीय ढंग से वसूली करता था। जमींदारी शोषण का यह अनुभव गणेश दा के भीतर वर्गीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
स्कूली जीवन से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी
गणेश दा ने अपने स्कूली जीवन में ही आंदोलनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। अपने उस दौर को याद करते हुए वे कहा करते थे—
‘‘1938 में स्कूल में झंडा फहराने पर काफी विवाद हुआ। तब तक स्कूल में एआईएसएफ बन चुका था। वहां कॉलेज तो था नहीं। हमें गांव-गांव जाकर बताना होता कि देश कैसे आजाद होगा। फिर जमींदारी जुल्म से भी परिचित हुआ कि आदमी, आदमी को पीटता है, ये ठीक नहीं है।’’
ब्रिटिश हेडमास्टर ने उन्हें स्कूल से निकाल दिया। इसके विरोध में हड़ताल हुई, जो काफी लंबी चली। अंततः प्रबंधन को समझौता करना पड़ा, लेकिन गणेश दा को टीसी दे दी गई और वे पटना आ गए। पटना में उन्होंने राजाराम मोहन राय सेमिनरी में दाखिला लिया। उस समय पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन का माहौल था। वे बताते थे कि ‘न एक भाई, न एक पाई’ जैसे नारे गूंजते थे। इसी दौर में द्वितीय विश्वयुद्ध और ब्रिटिश सत्ता के सवाल पर उनका राजनीतिक दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट हुआ।
राजाराम मोहन राय सेमिनरी में भी वे आंदोलन में सक्रिय रहे और वहां से भी उन्हें निकाल दिया गया। अंततः राजेंद्र प्रसाद के हस्तक्षेप से समझौता हुआ। इसके बाद उन्होंने पटना कॉलेजिएट में पढ़ाई की। अली अशरफ, सुरेंद्र शर्मा और हरिकिशोर मेहरोत्रा वहां के प्रमुख छात्र नेताओं में थे। पटना मेडिकल कॉलेज भी आंदोलनकारी छात्रों की गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था। एआईएसएफ के एक सम्मेलन में ‘पीपुल्स वार’ का नारा स्वीकार किया गया। इसी दौरान पार्टी की ओर से ‘फॉरवर्ड टू फ्रीडम’ नामक पर्चा आया। छात्रों ने पचास हजार लोगों का जुलूस लेकर सचिवालय की ओर मार्च किया। पुलिस ने गोली और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। गणेश दा आंसू गैस की वजह से गिर पड़े थे। सचिवालय गोलीकांड में शहीद हुए सात लोगों में सबसे आगे रहने वाले उमाकांत उनके ही स्कूल के छात्र थे। इसी दौर में उनकी आंदोलनात्मक गतिविधियों से चिंतित उनके पिता ने उनकी शादी कर दी। परिवार को उम्मीद थी कि विवाह के बाद शायद उनका जीवन कुछ ‘सुधर’ जाएगा। लेकिन विवाह भी उनके विद्रोही स्वभाव और राजनीतिक प्रतिबद्धता को नहीं बदल सका।

जमींदार परिवार का बेटा और किसान आंदोलन
शादी के बाद भी गणेश दा का अपने सामंती पारिवारिक परिवेश से संघर्ष जारी रहा। उस समय उनकी पत्नी बस पकड़ने के लिए पैदल स्टॉप तक जाती थीं और परिवार के लोगों को यह भी पसंद नहीं था। लेकिन गणेश दा ने धीरे-धीरे अपने जीवन और राजनीतिक आचरण से परिवार की सामंती धारणाओं के विरुद्ध रास्ता बनाया। जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व वाले जमींदार-विरोधी किसान आंदोलन से जुड़ गए। स्वामी सहजानंद उन्हें बहुत पसंद करते थे और 1952 के पहले आम चुनाव में उन्हें चुनाव लड़ाना चाहते थे। लेकिन 1950 में ही स्वामी सहजानंद का निधन हो गया। गणेश दा ने 1952 में किसान सभा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उसी चुनाव में उनके चाचा भी उम्मीदवार थे। कम्युनिस्ट राजनीति के प्रति परिवार में इतनी नाराजगी थी कि उनकी मां ने भी उन्हें वोट नहीं दिया। यह प्रसंग केवल पारिवारिक विरोध का नहीं, बल्कि उस सामाजिक रूपांतरण का प्रतीक था जिसमें एक जमींदार परिवार का युवक अपने वर्गीय हितों के विरुद्ध खड़ा होकर किसानों और गरीबों की राजनीति को अपना जीवन समर्पित कर रहा था।
‘तुमसे डर लगता है’
1950 के दशक में गणेश शंकर विद्यार्थी का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। चर्चित आलोचक भगवान प्रसाद सिन्हा ने गणेश दा से सुने एक प्रसंग को याद करते हुए बताया था कि कम्युनिस्ट पार्टी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे कम्युनिस्ट उम्मीदवार भोला प्रसाद के पक्ष में गणेश दा को चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दी थी। बरबीघा स्थित श्रीकृष्ण सिंह के गांव तेउस में दबंग सामंती तत्वों से गरीबों के वोटों की रक्षा की जिम्मेदारी उन्हें मिली। मतदान की पूर्व संध्या पर वे वहां पहुंचे। उस इलाके में उनके रिश्तेदार भी थे। उन्होंने अपने रिश्तों का इस्तेमाल कम्युनिस्ट उम्मीदवार के पक्ष में किया और मतदान के दिन बूथ पर सामंती तत्वों से सीधे टकरा गए। उनके रिश्तेदार भी वहां पहुंच गए और बूथ की हिफाजत संभव हुई। शायद इन्हीं अनुभवों के कारण बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह गणेश दा से दूरी बनाकर रखते थे। गणेश दा के अनुसार वे उन्हें दूर बैठाते और कहते थे— ‘तुमसे डर लगता है।’
आजादी के बाद का पहला छात्र गोलीकांड
1955 में छात्रों पर हुए गोलीकांड के बाद आंदोलन में गणेश दा ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्वतंत्र भारत में छात्रों पर हुए इस शुरुआती गोलीकांड में बीएन कॉलेज के छात्र दीनानाथ पांडे की मौत हुई थी। इस घटना के बाद आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पटना आना पड़ा। गणेश दा के राजनीतिक जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वे केवल पार्टी के भीतर सक्रिय नेता नहीं रहे, बल्कि व्यापक जन आंदोलनों के सक्रिय हस्तक्षेपकारी बने रहे।

सीपीआई से सीपीआई(एम) तक
1964 में कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के समय गणेश दा उन नेताओं में थे जिन्होंने सीपीआई(एम) का रास्ता चुना। इसके बाद बिहार में पार्टी निर्माण का उनका लंबा दौर शुरू हुआ। 1964 से 1980 के बीच सीपीआई(एम) को कई तरह के विभाजनों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। नक्सल आंदोलन के कारण एक धारा अलग हुई। 1973 में मजदूर नेता ए.के. राय के नेतृत्व में मार्क्सिस्ट कोऑर्डिनेशन कमिटी (एमसीसी) का गठन हुआ। 1980 में तत्कालीन राज्य सचिव सियावर शरण श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक धड़ा अलग होकर मार्क्सिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एमसीपीआई) के रूप में सामने आया। इन्हीं कठिन परिस्थितियों में गणेश दा ने पार्टी की कमान संभाली।
मुश्किल दौर में पार्टी की कमान
1980 से 2005 तक गणेश शंकर विद्यार्थी सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव रहे। इसके साथ ही वे पार्टी की केंद्रीय कमिटी के भी लगभग तीन दशकों तक सदस्य रहे। उनके नेतृत्व में पार्टी ने न केवल अपने संगठन को टूटने से बचाया, बल्कि बिहार में उसका उल्लेखनीय विस्तार भी हुआ। भूमि संघर्षों के जरिए पार्टी ने ग्रामीण गरीबों और भूमिहीनों के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। इन संघर्षों में कई महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं की हत्या हुई। अजीत सरकार की हत्या ने पार्टी को गहरे सदमे में डाल दिया था।
सीपीआई(एम) के तत्कालीन राज्य सचिव अवधेश कुमार ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि 14 जून 1998 को भूमि मुक्ति आंदोलन के नेता और पूर्णिया के विधायक अजीत सरकार की हत्या की खबर मिलने पर गणेश दा के नेतृत्व में पार्टी की टीम पूर्णिया पहुंची। अवधेश कुमार भी उस टीम के सदस्य थे। पूर्णिया बंद था और आदिवासी तथा भूमिहीन जनता सहित बड़ी संख्या में लोग आक्रोश में सड़कों पर उतर आए थे। उस समय राज्य में राजद की सरकार थी और सरकार के खिलाफ भी जनाक्रोश था। लालू प्रसाद अजीत सरकार को श्रद्धांजलि देने पूर्णिया आना चाहते थे, लेकिन जनाक्रोश को लेकर वे दुविधा में थे। उन्होंने गणेश दा को फोन किया। विद्यार्थी जी ने उन्हें आश्वस्त किया और आने के लिए कहा। लालू प्रसाद पूर्णिया आए, श्रद्धांजलि दी और कई घोषणाएं कर वापस लौटे।
साथियों के प्रति स्नेह
गणेश दा के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनके साथियों के प्रति उनका गहरा स्नेह था। अवधेश कुमार एक संस्मरण सुनाते हैं। 1986 में उन्हें मास्को में युवा महोत्सव में भाग लेना था, लेकिन संगठन के भीतर कुछ समस्याओं के कारण वे असमंजस में थे। वे एनी बेसेंट रोड स्थित एसएफआई के राज्य कार्यालय में बैठे थे। गणेश दा को इसकी जानकारी मिली तो वे सीधे वहां पहुंचे और कहा— ‘आपको ही मास्को युवा महोत्सव जाना होगा। आप जाइए। वहां क्रेमलिन जाकर कॉमरेड लेनिन के रखे मृत शरीर पर फूल चढ़ाना।’ इसके बाद उन्होंने विस्तार से लेनिन और रूसी क्रांति के बारे में उन्हें बताया। ऐसे प्रसंग बताते हैं कि गणेश दा के लिए संगठन केवल राजनीतिक संरचना नहीं था; वह साथियों के साथ रिश्तों और वैचारिक प्रतिबद्धता से निर्मित एक जीवंत समुदाय भी था।
मंडल दौर और वर्गीय दृष्टि
1990 के दशक में विधानसभा में भी सीपीआई(एम) की उपस्थिति बढ़ी। कभी नवादा तो कभी भागलपुर से पार्टी का सांसद भी रहा। इसी दौर में मंडल आयोग और पिछड़ों के आरक्षण का सवाल देश की राजनीति के केंद्र में आया। मंडल दौर पर विचार करते हुए गणेश दा ने वर्गीय दृष्टिकोण की जरूरत पर जोर दिया था। उनका कहना था—
‘‘मंडल आयोग में जब पिछड़ों को आरक्षण देने की बात हुई, हमने कहा था कि ‘क्लास आउटलुक’ का ध्यान रखना चाहिए। पिछड़ों में भी जो गरीब हैं, उनको इसका लाभ मिले। लेकिन हमारी कमजोरी यह रही कि हम इस लाइन को असरदार नहीं बना पाए।’’
उनका मानना था कि यदि पिछड़ों और दलितों के बीच वर्गीय विभाजन को राजनीतिक रूप से प्रभावी ढंग से सामने लाया जाता तो जातीय भावनाओं का इस्तेमाल करने वाले निहित स्वार्थों को चुनौती दी जा सकती थी।
यह उनके राजनीतिक चिंतन का महत्वपूर्ण पक्ष था—जाति के सवाल की उपेक्षा किए बिना उसके भीतर मौजूद वर्गीय अंतर्विरोधों को पहचानना।

जमीन का संघर्ष और राजनीतिक चेतना
नवादा में भी गणेश दा ने अनेक भूमि आंदोलनों को मूर्त रूप देने में भूमिका निभाई। इनमें रजौली ढाब, कुम्हरूआ, धमनी, दिबौर, सतगीर तथा सिरदला के हमजा भारत, नाद, केबाल और खटांगी आदि के मामले प्रमुख थे। भूदान आंदोलन से भी उनका गहरा संबंध रहा। उनके परिवार के लोगों ने काफी जमीन भूदान में दी थी, लेकिन उस जमीन का समुचित वितरण नहीं हो सका था। उम्र के अंतिम पड़ाव तक गणेश दा इस सवाल को लेकर सक्रिय रहे। भूदान यज्ञ कमिटी के अध्यक्ष रहे शुभमूर्ति ने बताया कि विद्यार्थी जी से उनका परिचय बिहार आंदोलन के समय से था। उनके पिता और चाचा ने काफी जमीन भूदान में दी थी। जब शुभमूर्ति भूदान कमिटी के अध्यक्ष थे और गणेश दा की उम्र अस्सी वर्ष से अधिक हो चुकी थी, तब भी वे लाठी के सहारे उनके कार्यालय पहुंचे और कहा कि दान की गई जमीन का उचित वितरण किया जाए। वितरण में आने वाली बाधाओं के कारण प्रक्रिया में देर होती रही, लेकिन गणेश दा समय-समय पर कार्यालय आते रहे। गांव में भूमिहीन महिलाओं की सूची तैयार करने में भी उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। उनकी अध्यक्षता में भूदान प्रमाणपत्र महिलाओं के बीच वितरित किए गए। शुभमूर्ति के अनुसार, उस उम्र में भी गणेश दा का यह जज्बा अत्यंत प्रेरक था।
प्रशासनिक हलकों में सम्मान
गणेश दा का सम्मान केवल राजनीतिक और सामाजिक हलकों में ही नहीं था। प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी उनके प्रति एक विशेष आदर था। बिहार के चर्चित आईपीएस अधिकारी राज्यवर्धन शर्मा ने उन्हें याद करते हुए बताया कि उन्होंने विद्यार्थी जी का नाम अपने विद्यार्थी जीवन में ही सुन रखा था। जयप्रकाश आंदोलन के दौरान उनके बारे में अनेक कहानियां सुनी थीं—एक जमींदार परिवार में जन्म लेने और अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वे अपने परिवार की अपेक्षाओं के विपरीत कम्युनिस्ट बन गए थे। 1985 के आसपास, जब वे नवादा के पड़ोसी जिले नालंदा के एसपी थे, तब उनका विद्यार्थी जी से परिचय हुआ। बाद में उनका तबादला बेगूसराय हो गया। वहां पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और आपराधिक मुकदमों का मामला सामने आया। प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान लिए गए उनके निर्णयों से गणेश दा प्रभावित हुए और धीरे-धीरे उनके बीच विश्वास का रिश्ता बना।
अप्रैल 1987 में विपक्षी पार्टियों की एक बड़ी बैठक होने वाली थी, जिसका मुख्य एजेंडा प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना था। बैठक में जाने से पहले विद्यार्थी जी उनसे मिलने आए। दोनों के बीच विस्तार से बातचीत हुई और एक गलतफहमी दूर हुई। राज्यवर्धन शर्मा के अनुसार, बैठक में गणेश दा ने अपने भाषण में प्रशासन पर कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया। वे कहते थे कि गणेश दा सादा जीवन जीने वाले सच्चे कम्युनिस्ट थे। उन्होंने आम लोगों के लिए अपने जीवन की अनेक सुख-सुविधाओं का त्याग किया था।

‘जिनको जमीन दिलाई, उनको पॉलिटिसाइज नहीं किया’
गणेश दा के राजनीतिक चिंतन का सबसे आत्मालोचनात्मक पक्ष उनके अंतिम दौर के एक साक्षात्कार में सामने आता है। राज्य सचिव का पद छोड़ने के समय दिए गए इस साक्षात्कार में उन्होंने वाम आंदोलन की कार्यपद्धति और संसदीय भटकाव पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था—
‘‘यह एक तथ्य है कि हमारे लोगों में संसदवाद हावी हो गया है। लोग कुछ नहीं तो कम से कम मुखिया या कैबिनेट के मेंबर ही बन जाना चाहते हैं।’’ उनका मानना था कि आंदोलन की जगह प्रशासनिक संपर्क और समझौते पर निर्भरता बढ़ गई है। वे सवाल उठाते थे कि आखिर कार्यकर्ताओं और जनता के भीतर संघर्ष की भावना क्यों कमजोर हो रही है। उनकी सबसे महत्वपूर्ण आत्मालोचनाओं में से एक थी—
‘‘वैसे परिवारों में भी, जिसे हम लोगों ने काफी मेहनत, संघर्ष करके जमीन दिलाई, वो अब राजद में चला गया है।’’ वे इसके कारण को केवल जनता की राजनीतिक पसंद में नहीं देखते थे, बल्कि संगठन की अपनी कमी के रूप में पहचानते थे— ‘‘ऐसा इसलिए हुआ कि हमने उन्हें पॉलिटिसाइज नहीं किया। जमीन दिलाकर एक लड़ाई में हमने जीत अवश्य हासिल की। पर उनसे रोज-रोज संपर्क, पार्टी साहित्य से परिचित कराना, लगातार चेतना के स्तर को उन्नत करने का काम नहीं किया। उन्हें कम्युनिस्ट नहीं बनाया।’’
गणेश दा के लिए राजनीतिक संघर्ष का अर्थ केवल किसी मांग को हासिल कर लेना नहीं था। उनके लिए संघर्ष का वास्तविक उद्देश्य जनता के भीतर वर्गीय चेतना का विकास और उसे स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलना था।
आरक्षण के सवाल पर भी वे इसी कमी की ओर संकेत करते थे। उनका कहना था कि पार्टी ने कागज पर वर्गीय पहलू को आगे बढ़ाने का फैसला किया, लेकिन उसे जनता के बीच ले जाने में विफल रही। वर्ग संघर्ष को तेज न कर पाने के कारण जातीय प्रभाव और अवसरवाद का असर वामपंथी संगठनों के भीतर भी बढ़ा।
‘बदलाव का कोई शॉर्टकट नहीं होता’
गणेश शंकर विद्यार्थी का मार्क्सवाद किसी नारे तक सीमित नहीं था। वह उनके लिए जीवन और राजनीति को समझने का आधार था। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने बार-बार संगठन, संघर्ष और वर्गीय चेतना के सवाल को केंद्र में रखा। उसी साक्षात्कार में उन्होंने वामपंथ के बारे में कहा था—
‘‘बदलाव का कोई शॉर्टकट नहीं होता। बदलाव का एक ही रास्ता है—लड़ाई, संघर्ष। वर्गीय शक्तियों को अपने पक्ष में नहीं करेंगे तो बदलाव नहीं आएगा। वामपंथी लोग एक साथ मिलकर इस दिशा में प्रयास करें तो परिवर्तन अवश्य आएगा।’’
यह कथन उनके पूरे राजनीतिक जीवन का सार माना जा सकता है।
अंतिम दिनों तक किताबों और मार्क्सवाद से रिश्ता
मार्क्सवाद के प्रति गणेश दा की प्रतिबद्धता जीवन के अंतिम दिनों तक बनी रही। वे उम्र के अंतिम पड़ाव तक राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में रुचि लेते रहे। जब सीपीआई के राज्य सचिव सत्यनारायण सिंह का निधन हुआ, तब भी वे उनकी श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे। कोरोना काल के बाद जब ‘जनशक्ति’ का प्रकाशन फिर शुरू हुआ, तब गणेश दा उसमें शामिल हुए और पार्टी अखबार के महत्व पर अपनी बातें रखीं।
अंतिम समय तक उनका किताबों से रिश्ता बना रहा। वे नई-नई मार्क्सवादी किताबें खरीदकर पढ़ते और दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। सीपीआई(एम) केंद्रीय कमिटी के भूतपूर्व सदस्य अरुण कुमार मिश्रा बताते हैं— ‘‘गणेश दा अंतिम क्षणों तक नई किताबों को पढ़ने के प्रति ऐसे उत्सुक रहते थे, जैसे कोई बच्चा नया खिलौना पाने के लिए होता है। हाल के दिनों में जब भी बातें होती थीं, वे किसी न किसी किताब की चर्चा करते और उसे पढ़ने की सलाह देते थे।’’
उनके पास आने वाले युवा कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और वाम आंदोलन से जुड़े लोगों की एक खास जिज्ञासा होती थी—कम्युनिस्ट आंदोलन के उस पुराने दौर को जानना, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। गणेश दा एस.ए. डांगे, पी.सी. जोशी, बी.टी. रणदिवे, ई.एम.एस. नंबूदरीपाद और प्रमोद दास गुप्ता जैसे कम्युनिस्ट आंदोलन के दिग्गज नेताओं के संस्मरण सुनाया करते थे। इसीलिए उनके संस्मरण केवल निजी स्मृतियां नहीं हैं। वे भारतीय और खासकर बिहार के कम्युनिस्ट आंदोलन के एक लंबे दौर की जीवित स्मृति हैं।
सादा जीवन, कठोर प्रतिबद्धता
आठ दशकों के लंबे राजनीतिक जीवन में गणेश शंकर विद्यार्थी ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन, कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन, सीपीआई(एम) के निर्माण, भूमि संघर्षों, मंडल आंदोलन और वाम आंदोलन के भीतर बढ़ते संसदीय प्रभाव तक के दौर को करीब से देखा। इस लंबे सफर में वे लगभग छह वर्षों तक जेल में रहे। स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद उन्होंने कभी पेंशन नहीं ली।
एक जमींदार परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी शोषणविहीन समाज के निर्माण के संघर्ष को समर्पित कर दे—गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन इस असाधारण रूपांतरण की कहानी है। उनके जीवन में विरोधाभास भी थे, असफलताएं भी थीं और राजनीतिक आत्मालोचना भी। लेकिन एक चीज लगातार बनी रही—मार्क्सवाद और शोषणविहीन समाज के निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता।
एक जीवित दस्तावेज के रूप में ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’
गणेश दा के निधन के बाद उनके संस्मरणों को पुस्तकाकार रूप देने का काम अधूरा रह गया था। सिद्धेश्वर नाथ पांडे, जिन्होंने वर्षों की बातचीत के आधार पर उनकी स्मृतियों को लिपिबद्ध किया था, स्वयं भी इस बीच नहीं रहे। अब ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ के प्रकाशन के साथ उस अधूरे काम को एक महत्वपूर्ण मुकाम मिला है। यह पुस्तक केवल गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन की कथा नहीं है। इसमें बिहार के ग्रामीण समाज, जमींदारी-विरोधी संघर्ष, छात्र आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन, किसान राजनीति, कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण, सीपीआई-सीपीआई(एम) विभाजन, भूमि संघर्षों, मंडल दौर और वाम आंदोलन के अंतर्विरोधों की अनेक परतें दिखाई देती हैं। इस अर्थ में गणेश दा की स्मृतियां बिहार के कम्युनिस्ट आंदोलन की उस मौखिक परंपरा को दस्तावेज में बदलने का काम करती हैं, जिसका अब तक बहुत कम लिखित इतिहास उपलब्ध है। गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन हमें यह भी याद दिलाता है कि राजनीतिक प्रतिबद्धता केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को बदलने की दीर्घकालिक प्रक्रिया है। वे अक्सर कहा करते थे—‘बदलाव का कोई शॉर्टकट नहीं होता।’ उनकी लगभग आठ दशक लंबी राजनीतिक यात्रा इसी विश्वास की गवाही है।

अनीश अंकुर (लेखक व संस्कृतिकर्मी )
पिछले साढ़े तीन दशकों से रंगमंच से सक्रिय रूप से जुड़े अभिनेता, रंगकर्मी और कला लेखक हैं। उन्होंने पटना सहित बिहार के दूर-दराज़ के गाँवों और कस्बों में रंगमंच को पहुँचाने के साथ-साथ देश के विभिन्न शहरों में भी नाटकों का मंचन किया है। उनके अभिनय की यात्रा में न्यायप्रिय, हानुश, गैलीलियो, अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल, महाभोज, फाइनल सॉल्यूशन, शम्बूक वध , बड़े भाई साहब, मौलाना आजाद जैसे चर्चित नाटक शामिल हैं। नुक्कड़ रंगमंच में भी उन्होंने मशीन, सबसे सस्ता गोश्त, सदाचार का ताबीज, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर, गिरगिट , नहीं कबूल (जन नाट्य मंच), ये दौड़ है किसकी(जन नाट्य मंच ) जैसे महत्वपूर्ण नाटकों में सक्रिय भूमिका निभाई है। रंगमंच के साथ उनका जुड़ाव लेखन के क्षेत्र में भी रहा है। उन्होंने नाटक, रंगकर्म, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन किया है तथा कई चर्चित रंगकर्मियों के साक्षात्कार भी लिए हैं। पेरिस कम्यून, रोजा लक्ज़मबर्ग और कार्यनंद शर्मा सहित विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक विषयों-व्यक्तित्वों पर उनकी किताबें प्रकाशित हुई हैं। वर्तमान में वे ‘अभियान सांस्कृतिक मंच’, पटना के संयोजक हैं।
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...