भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।
बंगालियों की संस्कृति: भोजन और भजन
भोजन और भजन के नाम पर बँटवारा: बंगाल की चेतना पर हमला
~ मालिनी भट्टाचार्य ~
इलिश-बकरे के नाम पर बाबाजी का ढोंग और बंगाली अस्मिता का अपमान
आजकल 'अष्टमी की इलिश' (हिलसा मछली) और 'नवमी का बकरा' (मटन)—ये दो बातें बंगाली संस्कृति के दो मुख्य शीर्षक बनती दिख रही हैं। हाल ही में एक मामूली ढोंगी 'बिरिंचीबाबा' को सरकारी आमंत्रण पर पश्चिम बंगाल आने और भोजन (जिसे उसने - 'गंदा' कहा !) करने का न्योता मिला। जब उसने पूजा के दिनों में इस तरह का गंदा-गंदा खाना खाने के लिए पूरी बंगाली जाति को 'पाखंडी' कहकर गाली दी, तो हमारा गुस्सा होना स्वाभाविक था। हमारी खान-पान की आदतों को बदलने की कोशिश के खिलाफ फ़ेसबुक पर बाबाजी की जमकर फजीहत हुई; उम्मीद है कि दो-चार एफआईआर (FIR) भी होंगी, ताकि वह दोबारा इस तरफ कदम बढ़ाने की हिम्मत न करे।
मुख्यमंत्री का पाखंड प्रेम और बंगाली बुद्धिमत्ता पर सीधा हमला
यह सब इसलिए ज़रूरी था क्योंकि खुद मुख्यमंत्री ने बड़ी शेखी बघारते हुए उनका स्वागत किया था और विशेष रूप से आमंत्रित किया था, ताकि बाबाजी के अलौकिक चमत्कार, ढोंग-पाखंड वाले इलाज और 'जनसेवा' का धंधा इस राज्य में आकर फल-फूल सके। अब मुख्यमंत्री और उनके संगी-साथी जी-जान से मामले को संभालने में लगे हैं। लेकिन हमें इलिश और बकरे के इस दायरे में फंसकर यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे खान-पान पर हमले के साथ-साथ, उन्हें बंगाल में अड्डा जमाने का न्योता देना बंगालियों की बौद्धिक क्षमता पर भी हमला था। हमें उसके खिलाफ भी उतनी ही मुखरता से आवाज उठानी चाहिए। अगर हम यह सोचें कि सरकार द्वारा पूजा के समय मांसाहार पर आपत्ति न जताने भर से इस प्रस्तावित ढोंग-पाखंड के धंधे को चुपचाप स्वीकार कर लिया जाए, तो यह बंगालियों की बुद्धिमत्ता पर धिक्कार है।
ईद पर गोमांस का प्रतिबन्ध और पोषण के घटते स्तर का कड़वा सच
यह बात मैं एक खास वजह से कह रही हूँ। जैसे दुर्गा पूजा में मांसाहार का चलन है, वैसे ही कई बंगाली ईद के समय गोमांस खाते हैं। इस साल नई सरकार के सत्ता में आते ही इस प्रचलित प्रथा को बंद कर दिया गया; यहाँ तक कि मवेशी बेचने के कारोबार पर भी रोक लगा दी गई। जबकि जिन लोगों ने इसे बंद कराया है, उनमें से कई विदेश में गोमांस का व्यापार करके फल-फूल रहे हैं। बड़े-बड़े रेस्तरां में बीफ़ स्टेक (Beef Steak) खाने वालों के अलावा, इस राज्य के बहुत से गरीब लोगों के भोजन में पशु प्रोटीन का यह स्रोत कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत और इस राज्य में वर्तमान में पोषण का स्तर कितना गिर चुका है, यह हम सब जानते हैं। जिनके लिए पेट भर चावल पाना ही एक समस्या है, उन्हें पशु प्रोटीन कहाँ से मिलेगा? 'कलाई डुबोकर' (एक मंत्री के शब्दों में) इलिश और बकरा दोनों खाना उनकी हैसियत से बाहर है। ग्रामीण इलाकों की नहरों-पोखर में शायद मौसम के अनुसार कुछ छोटी-मोटी मछलियाँ अब भी मिल जाती हैं; तालाब से घोंघे-सीप (गेंड़ी-गुगली) भी चुन लिए जाते हैं। लेकिन उसका जो हिस्सा शहरों के बाजारों में ऊँचे दामों पर बिक जाता है, उसके बाद स्थानीय लोगों के लिए कितना बचता है? और वे स्रोत भी धीरे-धीरे छीनते जा रहे हैं। फिर भी जब इस बार ईद पर गोमांस व्यावहारिक रूप से प्रतिबंधित हुआ, तो क्या बंगाली आज की तरह क्रुद्ध हुए थे? हमारी बौद्धिक चेतना को लेकर चिंता इसी कारण होती है।
मिड-डे मील का 'इस्कॉनिक' कॉरपोरेटीकरण और गरीबों के अधिकार की डकैती
लेकिन इसके इससे भी अधिक खतरनाक उदाहरण पहले ही सामने आ चुके हैं। इलिश और बकरा खाने वाले बंगालियों और उन बच्चों के बीच क्या आज इतना आर्थिक-सामाजिक अंतर पैदा हो गया है कि स्कूलों के मिड-डे मील में हफ्ते में सिर्फ दो अंडे दिए जाने के मामले पर—बिना किसी चर्चा या पूर्व तैयारी के—नई सरकार ने अचानक भोजन आपूर्ति की जिम्मेदारी 'शुद्धाचारी' इस्कॉन को सौंप दी? फिर भी बहुत अधिक विरोध सुनने को नहीं मिला। बल्कि इस्कॉन के रेस्तरां में दोगुनी कीमत पर वेज थाली खाने के आदी कुछ बाबू लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि स्वयं-सहायता समूहों की गंदी रसोई में अभावों के बीच जो रसोइया खाना बनाते हैं, उसकी तुलना में केंद्रीय रसोई से भेजा गया शाकाहारी भोजन तो अमृत समान है। एक झटके में कहीं कोई शिकायत दर्ज कराने का रास्ता तक नहीं छोड़ा गया। यहाँ तो जिम्मेदारी बागेश्वर बाबा से भी बड़े व्यापारिक चक्र को सौंप दी गई। उनके हाथों जब भोजन के अधिकार और खान-पान की आदत का सरकारी आश्वासन गायब होने लगा, तब भी हम इतने आक्रोशित नहीं हुए। बल्कि हमने कहा—'चलो देखते हैं, नई सरकार क्या करती है!'

खान-पान का अधिकार और विविध संस्कृतियों के मिश्रण पर कुठाराघात
खान-पान का मतलब केवल यह नहीं है कि मैं क्या खाता हूँ। कई हिंदू बंगाली धार्मिक आस्था के कारण गोमांस नहीं खाते, यह उनका अधिकार है। दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय उसी कारण से सूअर का मांस नहीं खाता, यह उनका अधिकार है। लेकिन जब गाय के खिलाफ सूअर को खड़ा करके मुसलमानों की मान्यताओं पर हमला किया जाता है और बेहद अभद्र भाषा में उनका उपहास उड़ाया जाता है, तब एक बंगाली के रूप में क्या हम इस विभाजन के खिलाफ इसी तरह खड़े होते हैं?
बंगालियों की संस्कृति किसी एक स्रोत से नहीं आई है। यह हिंदू, बौद्ध, सिख, मुसलमान और ईसाइयों के ऐतिहासिक मिश्रण से बनी है। और इसमें कोई संदेह नहीं है कि बंगाल के मूल निवासियों के साथ-साथ पठान, मुगल, सिंधी, पारसी, बिहारी, उड़िया और मारवाड़ी—जो भी लंबे समय से यहाँ रहे हैं—उनकी भाषा और संस्कृति के विभिन्न तत्वों ने मिलकर हमें समृद्ध किया है। किसी विशेष व्यापारी वर्ग की सरकारी चाटुकारिता शुरू होने से बहुत पहले से यह सच रहा है। वहाँ जैसे भोजन के स्वाद और सामग्रियों में विविधता हो सकती है, वैसे ही धार्मिक रीति-रिवाजों में भी अंतर हो सकता है। इस विषय पर क्या बंगालियों की बुद्धि उस विविधता के प्रति सहनशील रह पा रही है?
'भजन' का राजनीतिक इस्तेमाल और सत्ता का 'सनातन' ढोंग
भोजन में विविधता की तरह ही बंगालियों के 'भजन' (पूजा-अर्चना) में भी विविधता है। एक का दूसरे के साथ जो संबंध मैंने ऊपर बताया है, उसी के संदर्भ में—स्वयं धार्मिक न होते हुए भी—मुझे लगता है कि मुझे दो-चार बातें कहने का अधिकार है। कई लोगों के अनुसार आज पश्चिम बंगाल में जिन नई पूजाओं का चलन बढ़ रहा है, जैसे हनुमान या गणेश की पूजा, वे ठीक तरह से बंगालियों की पूजा नहीं हैं। यहाँ तक कि यहाँ एक-दो जगहों पर राम की पूजा प्रचलित होते हुए भी, उत्तर भारत के राम और हमारे राम की समानता तथा अंतर पर बहुत से विवाद हैं। हालाँकि हमारे वर्तमान शासक इसे मानना चाहेंगे, ऐसा नहीं लगता।
मेरे विचार से, जब बंगाली हिंदू तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को मानते हैं, तो हनुमान या गणेश की पूजा कर लेने में क्या हर्ज है? विवाह और अन्य आयोजनों में शहरी बंगालियों ने 'संगीत' और 'हल्दी' जैसे उत्तर भारतीय रीति-रिवाजों को अपना ही लिया है। फिर बहुत पहले से ही हमारे तैंतीस करोड़ में क्या लोक-देवता मनसा और शीतला शामिल नहीं हो गए थे? यहाँ तक कि ईश्वर (अल्लाह) के निराकार होने के बावजूद क्या हमारे गाँव-गाँव में सैकड़ों पीरों के मज़ार नहीं फैले हैं? क्या मुसलमान भी सत्यपीर और बनबीबी की पूजा-अर्चना नहीं करते? चूँकि शरद ऋतु में दुर्गा पूजा का इतना विशेष रूप बंगाल में ही है, इसीलिए सत्तारूढ़ दल के पास कोई दूसरा मॉडल नहीं है; उन्हें बार-बार 'सनातन' ढंग से पूजा की बात कहनी पड़ रही है—जबकि वे खुद भी नहीं जानते कि इसका क्या अर्थ है। और 'पवित्रता' की रक्षा करते हुए पूजा करने से उनका एक ही मतलब है: पंडालों को मुसलमानों और मार्क्सवादियों या "दिमागी नक्सल" देशद्रोहियों के अशुभ प्रभाव से मुक्त रखना। यह भी कैसे किया जाए,इसे लेकर वे भ्रम में हैं और इसीलिए बार-बार बदल-बदलकर बातें कह रहे हैं। हालाँकि शासन के इस पहले साल में अगर वे थोड़ा संभलकर नहीं चले और शहरी शिक्षित बंगाली के स्वाभिमान (अस्मिता) पर ठेस पहुँची, तो उन्हें थोड़ी मुसीबत झेलनी ही पड़ेगी।

'सनातन' अंधकार की परंपरा और सत्ता द्वारा फैलाया जाता धार्मिक जहर
संस्कृति का खतरा दूसरी जगह है। बंगालियों के स्वाभिमान में जहाँ राममोहन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और अक्षयकुमार दत्त की तर्कवादी परंपरा रही है, वहीं कुलीन प्रथा की 'जाति के नाम पर बदमाशी' की धारा भी रही है। एक समय में बंगाल सबसे अधिक सती प्रथा की घटनाओं का रंगमंच था, और स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी दौर में भी इसी बंगाल में एक के बाद एक भाई-घातक दंगों का इतिहास रहा है। यह 'सनातन' अंधकार की परंपरा शहरी शिक्षित बंगाली की त्वचा के नीचे भी मौजूद है।
"अंधकार को फैलाने का धंधा करने वाले ही अब सत्ता में हैं"
भोजन और भजन के जरिए समाज में बँटवारा करके और अंधकार फैलाकर लोगों को चुप रखा जाएगा—इसी भरोसे राज्य के मुख्यमंत्री 'भगवे के अपमान' का जवाब देने के लिए काम के दिन नागा साधुओं की फौज जुटाकर एक राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थान के सामने खड़े होकर उस पर कब्जा करने की धमकी दे सकते हैं।
कॉरपोरेट-फासीवादी गठजोड़ और संस्कृति को निगलता नया नागपाश
ये लोग जब शुरू में आए थे तो खुद को 'राष्ट्रवादी' कहते थे, लेकिन अब 'राष्ट्रवादी' (स्टेटिस्ट) विचारधारा के ध्वजवाहक के रूप में छाती ठोक रहे हैं। यह राज्य (सत्ता) बड़े कॉरपोरेट पूंजी के इशारों पर चल रहा है; वह ताकत अपनी लुभावनी सामग्रियों के साथ राज्य की तमाम दमनकारी शक्तियों से जुड़ गई है। गणेश और हनुमान के सिर फुटपाथ के लोगों द्वारा चलाए जा रहे छोटे-छोटे मंदिरों से निकलकर आसपास के पड़ोस को निगलते हुए आसमान छू रहे हैं। वहाँ का लेन-देन बहुत ऊपर बैठे राष्ट्रवादी नियंत्रित कर रहे हैं। यहाँ तक कि दूर-दराज़ के आदिवासियों के खुले 'जाहेरथान' (पूजा स्थल) में भी रंगीन टाइलों वाले मंदिर बन रहे हैं, जहाँ 'ॐ' या त्रिशूल का चिह्न साफ दिखाई दे रहा है। वे अंधविश्वास और कुरीतियों को पारंपरिक संस्कृति के मूल्यों के आवरण में सजा रहे हैं। मोहल्ले के दायरे में पारंपरिक त्योहारों का ठेका लेकर वे हमारी तमाम स्वाभाविक सामाजिकता, यहाँ तक कि हमारे पारिवारिक जीवन, दोस्ती, हमारे जन्म-मरण-विवाह को नियंत्रण में लाकर बाजार के साँचे में आकर्षक बना रहे हैं। बाबरी मस्जिद के मलबे पर बने अति-विशाल 'भव्य' राम मंदिर की तरह यह हमारी चेतना को निगलता जा रहा है। नई पहचान का यह लुभावना जाल राज्य की ज़बरदस्ती को भी सहनीय बना रहा है। आज बंगाली संस्कृति को इस नागपाश से मुक्त होना ही होगा।

प्रोफेसर मालिनी भट्टाचार्य (जन्म: 1943) पूर्व सांसद ( लोकसभा ), जादवपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की पूर्व प्रोफेसर और 'सेंटर फॉर वूमेन्स स्टडीज' की निदेशक रह चुकी हैं। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति' (AIDWA) की अध्यक्ष भी रही हैं। वे बांग्ला संस्कृति, लोक-संस्कृति, महिला अधिकारों और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अपने तीखे और तार्किक लेखन के लिए जानी जाती हैं।
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 13.09.2026
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