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'इंकलाब जिंदाबाद' कहना अपराध.?. प्रशासन को आनी चाहिए शर्म.!.पुलिस को अदालत की फटकार.!.2 CITU नेताओं को दी जमानत

केशव कुमार भट्टड़•20 मई 20265 मिनट पठन95 बार पढ़ा गया
मानेसर (हरियाणा) में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे श्रमिक नेताओं (अजीत कुमार और अंकित) को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय की न्यायाधीश गगन गीत कौर ने हरियाणा पुलिस द्वारा लगाए गए 'देशविरोधी साजिश' और 'हत्या के प्रयास' जैसे गंभीर आरोपों को खारिज कर दिया। अदालत ने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि पुलिस आरोपियों को हिरासत में रखने का कोई ठोस सबूत नहीं दे सकी। साथ ही, प्रसिद्ध वकील वृंदा ग्रोवर ने भी अदालत में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के नियमों (जैसे कारण न बताना और परिवार को सूचित न करना) के उल्लंघन की बात उठाई। सीआईटीयू (CITU) ने इस फैसले का स्वागत करते हुए आरोप लगाया है कि पुलिस कॉर्पोरेट घरानों के इशारे पर मजदूरों के लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है।

इंकलाब जिंदाबाद कहना अपराध ? 

प्रशासन को शर्म आनी चाहिए !

पुलिस को फटकार लगाते हुए अदालत ने 2 सीआईटीयू (CITU) नेताओं को दी जमानत

*

गुरुग्राम: मानेसर के सीआईटीयू नेता अजीत कुमार और अंकित आखिरकार जमानत पर रिहा हो गए। अदालत के इस जमानत के फैसले से श्रमिकों के खिलाफ पुलिस द्वारा पेश किया गया देशविरोधी साजिश का सिद्धांत व्यावहारिक रूप से ध्वस्त हो गया है। मजदूरी बढ़ाने के शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए श्रमिक नेताओं और कई श्रमिकों को गिरफ्तार किया गया था। पिछले 12 मई को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय से, लगभग एक महीने तक जेल में बंद रहने के बाद दोनों श्रमिक नेताओं को रिहाई मिली है। न्यायाधीश गगन गीत कौर ने उन्हें जमानत देते हुए अपने फैसले में पुलिस की साजिश के सिद्धांत को खारिज कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता का भी उल्लेख किया।

न्यायाधीश ने बताया कि आरोपियों को हिरासत में रखने के पक्ष में हरियाणा पुलिस अदालत में कोई भी तर्क या सबूत पेश नहीं कर सकी। इसलिए उन्हें जमानत दी जा रही है। श्रमिक नेताओं के खिलाफ पुलिस के आरोपों के संदर्भ में न्यायाधीश ने कहा, “अगर इंकलाब जिंदाबाद कहना अपराध है, तो इस व्यवस्था को शर्म आनी चाहिए।” उनके अनुसार, इससे यह साबित होता है कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। यहाँ तक कि नागरिकों के इकट्ठा होने के अधिकार और यूनियन बनाने के अधिकार को भी संकुचित (सीमित) किया जा रहा है। न्यायाधीश ने हरियाणा पुलिस द्वारा सौंपे गए एक वीडियो क्लिप का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें देखा जा रहा है कि श्रमिक न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी कह दिया कि इस कारण से उन्हें हिरासत में रखने का कोई आधार नहीं है।

सीआईटीयू ने इस फैसले का स्वागत किया है। संगठन के बयान में कहा गया है कि कॉर्पोरेट हितों के लिए श्रमिकों का शोषण बनाए रखने और मजदूरी बढ़ाने के आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस मैदान में उतरी है और झूठे आरोप दर्ज किए हैं। कॉर्पोरेट्स की ओर से श्रमिकों के खिलाफ जो साजिश का सिद्धांत पेश किया गया था, वह अदालत में खारिज हो गया है। इसलिए सीआईटीयू ने हिरासत में लिए गए सभी श्रमिकों को तुरंत रिहा करने की मांग की है।

.   उल्लेखनीय है कि पिछले 9 अप्रैल को मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर मानेसर में जो श्रमिक आंदोलन शुरू हुआ था, उसे दबाने के लिए पुलिस ने अभियान चलाया और आंदोलनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया। आंदोलनकारी श्रमिकों के खिलाफ दो अलग-अलग मामले दर्ज किए गए। एक मामले में 45 श्रमिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया, जिनमें 20 महिलाएं शामिल हैं। इस मामले में सभी पहले ही जमानत पर रिहा हो चुके हैं।
. दूसरे मामले में कुल 11 श्रमिक नेताओं को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में श्रमिकों के खिलाफ हत्या, हमले और सरकार के खिलाफ साजिश के आरोप लगाए गए हैं। उनमें से श्रमिक नेता अजीत और अंकित जमानत पर रिहा हो चुके हैं। बाकी 9 लोग अभी भी जेल में बंद हैं।
 सीआईटीयू ने यह भी बताया कि इसी दौरान मानेसर पुलिस ने हरियाणा के सीआईटीयू नेता जय भगवान और विनोद कुमार को नोटिस भेजा है। उन पर श्रमिकों को भड़काकर हिंसक घटना की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है। 4 मई को उन्हें नजरबंद करके रखा गया और 5 मई को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के विरोध में 9 मई को श्रमिकों ने पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय का घेराव किया।

अदालत में हरियाणा पुलिस द्वारा लगाए गए साजिश के आरोपों का खंडन करते हुए वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि जिनके खिलाफ हिंसक घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया गया है, उनमें से कोई भी घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। पुलिस उनके नाम पर झूठे आरोप लगाकर साजिश का सिद्धांत गढ़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि बिना कोई कारण बताए श्रमिकों को अचानक गिरफ्तार कर लिया गया। श्रमिकों को पता ही नहीं था कि उन्हें क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है। कानून के मुताबिक, गिरफ्तारी का कारण बताना पुलिस की बाध्यता है। लेकिन पुलिस ने इसका पालन नहीं किया। यहाँ तक कि परिवार को भी गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया। हालांकि पुलिस ने दावा किया है कि आरोपियों के वकीलों से संपर्क किया गया था, लेकिन वास्तव में उनके वकीलों से कोई संपर्क नहीं किया गया था, यह आरोप वृंदा ग्रोवर ने लगाया।

श्रमिक संघ का दावा है कि आंदोलन के लगातार मजबूत होने के कारण कॉर्पोरेट्स के शह पर पुलिस हर दिन श्रमिकों को तरह-तरह से प्रताड़ित कर रही है। श्रमिक नेताओं को नजरबंद रखा जा रहा है। हालांकि, यूनियन का कहना है कि यह सब करके भी आंदोलन को दबाया नहीं जा सकेगा।

. 

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'इंकलाब जिंदाबाद' कहना अपराध.?. प्रशासन को आनी चाहिए शर्म.!.पुलिस को अदालत की फटकार.!.2 CITU नेताओं को दी जमानत

प्रकाशित: 20 मई 2026 • 5 मिनट पठन

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