वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंविश्लेषण

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

विश्लेषण

'इंकलाब जिंदाबाद' कहना अपराध.?. पढ़ें इस खबर का निहितार्थ और विश्लेषण

केशव कुमार भट्टड़•20 मई 20266 मिनट पठन48 बार पढ़ा गया

मानेसर/गुड़गांव का यह श्रमिक आंदोलन और कोर्ट का फैसला यह साबित करता है कि श्रमिक वर्ग का शोषण और दमन ही पूंजीवाद का असली चरित्र है। सीआईटीयू का यह संकल्प कि "दमन से आंदोलन खत्म नहीं होगा", वामपंथ के इस विश्वास को दोहराता है कि पूंजीपतियों और राज्य के दमनकारी चक्रव्यूह को केवल मजदूरों की वर्गीय एकजुटता, निरंतर संघर्ष और क्रांतिकारी चेतना के बल पर ही तोड़ा जा सकता है।

मानेसर/गुड़गांव (हरियाणा) में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे श्रमिक नेताओं (अजीत कुमार और अंकित) को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय की न्यायाधीश गगन गीत कौर ने हरियाणा पुलिस द्वारा लगाए गए 'देशविरोधी साजिश' और 'हत्या के प्रयास' जैसे गंभीर आरोपों को खारिज कर दिया। अदालत ने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि पुलिस आरोपियों को हिरासत में रखने का कोई ठोस सबूत नहीं दे सकी। साथ ही, प्रसिद्ध वकील वृंदा ग्रोवर ने भी अदालत में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के नियमों (जैसे कारण न बताना और परिवार को सूचित न करना) के उल्लंघन की बात उठाई। सीआईटीयू (CITU) ने इस फैसले का स्वागत करते हुए आरोप लगाया है कि पुलिस कॉर्पोरेट घरानों के इशारे पर मजदूरों के लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है।

इंकलाब जिंदाबाद कहना अपराध .?.

प्रशासन को शर्म आनी चाहिए .!.

पुलिस को फटकार लगाते हुए अदालत ने 2 सीआईटीयू (CITU) नेताओं को दी जमानत

पूरी खबर पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें।

*

विशेष: यहाँ पढ़ें इस खबर का निहितार्थ (Implications)

और विश्लेषण (Analysis)

.

.

खबर का निहितार्थ (Implications)

इस खबर के गहरे सामाजिक, कानूनी और राजनैतिक निहितार्थ हैं:

लोकतांत्रिक अधिकारों की सर्वोच्चता: न्यायालय का यह फैसला साफ करता है कि शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करना, यूनियन बनाना, अपनी मांगें रखना और 'इंकलाब जिंदाबाद' जैसे नारे लगाना कोई अपराध या देशद्रोह नहीं है। यह नागरिकों का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है।

पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल: यह मामला दर्शाता है कि पुलिस कभी-कभी सत्ता या रसूखदार कॉर्पोरेट घरानों के दबाव में आकर कानून का दुरुपयोग करती है। बिना सबूत के गंभीर धाराएं लगाना और गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया (मजदूरों और उनके परिवारों को कारण न बताना) का पालन न करना, पुलिसिया व्यवस्था की निरंकुशता को उजागर करता है।

न्यायपालिका के प्रति विश्वास: जब कार्यपालिका (प्रशासन/पुलिस) नागरिकों के अधिकारों का हनन करती है, तब न्यायपालिका एक मजबूत रक्षक के रूप में सामने आती है। न्यायाधीश की टिप्पणी ("अगर इंकलाब जिंदाबाद कहना अपराध है, तो इस व्यवस्था को शर्म आनी चाहिए") यह भरोसा दिलाती है कि अदालतें नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी के साथ खड़ी हैं।

कॉर्पोरेट बनाम श्रमिक संघर्ष: यह घटना पूंजीपतियों (कॉर्पोरेट्स) और श्रम वर्ग के बीच बढ़ते टकराव को दिखाती है। निहितार्थ यह है कि उद्योग अपनी मनमर्जी और कम वेतन पर काम कराने के लिए राज्य मशीनरी (पुलिस) का इस्तेमाल मजदूरों की आवाज दबाने के हथियार के रूप में कर रहे हैं।

दमन से आंदोलन खत्म नहीं होते: श्रमिक संघ का यह बयान कि "नजरबंदी और प्रताड़ना के बाद भी आंदोलन थमेगा नहीं", यह संकेत देता है कि जब तक बुनियादी जरूरतें (जैसे न्यूनतम मजदूरी) पूरी नहीं होंगी, तब तक प्रशासनिक दबाव के बावजूद जनांदोलनों को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता।

विश्लेषण

यह आरोपित घटना प्रमाणित करती है कि कैसे राज्य सत्ता (State Machinery) और कॉर्पोरेट पूंजीपति मिलकर श्रमिक वर्ग का दमन करते हैं। यह घटना केवल एक 'पुलिसिया चूक' या 'कानूनी मामला' नहीं है, बल्कि यह 'वर्ग संघर्ष' (Class Struggle) का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।

1. पूंजीपति और राज्य सत्ता का अपवित्र गठबंधन (Crony Capitalism)

पूंजीवादी व्यवस्था में सरकार और उसकी पुलिस स्वतंत्र नहीं होतीं, बल्कि वे पूंजीपति वर्ग ('बुर्जुआ') के हितों की रक्षा करने वाले

औजार के रूप में काम करते हैं।

  • मानेसर की घटना में, पुलिस द्वारा न्यूनतम मजदूरी की मांग कर रहे श्रमिकों पर देशद्रोह, हत्या और सरकारी साजिश जैसी संगीन धाराएं लगाना यह साबित करता है कि राज्य मशीनरी कॉर्पोरेट मालिकों के मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

  • जब मजदूर अपने अधिकारों के लिए संगठित होते हैं, तो पूंजीपति अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करके राज्य की हिंसक शक्ति (पुलिस) को मजदूरों के खिलाफ तैनात कर देते हैं।

2. 'इंकलाब जिंदाबाद' पर आपत्ति: वैचारिक डर (Ideological Fear)

अदालत की यह टिप्पणी कि "अगर इंकलाब जिंदाबाद कहना अपराध है, तो इस व्यवस्था को शर्म आनी चाहिए", बहुत महत्वपूर्ण

है।

  • 'इंकलाब जिंदाबाद' (Inquilab Zindabad) का नारा ऐतिहासिक रूप से शोषक व्यवस्था के खिलाफ क्रांति का प्रतीक रहा है।

  • पुलिस और प्रशासन का इस नारे से डरना यह दिखाता है कि सत्ता वर्ग को मजदूरों की आर्थिक मांगों (वेतन वृद्धि) से तो डर है ही, लेकिन वे मजदूरों की वैचारिक चेतना और एकजुटता से और भी ज्यादा डरते हैं। वे हर उस आवाज को 'देशद्रोही' घोषित कर देना चाहते हैं जो स्थापित व्यवस्था को चुनौती देती है।

3. कानूनी प्रक्रिया का हथियार के रूप में इस्तेमाल (Weaponization of Law)

पूंजीवादी राज्य में कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए कम और श्रमिक वर्ग को डराने, थकाने और उनके हौसले तोड़ने के लिए

ज्यादा किया जाता है।

  • बिना किसी सबूत के दो नेताओं को एक महीने तक जेल में रखना, परिवार को सूचना न देना और वकीलों से संपर्क न करने देना यह दर्शाता है कि पुलिस 'सजा से पहले प्रक्रिया' (Process as Punishment) के तहत मजदूरों को प्रताड़ित करना चाहती थी, ताकि अन्य मजदूर डरकर आंदोलन छोड़ दें।

  • हालांकि अदालत ने उन्हें जमानत दे दी, लेकिन 9 श्रमिक नेता अभी भी जेल में हैं। यह न्यायपालिका की सीमाओं को भी रेखांकित करता है कि वह दमन को पूरी तरह रोक नहीं पाती, केवल कुछ हद तक राहत दे पाती है।

4. ट्रेड यूनियनों को कुचलने का फासीवादी प्रयास ("Fascist attempt to crush trade unions")

पूंजीवाद का एक मुख्य एजेंडा होता है 'यूनियन-बंदी' (Union Busting)। जब तक मजदूर असंगठित रहेंगे, उनका शोषण करना

आसान होगा।

  • सीआईटीयू (CITU) जैसे वामपंथी श्रमिक संगठन के नेताओं को घर में नजरबंद करना और झूठे मामलों में फंसाना इसी रणनीति का हिस्सा है।

  • नागरिकों के इकट्ठा होने और यूनियन बनाने के अधिकार को संकुचित करना यह दर्शाता है कि कॉर्पोरेट हितों को साधने के लिए देश को धीरे-धीरे 'कॉर्पोरेट फासीवाद' की ओर धकेला जा रहा है, जहां मुनाफे के आगे लोकतांत्रिक अधिकार शून्य हो जाते हैं।

मानेसर का यह श्रमिक आंदोलन और कोर्ट का फैसला यह साबित करता है कि श्रमिक वर्ग का शोषण और दमन ही पूंजीवाद का असली चरित्र है। सीआईटीयू का यह संकल्प कि "दमन से आंदोलन खत्म नहीं होगा", वामपंथ के इस विश्वास को दोहराता है कि पूंजीपतियों और राज्य के दमनकारी चक्रव्यूह को केवल मजदूरों की वर्गीय एकजुटता, निरंतर संघर्ष और क्रांतिकारी चेतना के बल पर ही तोड़ा जा सकता है।

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

'इंकलाब जिंदाबाद' कहना अपराध.?. पढ़ें इस खबर का निहितार्थ और विश्लेषण

प्रकाशित: 20 मई 2026 • 6 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
विश्लेषण

भारत के बारे में लेनिन ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

कुछ घंटे पहले

राष्ट्रीय

'ज्ञानेश' हटाओ, 'एसआईआर' रोको ~ एम ए बेबी

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

11 अक्टूबर 2026

विश्लेषण

क्या अपनी ही जनता से भयभीत है हुकूमत ?

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?

10 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
विश्लेषण

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

किसी भी बड़े घोटाले में अपराधी भले ही व्यक्ति हों, व्यक्तियों का समूह हो, लेकिन "छात्रों का भरोसा टूटना" सरकार की बड़ी असफलता है। सरकार केवल जांच तक सीमित न रहकर, पूरी चयन और सुरक्षा प्रक्रिया का 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (जड़ से सफाई) करे। यह करना जरूरी है। किसी भी परीक्षा पेपर का लीक होना मतलब सरकारी सुरक्षा को भेद कर परीक्षा पेपर की बिक्री करने वाले गिरोह उसे सही समय पर उड़ा लेते हैं और मुंह-मांगी कीमत पर आगे बेच देते हैं। नीट पेपर का लीक होना सरकार के काम-काज की गंभीरता पर सीधा सवालिया निशान (?) है।

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

विश्लेषण

जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।

केशव कुमार भट्टड़ • 27 जुलाई 2026

विश्लेषण

सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement