हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा ने फिलीस्तीनी कवयित्री फ़दवा तूकान को फेसबुक पोस्ट पर श्रद्धांजलि दी है:-
दोस्तों !
फ़दवा तूकान फ़िलिस्तीनी कवयित्री के लिए इज़रायल के रक्षामंत्री जनरल मोशे दयान ने कहा था कि इस कवयित्री की एक-एक पंक्ति बीस कमांडो पर भारी पड़ती है। इसके बाद फ़दवा के लिखने, छपने, पढ़ने पर रोक लगा दी गयी। जेल जाना, पूछताछ और कई तरह के अत्याचारों को सहती फ़दवा अपने देश में जमीं रहीं जब तक उन्हें मौत की सजा नहीं सुनायी गयी। वह मौत नहीं जंग चाहती थीं। इसलिए शरणार्थी बनना मंज़ूर कर लिया। 1917 में नेबुलुस में पैदा हुई फ़दवा पहले गीत, संगीत और घुमक्कड़ी की शौक़ीन थीं। पिता चाहते थे कि फ़दवा अपने भाई इब्राहीम तुकान की तरह विरोधी कविताएँ लिखें, मगर उन्हें यह मंज़ूर न हुआ। 1967 में जब फ़िलिस्तीन की करारी हार हुई तो फ़दवा ख़्वाबों से जागीं और एक कविता ‘मैं हरगिज़ नहीं रोऊँगी ‘लिखी और अपनी शायरी का अंदाज़ बदल लिया। उनके कई संग्रह ‘एक दिन, ‘उसे मैंने पा लिया,‘ ‘मुझे मुहब्बत दो,’ ‘अकेले दुनिया की छत पर,’ ‘ रात और शहसवार’ हैं। उनकी आत्म-कथा ‘पहाड़ी रास्ता बेढब रास्ता ‘।
फ़दवा का देहांत 2003 में हुआ। उनकी एक कविता यहाँ दे रही हूँ —
अमर फ़िलिस्तीन
ओ मेरे महान देश!
मेरे फ़िलिस्तीन!
संघर्ष के रात-दिन घूमते पाट
घूमते-घूमते बदल न जाएँ दर्द से धुँधली रातों में
मगर मेरे महान देश,
तुम्हारे प्रकाश को बुझाने के लिए उनके हाथ,
छोटे...बहुत छोटे हैं।
तुम्हारी नाकाम इच्छाओं के बावजूद
तुम्हारे विकास के रुके पहियों के बावजूद
तुम्हारी उदास ज़ख़्मी मुस्कान के बावजूद
तुम्हारी औलादें मुतमइन और ख़ुश हैं।
मलबों के ढेर से
ज़ुल्म व सितम के कारावास से
ख़ून में डूबी उन दीवारों से
मौत और ज़िंदगी के तरकश से
ज़िंदगी
एक दिन आज़ाद होगी!
ओ मेरे महान देश!
ओ मेरे गहरे घाव!
मेरी जन्मभूमि मेरा तन्हा प्यार है।
Thanks to Artist : Mohammad Fraij
