वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंअतिथि लेखन

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

अतिथि लेखन

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस - बादल सरोज

श्रेया जायसवाल•30 मई 202611 मिनट पठन22 बार पढ़ा गया

पत्रकारिता – विशेषकर हिंदी पत्रकारिता – लिजलिजाते हुए रेंगते, सत्ता में बैठे राजनेताओं के पांवों में लोटते प्राणियों के झुण्ड में बदल कर रह गयी है। पहरेदार - ‘वॉच डॉग’ – से गोदी मीडिया – लैप डॉग – में बदलकर रह गयी है। इसके लिए पत्रकारों को दोषी ठहराना रोग को गलत तरीके से पहचानना होगा। उनमें आज भी साहस और कौशल की कमी नहीं है – समस्या यह है कि उनकी अभिव्यक्ति पर ही सेंसरशिप लगा दी गयी है। जिन्हें कथित पत्रकारिता के पुरोधा बताकर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, वे और भले कुछ भी कहे जाएँ, पत्रकार कहीं से भी नहीं हैं।

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस - बादल सरोज

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस (30 मई 1826 – 30 मई 2026)

बादल सरोज

यूँ तो हाल के लगभग डेढ़ दशक भारतीय प्रेस – विशेषकर हिंदी भाषी प्रेस - के धीरे-धीरे तेज से तेजतर हुए पराभव और गिरावट के बरस हैं। मगर पिछले दो-ढाई महीने, ईरान पर इजरायल और अमरीका के हमले के बाद के पिछले दो-ढाई महीने, कुछ ज्यादा ही तेजी से हुए पतन के महीने हैं। इनके विस्तार में जाए बिना सिर्फ बीते सप्ताह के हिंदी अखबारों की मुख्य खबरों पर ही नजर डालने से ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। अभी हाल में मोदी विदेश दौरे से लौटे हैं : कायदे से तो प्रेस का काम था कि वह पाँचों देशों की यात्रा के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कर यह पता लगाती कि ये सफ़र शुद्ध अडानी के धंधे के लिए की गयी उसके श्रवण कुमार की यात्रा थी या पसीना बहाने वाली गर्मी से बचने के लिए किया गया ठन्डे देशों का पर्यटन था। मगर बजाय उसका ध्यान किन बातों पर रहा?

नार्वे की एक युवा पत्रकार के प्रश्न पूछने की कोशिश भर से प्रधानमंत्री मोदी के लगभग भागने की खबर पर सिर्फ नार्वे ही नहीं, दुनिया भर के मीडिया में मजाक उड़ा : भारत की हिंदी पत्रकारिता के वीर और वीरांगनाएँ पूरी ताकत से उस युवा पत्रकार के ऐसा पीछे पड़े कि सारी मर्यादाएं तोड़कर चरित्र हनन तक आ गए। इससे भी ज्यादा हल्कापन इटली की प्रधानमंत्री मिलोनी को मेलोडी चॉकलेट खिलाने के प्रधानमंत्री मोदी के हद दर्जे के बचपने के कवरेज में दिखी ; जो इस कदर अशोभनीय हो गयी कि आजिज आकर इटली की प्रधानमंत्री को सोशल मीडिया पर मोदी से पल्ला छुड़ाना पड़ा। लाखों युवाओं सहित उनके परिवारों की जिन्दगी में भूकंप ला देने वाले नीट और सीबीएसई घोटाले की जांच परख, उत्तरदायित्व का निर्धारण प्रेस का काम था – मगर बजाय ऐसा करने के अखबार या तो दोषियों की ढाल बने दिखे या जैसे कुछ हुआ ही नहीं हुआ हो, के भाव में नजर आये। ठीक यही रुख सोना न खरीदने, घर में बंद रहने, पेट्रोल और खाने का तेल कम करने की मोदी की सुधार सप्तपदी को लेकर दिखा। कोई भी जिमेदार प्रेस इस घोषणा के समाज और समूचे अर्थतंत्र पर पड़ने वाले असर का आंकलन करती, उन कारणों की समालोचनात्मक समीक्षा करती, जिनके चलते ऐसे कड़े कदम उठाने का दावा किया गया है। विकल्पों पर विचार करती : मगर लगभग पूरा मीडिया राजा का बाजा बजाते हुए दिखा – उसमे भी हिंदी प्रेस की पीपनी कुछ ज्यादा ही बेसुरी तान छेड़े मिली।

हालांकि इसमें नया कुछ नहीं है, पिछले डेढ़ दशक से यही गत बनी हुई है – आज इसे याद करने की वजह यह है कि इस 30 मई 2026 को हिंदी पत्रकारिता 200 बरस पूरे कर रही है। वर्ष 1826 में इसी दिन कलकत्ता – अब कोलकता – से पण्डित जुगल किशोर शुक्ला कानपुर वाले ने उदंत मार्तंड नाम का, हिंदी का पहला, अखबार निकाला था। अंग्रेजी, फ़ारसी, उर्दू वगैरा भाषाओं में अखबार इससे पहले भी निकलते थे। छापा खाना - प्रिंटिंग प्रेस - वर्ष 1674 में ही बॉम्बे – अब मुम्बई – में कायम हो चुकी थी। इस प्रेस से बंगाल गज़ट वगैरा अखबारों के छपने का सिलसिला भी शुरू हो चुका था। मगर हिंदी अखबार के निकलने में 150 साल लग गए – मजेदार बात यह है कि उसका भी प्रकाशन उस बंगाल से हुआ, जिसकी भाषा हिंदी नहीं थी। खैर, इतिहास ऐसे विस्मयकारी संयोगों से भी मिलकर बनता-बिगड़ता है। मगर मूलतः होता सबक लेने के लिए है। यही वजह है कि इस तरह की तिथियाँ वह अवसर होती हैं, जब धीरज से बैठकर अब तक के किये-अनकिये को सूत्रबद्ध किया जाए। ऐसे सबक लिए जायें, जो आने वाले समय में बेहतरी की उम्मीद जगाते हों। शाम के भूले को सुबह तक लौटाने की राह दिखाते हों। मगर यह सब होने की उम्मीद कम है। एक तो इसलिए कि जो राह भूला हो, उसे तो लौटाकर लाने की संभावना होती है – जिसने गटर खुद चुनी हो, उसे उससे बाहर लाना कठिन काम है। दूसरा इसलिए कि इन दिनों हिंदी भाषी समाज इतिहास से सबक लेने की आदत छोड़कर ऐतिहासिक तिथियों को उत्सव बनाने की कला में सिद्ध हो चुका है। ऐसा ही इस द्विशताब्दी वर्षगाँठ के साथ भी होगा, असल में तो होना शुरू भी हो चुका है। 30 मई को यह उरूज पर पहुंचेगा और जिनकी लेखनी और बोलनी दोनों अशुद्धियों से भरी है, ऐसे अनेक महानुभाव, जिन्होंने इसे आज की गत पर पहुंचाया है, वे बंटाधार के कर्णधार ही इसके सुधार के प्रवचन देते हुए नजर आयेंगे। इन 200 बरस में इसका कितना और क्या योगदान रहा, कितनी नीचाई पाई, कितना उत्थान रहा, इस पर चर्चा से बचने के हर तरीके ढूंढें जायेंगे।

200 साल पहले पहली बार निकले इस अखबार, उदन्त मार्तंड, का घोषित उद्देश्य हिन्दुस्तानियों के हित सामने लाना और राष्ट्रीय चेतना का संचार करना था। इसमें दो मत नहीं कि अधिकांश अखबारों का स्वामित्व अंग्रेज या देशी धनाढ्यों के हाथ में रहने के बावजूद प्रेस ने उस कालखंड में भी भारत की जनता को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों की भूमिका उल्लेखनीय थी।  भारत की आजादी का समर्थक हर नेता और एक्टिविस्ट पत्रकार और सम्पादक भी हुआ था। उसके अखबार प्रतिबंधित भी हुआ करते थे, उनमें लिखे के लिए जुर्माने भुगतने पड़ते थे, जेलें हुआ करती थीं। कृपया ध्यान दें, यहाँ नियमों की बात की जा रही है, अपवादों की नहीं।

आजादी के बाद भी भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों ने आमतौर से समाज को संस्कारित करने, सभ्य बनाने, आगे की ओर  देखने वाला बनाने और एकजुट करने में अपनी भूमिका निबाही। अखबार सिर्फ खबर भर नहीं देते थे, नजरिया भी दिया करते थे। सिर्फ मत, सम्मत या सत्ता पक्ष को ही जगह नहीं देते थे :  विमत, असहमत और विपक्ष को भी प्राथमिकता से स्थान मिलता था। आमतौर से स्तुति और वन्दना से बचते थे, समालोचना और आलोचना को तरजीह देते थे। जिन्हें सरकारी माना जाता था, वे भी असरकारी हुआ करते थे, क्योंकि एक सीमा से ज्यादा सरकारपरस्ती में उन्हें भी लाज आती थी। संतुलन बनाए रखने के लिए उनमें भी अक्सर तीखे और यथार्थ के विश्लेष्ण स्थान पा लिया करते थे। अख़बार – हिंदी अखबार भी – देश और दुनिया के हाल बताते थे। सिर्फ राजनीति ही नहीं साहित्य, विज्ञान, प्रकृति और ब्रह्माण्ड, संस्कृति और कला के अवदान बताया करते थे। दूर-दूर के खेलकूद के मैदान दिखाया करते थे। बच्चों से लेकर बूढों, आदमियों से लेकर औरतों तक की जानकारी और ज्ञान को नयी उड़ान प्रदान करते थे। मनुष्य को इंसान बनाने में शिक्षक और सूचना स्रोत दोनों की भूमिका निबाहा करते थे। सामान्यतः अन्धविश्वास और पाखंड के प्रति आलोचनात्मक हुआ करते थे। सारतः यह कि वे पाठकों को सिर्फ पाठक नहीं मानते थे, उनकी राय के लिए भी जगह रखते थे। बड़े घरानों के स्वामित्व में होने के चलते अपनी वर्ग सापेक्ष पक्षधरता के बावजूद यथासंभव समावेशी दिखने की कोशिश की जाती थीं। खबरों के चयन और सम्पादकीय के मामले में सेठ नहीं,  सम्पादक सर्वोच्च होता था। आमतौर से अखबार मुनाफ़ा कमाने का जरिया नहीं हुआ करते थे। मोटा-मोटी यह बात हिंदी के अखबारों के बारे में भी सच थी ।

अब जब वह 200 वर्ष पूरे कर रही है, तब आम तौर से पूरी और खास तौर से हिंदी की पत्रकारिता के बारे में, यह बात नहीं कही जा सकती। प्रायोजित प्रोपेगंडा, झूठी खबरें, नफरत बुझी सामग्री, अज्ञान और अंधविश्वास से भरी जानकारियाँ और पूर्वाग्रह में पगी खबरें तथा पेड न्यूज़ अब इसकी मुख्य पहचान बन गयी है। सम्पादक लुप्त हो चुका है, उसके नाम पर जो बचे हैं उनकी मेरुदण्ड – रीढ़ की हड्डी – विलुप्त हो चुकी है। पत्रकार हर तरह से असुरक्षित हैं और जो सच में समाचार कहे जा सकते हैं, वे अप्रकाशित हैं। पूरी निर्लज्जता के साथ सत्ता में बैठे – भले हीं वे कितने भी जघन्य अपराधी क्यों न हो – लोगों का गुणगान किया जा रहा है। कई बार तो मालिकों से भी ज्यादा वफादार दिखने के लिए चाटुकारिता की सभी सीमाएं लांघी जा रही हैं।

पत्रकारिता के बारे में कहा जाता था कि उन्हें निष्पक्ष दिखना ही नहीं चाहिए, होना भी चाहिए। आज उस सबको भुलाकर पत्रकारिता – विशेषकर हिंदी पत्रकारिता – लिजलिजाते हुए रेंगते, सत्ता में बैठे राजनेताओं के पांवों में लोटते प्राणियों के झुण्ड में बदल कर रह गयी है।  पहरेदार - ‘वॉच डॉग’ – से गोदी मीडिया – लैप डॉग – में बदलकर रह गयी है। इसके लिए पत्रकारों को दोषी ठहराना रोग को गलत तरीके से पहचानना होगा। उनमें आज भी साहस और कौशल की कमी नहीं है – समस्या यह है कि उनकी अभिव्यक्ति पर ही सेंसरशिप लगा दी गयी है। जिन्हें कथित पत्रकारिता के पुरोधा बताकर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, वे और भले कुछ भी कहे जाएँ, पत्रकार कहीं से भी नहीं हैं।

इसी के दो नमूने हाल ही में सामने आये। दोनों ही पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार करने वाले संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। एक इसके वर्तमान कुलपति का है, दूसरा इसके पूर्व कुलपति का है। हालाँकि इन दिनों इन्हें कुलपति संबोधन नहीं दिया जाता। जब से यह विश्वविद्यालय संघ के चंगुल में गया है और इसने पौराणिक चरित्र नारद को विश्व का पहला पत्रकार माना है और गौमूत्र तथा गोबर पर शोध को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आतुरता दिखाई है, तब से कुलपति को कुलगुरु कहा जाने लगा है। हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी के मौके पर हुए ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ समारोह में इसके वर्तमान कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने सत्ता पार्टी के चरणों की ओर निहारते हुए. लगभग भाव-विगलित होते हुए कहा कि “पहले हम यह आयोजन बंगाल में ही करना चाहते थे, मगर शायद नियति को यही मंजूर था कि पहले बंगाल और कलकत्ता की भूमि का शुद्धिकरण हो, उसके बाद हम 'उदंत मार्तंड' को प्रणाम करने के लिए वहां पहुंचे। बंगाल के लोगों ने शुद्धिकरण का काम संपन्न कर दिया है। इस कार्यक्रम के बाद हम वहीं जाने वाले हैं।" उनके इस विभाजनकारी और राजनीतिक बयान को बाकियों ने ही नहीं, स्वयं इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों ने भी लज्जाजनक बताया है ; मगर कुलगुरु लज्जित होना कब का त्याग चुके हैं। बहरहाल पण्डित तिवारी बौने संस्करण हैं, उनसे ज्यादा निराट बिरादरी के उनसे बड़े, महाकाय, दीर्घाकाय, विराट और भी पधरे हुए हैं। बात व्यक्ति की नहीं है, प्रवृत्ति की है। इसी गलीज प्रवृत्ति की गलाजत पूर्व कुलगुरु और वर्तमान में प्रसार भारती के सदस्य जगदीश उपासने ने दिखाई और नोर्वे की युवा पत्रकार के निजी जीवन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चिपकाकर उसके चरित्र को लेकर भद्दी टिप्पणियाँ कर दी। जाहिर है कि देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई । मगर कुलगुरु दुशासन आसन से डिगे नहीं : इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन्होंने चीरहरण वाली अपनी बात वापस नहीं ली है।  

इस प्रवृत्ति के फलने-फूलने की एक वजह मीडिया पर धन पिशाचों का सम्पूर्ण एकाधिकारी वर्चस्व स्थापित हो जाना है। अखबार सहित मीडिया संस्थानों पर पूंजी का स्वामित्व पहले भी था। मगर यह उनकी तुलना में नया और ताजा है। इस आवारा और सटोरिया पूँजी को विज्ञान और आधुनिक चेतना से संपन्न समाज की जरूरत नहीं है, बल्कि उसका निषेध करना अब उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। कुपढ़, वहशी, हिंसक और टूटा-बिखरा अमानुषिक समाज उसकी आपराधिक कमाई के लिए मुफीद भी होगा, मददगार भी। उस तरह का समाज बनाने के लायक अखबार और मीडिया उसे चाहिए। उन्हें ही तैयार किया जा रहा है।  

    

'उदंत मार्तंड' अंग्रेजी राज के चरमोत्कर्ष के समय उन दिनों की उसकी राजधानी कलकत्ता से निकलता था और दो वर्ष तक – जब तक वह आर्थिक संकट के चलते बंद नहीं हुआ, तब तक – चलता रहा। आज ऐसा नहीं हो सकता। आज असहमत अखबार या प्रकाशन संस्थान का चल पाना असंभव बना दिया गया है। यह रुझान बढ़ता ही जा रहा है। किसी समय जो भारत, 1975-77 के आपातकाल के कोई *18 महीनों* को छोड़कर, दुनिया भर में प्रेस की स्वतन्त्रता के लिए तुलनात्मक रूप से निरापद माना जाता था, आज वह प्रेस स्वतंत्रता रसातल में पहुँच चुकी है। दुनिया के 180 देशों में वह पिछली वर्ष के 150वें स्थान से और नीचे गिरकर 157 पर आ गया है। फौजी तानाशाही वाले पाकिस्तान से भी दो श्रेणी और राजशाही वाले भूटान से सात श्रेणी नीचे पहुँच गया है।

किसी वर्षगाँठ के मौके पर यह कहना अच्छा नहीं लगता, मगर स्वयं को धोखा देना भी अच्छी बात नहीं है, इसलिए यह कहना ही होगा कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस, उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक के दो सौ बरस हैं। अच्छी बात यह है कि कथित मुख्यधारा के प्रकाशनों के कीच-कवलित हो जाने के बाद भी छोटे-छोटे कहे जाने वाले साधन विहीन प्रयत्नों ने लौ जलाए रखी है : " इन जुगनुओं का साथ लेकर राह रोशन कीजिये/ रास्ता सूरज का देखा तो सुबह हो जायेगी।"

.

.

(लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस - बादल सरोज

प्रकाशित: 30 मई 2026 • 11 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
राज्य

मुखौटा हट गया है, अब लड़ाई असली चेहरे से है - मोहम्मद सलीम

सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी असल में आरएसएस के इशारे पर दलाल की भूमिका निभाती आ रही है। दरअसल, इस राज्य से वामपंथी राजनीति के दायरे को सिकोड़ना ही आरएसएस का मुख्य उद्देश्य था। राज्य में आज भले ही तृणमूल कांग्रेस नहीं है, लेकिन वामपंथी आज भी मैदान में हैं और भविष्य में भी रहेंगे।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

हिंदू-मुस्लिम सभी बुलडोजर के शिकार होंगे: मोहम्मद सलीम

"जब आग लगती है, तो वह धर्म नहीं देखती, हिंदू-मुस्लिम का भेद किए बिना सभी के घरों को जलाकर खाक कर देती है। बीजेपी की बुलडोजर राजनीति के खतरे से भी कोई नहीं बचेगा। सभी इसके शिकार होंगे। इसलिए प्रतिरोध की लड़ाई में सभी लोगों को एकजुट होना होगा।"

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

17 जून 2026

राज्य

बुलडोजर नीति के खिलाफ भी लड़ेंगे वामपंथी: मोहम्मद सलीम

हर उस व्यक्ति तक पहुँचना होगा जो मेहनतकश है, सताया हुआ है या प्रताड़ित है। भाजपा ने एसआईआर (SIR) के नाम पर एक बड़े वर्ग के लोगों से उनका मताधिकार छीन लिया है। इन सभी लोगों को एकजुट करना होगा। उनके मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों को वापस लाना होगा। जनता की रोटी-रोजी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पीने के पानी जैसी स्थानीय मांगों को पूरा कराने के लिए संघर्ष करना होगा। भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एकता, भाईचारा और रोजगार के लिए लड़ना होगा। बुलडोजर राज के खिलाफ लाल झंडा पहले ही उठ खड़ा हुआ है। उन्होंने डर का माहौल बढ़ाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि जनता का यह डर टूटे। अन्याय के खिलाफ खड़े होकर हक के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम)पश्चिम बंगाल के सचिव

14 जून 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
अतिथि लेखन

'बदलाव का कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता - गणेश शंकर विद्यार्थी।' अनीश अंकुर की कलम से

हिंदी क्षेत्र के वामपंथी आंदोलन के शलाका पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी के संस्मरणों पर केंद्रित पुस्तक ‘मार्क्सवाद : मेरा संघर्ष पथ’ का हाल ही में प्रकाशन हुआ है। 1 सितंबर को पटना के जमाल रोड स्थित सीपीआई(एम) कार्यालय में पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य अशोक धवले के हाथों लोकार्पण किया जा रहा है। यह पुस्तक गणेश शंकर विद्यार्थी ('गणेश दा') के लगभग आठ दशकों लंबे राजनीतिक और वैचारिक जीवन का दस्तावेज है। एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उन्होंने सामंती व्यवस्था के खिलाफ वर्गीय चेतना को अपनाया और बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीपीआई(एम) के बिहार राज्य सचिव के रूप में उन्होंने कठिन दौर में पार्टी का नेतृत्व किया और भूमि आंदोलनों से गरीबों को जोड़ा। अपने अंतिम समय तक वे मार्क्सवादी अध्ययन, आंदोलन और संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे।

केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

अतिथि लेखन

भोजन और भजन के नाम पर बंगाल की चेतना पर हमला। ~मालिनी भट्टाचार्य~

भोजन की थाली से भजन की हाथताली तक—साझा संस्कृति बचाना ही बंगाल की असली पहचान है !
मालिनी भट्टाचार्य का यह आलेख बंगाली संस्कृति के मुख्य घटकों—खान-पान (भोजन) और पूजा-अर्चना (भजन)—पर हो रहे राजनीतिक व बाजारी हमलों को रेखांकित करता है। इलिश, बकरे और गोमांस पर पाबंदी से लेकर मिड-डे मील में इस्कॉन के प्रवेश तक, यह केवल खान-पान का मुद्दा नहीं बल्कि बंगालियों की बौद्धिक अस्मिता पर प्रहार है। आज कॉर्पोरेट पूंजी और सांप्रदायिक ताकतें मिलकर राज्य की साझा लोक-संस्कृति को बाजारीकरण व अंधविश्वास के ढोंग में धकेल रही हैं। इस खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक नागपाश से बंगाली चेतना को मुक्त कराना आज बेहद ज़रूरी है।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 सितंबर 2026

अतिथि लेखन

रवींद्रनाथ, फासीवाद और लाल पार्टी - मयूख विश्वास

आज 9 मई भी है, वह दिन जब विश्व मानवता को फासीवादी तांडव से मुक्ति मिली थी। इस संदर्भ में बंगाल की फासीवाद-विरोधी परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हमारे रवींद्रनाथ ठाकुर इस विरासत के साथ ओत-प्रोत रूप से जुड़े हुए हैं।

श्रेया जायसवाल • 09 मई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement