वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंराज्य

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

राज्य

पुरुलिया में बुलडोज़र कार्रवाई के ख़िलाफ़ फूटा गुस्सा

केशव कुमार भट्टड़•01 जून 20263 मिनट पठन17 बार पढ़ा गया

      पिछले कुछ दिनों में पुरुलिया शहर के ज़िला कोर्ट और सदर अस्पताल परिसर के आसपास बुलडोज़र चलाकर सैकड़ों दुकानदारों को उजाड़ दिया गया है। इन लोगों को मात्र कुछ घंटों का नोटिस देकर दुकानें ख़ाली करने को कहा गया था। कोई नहीं जानता कि कल उनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा ? बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च कहाँ से आएगा ? और बीमारी में इलाज कैसे होगा?आज भी लोग उस मलबे के बीच खड़े होकर रो रहे हैं और कह रहे हैं कि उनका सब कुछ लुट गया है। ऐसे समय में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) उनके साथ आकर खड़े हुए हैं।

पुरुलिया में बुलडोज़र कार्रवाई के ख़िलाफ़ फूटा गुस्सा

बेदखली के विरोध में लाल झंडा मार्च और ज्ञापन

पुरुलिया में बुलडोज़र कार्रवाई के ख़िलाफ़ फूटा गुस्सा

                पुरुलिया। पश्चिम बंगाल। 1 जून। बुलडोज़र चलाकर बेरोज़गार किए गए लोग सोमवार को चिलचिलाती कड़ी धूप की परवाह किए बिना पुरुलिया शहर की सड़कों पर उतर आए। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के आह्वान पर आयोजित इस रैली और ज्ञापन (डेप्युटेशन) कार्यक्रम में उनके परिवार के सदस्य भी शामिल हुए। कोई नहीं जानता कि कल उनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा ? बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च कहाँ से आएगा ? और बीमारी में इलाज कैसे होगा? यह भी उनकी समझ से बाहर है। हज़ारों लोग इस समय बेहद असहाय स्थिति का सामना कर रहे हैं।

                पिछले कुछ दिनों में पुरुलिया शहर के ज़िला कोर्ट और सदर अस्पताल परिसर के आसपास बुलडोज़र चलाकर सैकड़ों दुकानदारों को उजाड़ दिया गया है। इन लोगों को मात्र कुछ घंटों का नोटिस देकर दुकानें ख़ाली करने को कहा गया था। आज भी लोग उस मलबे के बीच खड़े होकर रो रहे हैं और कह रहे हैं कि उनका सब कुछ लुट गया है। फिर-से बसाने (पुनर्वास) की कोई व्यवस्था किए बिना, 'डबल इंजन' की सरकार ने सत्ता में आने के एक महीने के भीतर ही सैकड़ों लोगों के मुँह का निवाला छीन लिया है। ऐसे समय में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) उनके साथ आकर खड़े हुए हैं।

रोज़गार छिनने से पैदा हुआ आक्रोश

                एक दुकान का मतलब सिर्फ़ एक दुकान नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार की आजीविका का साधन होता है। साथ ही, उस दुकान में काम करने वाले कर्मचारियों का पेट भी उसी से पलता है। ढेरों वादे करके सत्ता में आई इस सरकार ने लोगों के पेट पर लात मारी है। शहर भर में अतिक्रमण हटाने के नाम पर दहशत का माहौल बना दिया गया है। कई पीढ़ियों पुराने व्यापार को 'अवैध क़ब्ज़ा' बताकर इस सरकार के प्रशासन ने बुलडोज़र से ज़मींदोज़ कर दिया।

                सोमवार को बेघर हुए दुकानदारों और उनके परिवारों ने कंधों पर लाल झंडा उठाया और पुरुलिया शहर में भगत सिंह की प्रतिमा के सामने से मार्च शुरू किया। पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद यह रैली पुरुलिया नगर पालिका पर जाकर समाप्त हुई। स्थिति यह थी कि उस दिन पुरुलिया नगर पालिका पूरी तरह घिर गई थी। सब कुछ खो चुके इन लोगों को अब समझ आ रहा है कि इस लाल झंडे के अलावा उनका साथ देने वाला कोई और नहीं है।

पुनर्वास की माँग और प्रशासन का आश्वासन

                बेदख़ली से पहले पुनर्वास की माँग को लेकर पुरुलिया नगर पालिका के प्रशासक और उप-विभागीय शासक (सदर) को एक ज्ञापन सौंपा गया। इस कार्यक्रम में बिमलेंदु कोनार, कृष्णपद विश्वास, सुशांत महतो, सायंतन घोष और शमशेर अली सहित विस्थापित दुकानदारों के 5 प्रतिनिधि शामिल हुए।

                नगर पालिका के बाहर सरकार की इस तानाशाही और बुलडोज़र नीति की तीखी आलोचना करते हुए सीपीआई (एम) के ज़िला सचिव प्रदीप रॉय, सीआईटीयू के ज़िला सचिव हाराधन बनर्जी के अलावा कृष्णपद विश्वास, निखिल मुखर्जी, बिनय रजक, सुप्रिया सेन और परिमल कुमार ने भाषण दिए। कई पीड़ित दुकानदारों ने भी अपनी आपबीती सुनाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता बिमलेंदु कोनार ने की।

                प्रशासन का पक्ष: अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) ने बताया कि पुनर्वास के लिए जगहों की छंटनी/चुनाव का काम चल रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि कुछ ही दिनों में पुनर्वास की व्यवस्था कर दी जाएगी।

                लेकिन सवाल अब भी वही है कि तब तक इन लोगों के पेट में दाना कहाँ से जाएगा, यह कोई नहीं समझ पा रहा है। इस घटना को लेकर पूरे शहर में भारी आक्रोश है।

.

.

गणशक्ति ऑन लाइन । 01 जून 2026

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

पुरुलिया में बुलडोज़र कार्रवाई के ख़िलाफ़ फूटा गुस्सा

प्रकाशित: 01 जून 2026 • 3 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
विश्लेषण

भारत के बारे में लेनिन ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - लेखक बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बॉम्बे के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

कुछ मिनट पहले

राष्ट्रीय

'ज्ञानेश' हटाओ, 'एसआईआर' रोको ~ एम ए बेबी

"वोट के अधिकार पर हमला बंद करो, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बहाल करो!" मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालों और मतदाता सूचियों से नाम छांटने की मनमानी के बीच देश में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' के सनसनीखेज खुलासे के बाद सीपीआई (एम) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

11 अक्टूबर 2026

विश्लेषण

क्या अपनी ही जनता से भयभीत है हुकूमत ?

10 अक्टूबर की सुबह सड़कों का मंजर लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक सीलबंद सैन्य क्षेत्र की गवाही दे रहा था। जब एक सरकार अपने ही नागरिकों को रोकने और घेरने के लिए इतने व्यापक स्तर पर युद्ध जैसी तैयारियाँ करती है, तो स्वयं से यह सवाल पूछना ही होगा - आखिर सरकार किस चीज को दबाने और रोकने की कोशिश कर रही है?

10 अक्टूबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
राज्य

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक आकाश आज दो ध्रुवों — टीएमसी और भाजपा — के बीच आपसी वोट लाभ के लिए कुटिल योजना से फँसा दिया गया है। SIR , दबंगता, झूठ और पैसे के दम पर लोकतंत्र के अपहरण की पूरी तैयारी है। एक तरफ है राज्य सत्ता की मशीनरी, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की संस्कृति। दूसरी तरफ है केंद्र का SIR अटैक, सांप्रदायिक विभाजन, संस्थाओं पर नियंत्रण और विकास के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति। दोनों ही दल पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल पर टिके हुए हैं, जो आर्थिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरण की उपेक्षा करते हैं और केवल मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। इन नीतियों के कारण किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाओं सहित आम नागरिकों की आवाज दब रही है, उनकी चिंताएं उपेक्षित हो रही हैं और उनके हितों को नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन लेफ्ट फ्रंट न तो केवल टीएमसी का विकल्प है और न ही केवल भाजपा का। यह उससे कहीं ज्यादा हैं। लेफ्ट फ्रंट एक स्वतंत्र वैचारिक शक्ति है जो न सत्ता की लूट को बढ़ावा देती है और न ही धर्म के नाम पर समाज को बाँटती है। टीएमसी और भाजपा के भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिक कोलाहल से पूरी तरह अलग, लेफ्ट फ्रंट तीसरा रास्ता प्रस्तुत कर रहा है — लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक प्रगतिशील भविष्य का रास्ता, जिसका नाम है “लेफ्ट फॉर फ्यूचर”।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अप्रैल 2026

राज्य

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

सोशल मीडिया पर समाज के सभी वर्गों के लोग भाजपा सरकार के इस दिशा-निर्देश को लेकर गुस्सा जताने लगे हैं। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सिंडिकेट को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' नीति के साथ काम शुरू करने का वादा करने वाली सरकार अचानक कर्मचारियों के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई है?

श्रेया जायसवाल • 22 मई 2026

राज्य

राष्ट्र तुम किसके हो ? - शमीक लाहिड़ी

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।

श्रेया जायसवाल • 19 अप्रैल 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement