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फुटबॉल का कोई देश नहीं होता - शमीक लाहिड़ी

श्रेया जायसवाल•12 जून 20264 मिनट पठन11 बार पढ़ा गया

यह केवल एक खेल नहीं है, बल्कि इंसानी सामूहिक भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिंब है। इसलिए मैदान के बाहर की इस कठिन लड़ाई में—पूंजी के फुटबॉल के खिलाफ इंसानी फुटबॉल की जीत होनी ही चाहिए। क्योंकि, गेंद का असली मालिक कोई बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन या अरबपति नहीं है; गेंद का असली मालिक वह बच्चा है, जो आज भी धूल-भरी गलियों में नंगे पैर पहली किक मारता है। सपनों की कीमत किसी मुद्रा में नहीं मापी जा सकती, और फुटबॉल का असली पता आज भी लोगों के दिलों में ही है।

शमीक लाहिड़ी

[लेखक सी पी आई (एम)के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।]

फुटबॉल का कोई देश नहीं होता - शमीक लाहिड़ी

फुटबॉल का कोई देश नहीं होता

शमीक लाहिड़ी

फुटबॉल का जन्म किसी महल या कॉर्पोरेट बोर्डरूम में नहीं हुआ; इसका जन्म धूल भरे मैदानों और श्रमिक बस्तियों में हुआ था। ब्राजील के 'फावेला' (झुग्गी-झोपड़ियां), अर्जेंटीना की बस्तियां या अफ्रीका के सुदूर गाँव—फुटबॉल गरीब लोगों के सपने देखने की भाषा है। माराडोना, पेले, यूसेबियो या सादियो माने जैसे दिग्गजों की कहानियाँ साबित करती हैं कि यह खेल निचले तबके के लोगों के लिए सामाजिक उत्थान की सीढ़ी था। खेलने के लिए किसी महँगे उपकरण की जरूरत नहीं थी—एक पुरानी गेंद या कपड़ों का गोला ही काफी था। इसीलिए फुटबॉल 'द ब्यूटीफुल गेम' यानी 'गरीबों का खेल' है।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के वैश्वीकृत पूँजीवाद ने इस खूबसूरत खेल को पूरी तरह बदल दिया है। फुटबॉल अब सैकड़ों अरब डॉलर का एक मनोरंजन उद्योग बन चुका है। जो क्लब कभी रेलवे कर्मचारियों, कोयला खदान के मजदूरों या स्थानीय समुदायों के हाथों विकसित हुए थे—जैसे मैनचेस्टर यूनाइटेड, आर्सेनल, पीएसवी आइंडहोवन, शाल्के 04 आदि—उन सभी के मालिक आज अमेरिकी हेज फंड, रूसी ओलिगार्स (कुलीन वर्ग) या मध्य पूर्व के तेल समृद्ध शाही परिवार हैं। क्लब अब सिर्फ एक टीम नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और 'स्पोर्ट्सवॉशिंग' का हथियार बन गए हैं।

पैसों के दम पर आज ट्रॉफियाँ खरीदी जा रही हैं। नेमार और बेलिंघम जैसे खिलाड़ियों की आसमान छूती ट्रांसफर फीस और लाखों यूरो का साप्ताहिक वेतन आज 'न्यू नॉर्मल' (नया सामान्य) बन चुका है। इसके परिणामस्वरूप, मध्यम और छोटे क्लब भले ही प्रतिभाएँ तराशते हैं, लेकिन बड़े क्लब पैसे के जोर पर उन्हें छीन लेते हैं। ऐसा लगता है मानो गरीबों की खून-पसीने की फसल को बड़े कॉर्पोरेट्स लूट रहे हों।

सबसे बड़ा आघात गैलरी (दर्शकों स्टैंड) पर हुआ है। जो मजदूर, छात्र, रिक्शा चालक या किसान हफ्ते भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद शनिवार की दोपहर गैलरी में खड़े होकर अपनी टीम का हौसला बढ़ाते थे, टिकटों की आसमान छूती कीमतों के कारण वे आज मैदान से बाहर हो चुके हैं। पारंपरिक स्टैंडों को तोड़कर आलीशान कॉर्पोरेट बॉक्स बनाए जा रहे हैं। मैच देखने के लिए अब कई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का सब्सक्रिप्शन शुल्क चुकाना पड़ता है। यहाँ तक कि बच्चों का किसी नामी अकादमी में फुटबॉलर बनने का सपना भी आज पूरी तरह से पैसे और वर्ग (क्लास) पर निर्भर हो गया है।

साल 2021 में 'यूरोपियन सुपर लीग' बनाने की साजिश ने यह दिखा दिया था कि फुटबॉल की ताकत अब मैदान पर नहीं, बल्कि बंद कॉर्पोरेट बोर्डरूम में कैद है।

इसके बावजूद, फुटबॉल आज भी खूबसूरत है। आज भी समाज के सभी वर्गों के लोग जाति, धर्म, भाषा, त्वचा के रंग, देश और महाद्वीप के भेदों को भुलाकर, एक गोल के जश्न में अनजान होने पर भी एक-दूसरे को गले लगा लेते हैं। अफ्रीका का बच्चा ब्राजील की जर्सी पहनकर नाचता है, तो भारत के कस्बों में अर्जेंटीना का झंडा लहराता है। 700 करोड़ लोगों को एक ही धागे में पिरोने की यह अलौकिक क्षमता सिर्फ फुटबॉल में है, और किसी चीज में नहीं।

यह केवल एक खेल नहीं है, बल्कि इंसानी सामूहिक भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिंब है। इसलिए मैदान के बाहर की इस कठिन लड़ाई में—पूंजी के फुटबॉल के खिलाफ इंसानी फुटबॉल की जीत होनी ही चाहिए। क्योंकि, गेंद का असली मालिक कोई बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन या अरबपति नहीं है; गेंद का असली मालिक वह बच्चा है, जो आज भी धूल-भरी गलियों में नंगे पैर पहली किक मारता है। सपनों की कीमत किसी मुद्रा में नहीं मापी जा सकती, और फुटबॉल का असली पता आज भी लोगों के दिलों में ही है।

इसीलिए तो करोड़ों लोगों की नजरें इस वक्त टीवी स्क्रीन पर टिकी हुई हैं। यकीनन आपकी भी होंगी। फिलहाल, अगले 39 दिनों तक 110x120 गज के मैदान पर सपने टूटने और बनने की कई तस्वीरें उकेरी जाएंगी। आइए आनंद लें, 'द मोस्ट ब्यूटीफुल गेम ऑफ द वर्ल्ड - फुटबॉल'।

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[लेखक सी पी आई (एम)के पूर्व सांसद और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।]

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प्रकाशित: 12 जून 2026 • 4 मिनट पठन

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