वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | Tuesday, 13 October 2026
|
संपर्क: vaamkiaawaz@gmail.comसदस्यता में
वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ,न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !
लाइव कवरेज
होमताज़ा खबरेंब्लॉग

वाम की आवाज़

जन समाचार मंच

ब्लॉग

जुमलों का रिकॉर्ड

राजीव कुमार पाण्डेय•12 जून 20264 मिनट पठन10 बार पढ़ा गया

जब शीर्ष पर पहुंचने का कोई रास्ता नहीं बचता, तो पहले से ही उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को छल से नीचे गिराना ही पड़ता है।

जुमलों का रिकॉर्ड

आरएसएस के विचारक राम माधव ने कुछ दिन पहले एक लेख में कहा था कि 4398 दिनों के बाद 10 जून को मोदी के प्रधानमंत्री पद के 4399 दिन पूरे हो जाएंगे। तब से, भाजपा, केंद्र सरकार और यहां तक कि राज्यों की दो इंजन वाली सरकारें भी इस दिन को भव्य तरीके से मनाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं और अभियान चला रही हैं। भारतीय परंपरा (और अन्य जगहों पर भी) में रजत जयंती, स्वर्ण जयंती, हीरक जयंती, प्लैटिनम जयंती, शताब्दी आदि जैसे महत्वपूर्ण अवसरों को आमतौर पर उत्सव के लिए चुना जाता है। इसके अलावा, 100 दिन, 1000 दिन, एक वर्ष, दो वर्ष, पांच वर्ष, दस वर्ष जैसे अवसर भी चुने जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि मोदी सरकार या उनके प्रधानमंत्री पद के दौरान भव्य उत्सव के लिए इनमें से किसी को भी नहीं चुना गया। 4399 दिनों को ही चुना गया। क्यों?

मोदी ने पांच, दस या बारह वर्ष पूरे होने का उत्सव इसलिए नहीं चुना क्योंकि उसमें संकीर्ण राजनीति की गुंजाइश बहुत कम होती है। साथ ही, अपनी बात मनवाने के लिए भी पर्याप्त सामग्री नहीं होती। मोदी युग में देश के समग्र विकास, संविधान द्वारा निर्धारित पथ पर प्रगति, लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के विस्तार, धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के आधार पर मानवाधिकारों की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका में समान अवसर, आर्थिक और सामाजिक असमानता में कमी आदि के मामले में गर्व करने लायक कुछ भी नहीं है। शासन प्रणाली में संस्थागत लोकतंत्र के विकास, संघीय ढांचे को सुदृढ़ करने, विविधता में एकता की भावना आदि के बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में, झूठे आधार पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए भारत को किसी भी तरह से आकाश में चमकते जवाहरलाल नेहरू को धूमिल करना होगा। इसलिए, नंदा घोष जैसे लोग नेहरू को पीछे छोड़ने की मूर्खतापूर्ण इच्छा से उन्हें निशाना बना रहे हैं। यानी, जब शीर्ष पर पहुंचने का कोई रास्ता नहीं बचता, तो पहले से ही उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को छल से नीचे गिराना ही पड़ता है। इसी उद्देश्य से कई गणनाएँ की गई हैं और 4399 लोगों को पकड़ा गया है।

नेहरू 1952 में देश का पहला चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने। उन्होंने अगले दो चुनाव भी जीते। वे तीन कार्यकालों में कुल 4398 दिनों तक प्रधानमंत्री रहे। मोदी ने 10 जून को यह आंकड़ा पार कर लिया। इसलिए, नेहरू मोदी से पीछे रह गए हैं। मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले व्यक्ति हैं। लेकिन देश की आजादी के बाद, 15 अगस्त 1947 से लेकर 1952 में निर्वाचित सरकार के गठन तक, नेहरू पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे। उस समय, मोदी के प्रिय नेता वल्लभभाई पटेल और हिंदू महासभा के संस्थापक, वर्तमान भाजपा के पूर्वज श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नेहरू के मंत्रिमंडल में मंत्री थे। मोदी को सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले व्यक्ति के रूप में दिखाने के लिए, नेहरू के पहले पांच वर्षों के कार्यकाल को गणना से बाहर रखा गया है। यह कहा जा रहा है कि वह निर्वाचित सरकार नहीं थी। यह बेतुका तर्क है कि अगर चुनाव नहीं होंगे, तो प्रधानमंत्री की गणना ही नहीं की जाएगी। आजादी के बाद किसी भी देश की पहली सरकार चुनाव के जरिए नहीं बनती। अगर हमें मोदी सरकार की बात माननी हो, तो स्वतंत्र भारत के पहले पांच साल इतिहास से मिटाने पड़ेंगे और उस दौरान देश में हुए सभी सरकारी कामों को अवैध घोषित करना पड़ेगा। दूसरी ओर, नेहरू तीन बार पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने। लेकिन मोदी तीसरी बार जनता के पूर्ण समर्थन से प्रधानमंत्री नहीं बने। ऐसा अन्य दो दलों के समर्थन से हुआ। अगर चुनाव जीतकर सत्ता में आना होता, तो मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा 2024 के चुनावों में हार जाती। इसलिए सवाल यह नहीं है कि वह कितने समय तक सत्ता में रहेगी। असली मुद्दा है देश का निर्माण, जनता का विकास और पूरे देश का समग्र विकास। इस क्षेत्र में मोदी सरकार को कोई सफलता नहीं मिली है। हालांकि, अडानी-अंबानी समेत बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों में मोदी की सफलता बेमिसाल है। उन्होंने देश में आय और धन की असीमित असमानता को बढ़ाने में भी सफलता हासिल की है। उन्होंने बेरोजगारी बढ़ाने में सफलता पाई है। उन्होंने संविधान को निरर्थक बनाने की हद तक पहुंचा दिया है। वह नफरत और घृणा से विभाजित समाज बनाने में सफल रहा है।

साभार:- गणशक्ति

क्या यह लेख उपयोगी था?

टिप्पणियाँ

0

अपनी राय साझा करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...

जुमलों का रिकॉर्ड

प्रकाशित: 12 जून 2026 • 4 मिनट पठन

वाम की आवाज़|जन समाचार मंच
विज्ञापन

शेयर करें

सबसे ज्यादा पढ़ी गईं

1

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

361 क्लिक

2

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

358 क्लिक

3

'उत्तम कुमार': एक नक्षत्र का अस्त हो जाना ~ 'सत्यजीत राय'

338 क्लिक

4

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

333 क्लिक

5

नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

330 क्लिक

विज्ञापन

संसाधन

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचार - संकलनकर्ता श्रेया जायसवाल (PDF)

'तुम्हारी क्षय' - राहुल सांकृत्यायन (PDF)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (Link)

वियतनाम: संघर्ष की एक ओजस्वी प्रेरणा - बुद्धदेव भट्टाचार्य (PDF)

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल की वेब साइट (बांग्ला) (Link)

भाजपा क्यों है जनता की दुश्मन ? (PDF)

द लेफ्ट व्यूज - द पीपल्स लेंस (अंग्रेजी) (Link)

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा (PDF)

पुरानी फिल्मों में होता था संदेश - सीताराम येचुरी (Link)

मैं नास्तिक क्यों हूँ ? - शहीद-ए-आजम भगतसिंह (PDF)

वाममोर्चा घोषणापत्र। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव-2026 (PDF)

मार्क्सवादी पथ पत्रिका (बांग्ला) (Link)

अभियान कैलेंडर

कोई आगामी ईवेंट नहीं

जुड़े रहने के लिए

रोज़ शाम 7 बजे प्रमुख खबरें सीधे आपके ईमेल पर।

सदस्यता लें
इस लेखक से और
सभी देखें →
साहित्य-संस्कृति

प्रश्नोपनिषद - 2: हूबनाथ

प्रश्न करना /

राजद्रोह /

आंदोलन करना /

देशद्रोह /

हक़ मांगना /

राष्ट्रद्रोह /

बना दिया ।

इन सबके बावजूद /

लोग डर नहीं रहे /

छोटे-छोटे बच्चे /

खिलाफत को /

उतारू हैं ।

16 सितंबर 2026

राज्य

गड़वेता-शालबनी के 7 पार्टी दफ्तरों में बीजेपी का उपद्रव, लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई

मंगलवार दोपहर गड़वेता के अमलागोड़ा तिराहे पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने हथौड़े से लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। उससे पहले शनिवार रात शालबनी में हमला हुआ था। शालबनी बाजार के पास सीपीआई(एम) का पुराना कार्यालय 'तुलसी भवन' है। सोमवार आधी रात को सबल और बड़े सीमेंट के खंभों से गेट तोड़कर बीजेपी कार्यकर्ता अंदर घुसे। उन्होंने टीवी, कंप्यूटर, रसोई गैस, पंखे समेत अन्य सामान लूट लिया। इसके बाद तोड़फोड़ करके आग लगा दी।

16 सितंबर 2026

साहित्य-संस्कृति

माफीनामा: हूबनाथ

हम तो /

नारी शक्ति के समक्ष /

नतमस्तक हैं ।

हम सभी /

एक स्त्री से ही तो /

जनमे हैं ।

उसी के संरक्षण में /

हमारा स्वर्णिम /

बालपन बीता है ।

12 सितंबर 2026

और पढ़ें
सभी देखें →
ब्लॉग

‘अपने घेरे से बाहर: विचारों की रचनात्मक दुनिया के साथ’ - मोहम्मद सलीम

गीता या ग्रंथ साहिब नहीं, फांसी से ठीक पहले वे (भगत सिंह) लेनिन को पढ़ रहे थे। तो क्या भगत सिंह की देशभक्ति में कोई कमी थी? इतिहासकार बिपन चंद्र लिखते हैं कि विरोध में बॉम्बे के सभी सूती मिलों और रेल श्रमिकों की पूर्ण हड़ताल से शहर थम गया। सेना बुलाई गई। सड़कों पर 16 श्रमिक शहीद हुए और 50 घायल हुए। भारत में श्रमिकों की हड़ताल देखकर 'इन्फ्लेमेबल मटेरियल इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स' लेख में व्लादिमीर लेनिन ने लिखा: 'इस बीच भारत में भी सर्वहारा जनता जागरूक राजनीतिक जनसंघर्ष खड़ा कर रही है। और इसके परिणामस्वरूप भारत में रूसी शैली के ब्रिटिश शासन की स्थिति भी दयनीय हो गई है।'

मोहम्मद सलीम • 25 अप्रैल 2026

ब्लॉग

नीट महाघोटाला: क्या 'सस्ते' चरित्र और 'महंगे' पँचों की बलि चढ़ेगा देश का भविष्य? - केशव भट्टड़

नीट महाघोटाला: 'डार्लिंग' से 'डेथ' तक का मंजर

"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए,तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।

आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

ब्लॉग

अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

वाम की आवाज़ लोगो
वाम की आवाज़

अगर थक गए हो चुप रहकर सहने से, रगों में खून उबल रहा है अन्याय के खिलाफ, न्याय, समानता और प्रगति में हैं विश्वास तो — उठो ! बोलो ! बदलो !

मुख्य पन्ने
जानकारी
हमारे बारे में
संपादकीय नीति
सुधार नीति
गोपनीयता नीति
संपर्क करें
आर्काइव
अभियान कैलेंडर आर्काइव
© 2026 वाम की आवाज़ — जन संघर्ष का डिजिटल पुरालेखMade for the Movement