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योग कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है: कलकत्ता उच्च न्यायालय

राजीव कुमार पाण्डेय•19 जून 20262 मिनट पठन28 बार पढ़ा गया

आज अंतिम फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने आदेश दिया है कि सरकारी कर्मचारियों पर योग में भाग लेने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता।

योग कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है: कलकत्ता उच्च न्यायालय

रेड रोड पर आयोजित योग दिवस कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी अनिवार्य नहीं है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को यह बात कही। राज्य सरकार द्वारा ऐसा निर्देश जारी किया था कि सरकारी कर्मचारियों को योग दिवस कार्यक्रम में शामिल होना अनिवार्य है। राज्य समन्वय समिति ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया था। आज मुकदमा जीतने के बाद संगठन ने कहा, 'आज अंतिम फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने आदेश दिया है कि सरकारी कर्मचारियों पर योग में भाग लेने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता। यदि कोई कर्मचारी भाग नहीं लेना चाहता है, तो प्रशासन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता।'

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा, 'रविवार को रेड रोड पर आयोजित योग कार्यक्रम के लिए रेड रोड को सात दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी सरकारी कर्मचारियों, यहां तक कि संविदा कर्मचारियों को भी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कहा गया है। सरकार ने इसके लिए निर्देश भी जारी किए थे। ऐसा आदेश संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके बाद न्यायालय में मुकदमा दायर किया गया। यह मुकदमा राज्य समन्वय समिति ने दायर किया था। कल सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने कहा कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि कार्यक्रम में भाग लेना अनिवार्य है।' अदालत के आदेशानुसार सरकार ने लिखित रूप में कहा है कि उपस्थिति अनिवार्य नहीं है और यदि कोई व्यक्ति कार्यक्रम में उपस्थित नहीं होता है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

साभार:- गणशक्ति

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योग कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है: कलकत्ता उच्च न्यायालय

प्रकाशित: 19 जून 2026 • 2 मिनट पठन

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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