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मुखौटे के पीछे सारहीन बजट- मोस्ताफिजुर रहमान

राजीव कुमार पाण्डेय•23 जून 20264 मिनट पठन25 बार पढ़ा गया

अल्पसंख्यक विकास विभाग और मदरसा शिक्षा के लिए वर्ष 2025 में 5713 करोड़ रुपये का बजट था। इस बार के बजट में यह आवंटन 2165 करोड़ रुपये है। एक झटके में बजट को 3548 करोड़ रुपये कम कर दिया गया! प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं, "सबका साथ, सबका विकास"। आज के बजट में उस बात की झलक कहाँ है?

मुखौटे के पीछे सारहीन बजट- मोस्ताफिजुर रहमान

भाजपा सरकार के पहले ही बजट में अल्पसंख्यक विकास विभाग और मदरसा शिक्षा के बजट में भारी कटौती किए जाने पर सीपीआई(एम) विधायक मोस्ताफ़िज़ुर रहमान ने गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। सोमवार को विधानसभा में बजट पेश होने के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वित्त मंत्री ने लोकलुभावन मुखौटे के पीछे एक खोखला बजट पेश किया है। अल्पसंख्यक विकास विभाग और मदरसा शिक्षा के लिए वर्ष 2025 में 5713 करोड़ रुपये का बजट था। इस बार के बजट में यह आवंटन 2165 करोड़ रुपये है। एक झटके में बजट को 3548 करोड़ रुपये कम कर दिया गया! प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं, "सबका साथ, सबका विकास"। आज के बजट में उस बात की झलक कहाँ है?

बजट के संदर्भ में मोस्ताफ़िज़ुर रहमान ने आगे कहा कि नगर पालिकाओं के विकास के लिए बजट में किसी प्रभावी कदम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। नदी कटाव रोकने के लिए जो राशि आवंटित की गई है, वह बहुत ही मामूली है। दुनिया भर में इस समय सबसे चर्चित विषय पर्यावरण है, लेकिन पर्यावरण की रक्षा के क्षेत्र में सरकार का वित्तीय आवंटन समय की मांग की तुलना में बेहद नगण्य है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बजट में कहीं भी राज्य की आय बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम दिखाई नहीं दे रहा है। लोकलुभावन मुखौटे के पीछे एक सारहीन बजट पेश किया गया है।

मोस्ताफ़िज़ुर रहमान ने कहा कि पिछले पंद्रह वर्षों से तृणमूल-कांग्रेस ने राज्य को कर्ज पर निर्भर बना दिया है। इस बजट में वर्तमान वित्त मंत्री राज्य को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कोई राह नहीं दिखा पाए हैं। पिछले पंद्रह वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमने जो बर्बादी देखी है, उससे बाहर निकालने जैसा कोई कदम, नए स्कूल खोलने या बंद पड़े स्कूलों को दोबारा खोलने की बात बजट में नहीं कही गई है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटन पिछली बार की तुलना में उल्लेखनीय रूप से नहीं बढ़ा है। राज्य में हॉकरों को हटाया जा रहा है, लेकिन बजट में उनके पुनर्वास के बारे में कोई बात नहीं की गई है। प्रवासी श्रमिकों को लेकर बजट में कई बातें कहे जाने के बावजूद, वे जब राज्य में वापस आएंगे तो उन्हें रोजगार कहाँ मिलेगा, इसका कोई जिक्र नहीं है। इलाज के लिए आयुष्मान कार्ड की बात कही गई है, लेकिन वापस आने पर काम के अवसर कहाँ मिलेंगे, यह नहीं बताया गया। शिक्षा के क्षेत्र में कई मामले (केस) चल रहे हैं, टेट (TET) परीक्षार्थियों के मामले चल रहे हैं, उनका कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए आज के बजट को उद्योग और रोजगारोन्मुखी बजट नहीं कहा जा सकता। औद्योगिकीकरण को लेकर कोई रोडमैप नहीं है। कुछ भत्तों की बात कही गई है और केंद्र सरकार की योजनाओं को लागू करने की बात की गई है। इसके अलावा पीपीपी (PPP) मॉडल की तरफ झुकाव देखा जा रहा है। आशंका है कि शिक्षा और स्वास्थ्य, दोनों ही क्षेत्रों में ऐसा होगा। बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के मामले में निजी पूंजी पर निर्भरता दिखाई दे रही है।

इस दिन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने संवाददाता सम्मेलन में वाम मोर्चा सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा, "34 वर्षों में उन्होंने ताला लगाने के अलावा कुछ नहीं किया।" लेकिन आंकड़े भी यह साफ कर रहे हैं कि तृणमूल-कांग्रेस सरकार की तरह ही भाजपा सरकार भी अपने पहले बजट में उद्योग और रोजगार के मामले में कोई उम्मीद नहीं जगा पाई। एनएसएसओ (NSSO) के आंकड़े बताते हैं कि 2004 से 2011 के बीच जब बंगाल अकेले विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) उद्योग में 24 लाख रोजगार के अवसर पैदा करने में सफल रहा था, तब देश में पश्चिम बंगाल इस मामले में पहले स्थान पर था। उस समय खुद नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात काफी पीछे दूसरे स्थान पर था। वह राज्य उस अवधि के दौरान विनिर्माण उद्योग में 14 लाख 90 हजार रोजगार पैदा कर पाया था। इसके बाद तमिलनाडु, पंजाब, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्य थे, जहाँ यह संख्या 4 से 6 लाख के बीच थी। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार, 2004 से 2011 के बीच पूरे देश में विनिर्माण उद्योग में 58 लाख 70 हजार लोगों को रोजगार मिला। इसका 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले पश्चिम बंगाल में था।

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साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति


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प्रकाशित: 23 जून 2026 • 4 मिनट पठन

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