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वंचित चाय श्रमिक, बजट भाषण से उत्तर बंगाल के प्रवासी भी निराश

राजीव कुमार पाण्डेय•23 जून 20264 मिनट पठन22 बार पढ़ा गया

बजट के बाद चाय बागान श्रमिकों के नेता विकास महाली ने सवाल उठाया है कि उत्तर बंगाल के तीन लाख से अधिक चाय श्रमिकों की मजदूरी, बकाया पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी की मांग को क्यों नजरअंदाज कर दिया गया?

वंचित चाय श्रमिक, बजट भाषण से उत्तर बंगाल के प्रवासी भी निराश

उत्तर बंगाल से भाजपा सरकार के 10 मंत्री और एक स्पीकर हैं। चाय बागान बहुल 10 विधानसभा क्षेत्रों में भी अब भाजपा के ही विधायक हैं। इसके बावजूद, भाजपा के पहले बजट में वित्त मंत्री के 90 मिनट के बजट भाषण में उत्तर बंगाल के 3 लाख से अधिक चाय श्रमिकों के लिए अदालत द्वारा निर्देशित न्यूनतम मजदूरी की कोई घोषणा नहीं की गई!

चाय बागान के संदर्भ में केवल दो बोर्ड बनाने का वादा सुना गया! बंद चाय बागानों को खोलने के लिए श्रम मंत्री अर्जुन सिंह ने 16 जून को इंडियन टी एसोसिएशन, टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया, इंडियन प्लांटर्स एसोसिएशन और दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की है। संगठनों ने चाय की न्यूनतम कीमत तय करने की मांग की है।

बजट के बाद चाय बागान श्रमिकों के नेता विकास महाली ने सवाल उठाया है कि उत्तर बंगाल के तीन लाख से अधिक चाय श्रमिकों की मजदूरी, बकाया पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी की मांग को क्यों नजरअंदाज कर दिया गया?

अदालत के आदेश के बावजूद मालिकों ने श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं दी है। अभी प्रतिदिन केवल 250 रुपये मजदूरी मिलती है।

मंत्री की पहली बैठक में श्रमिकों की मजदूरी और बकाया पीएफ, ग्रेच्युटी का मुद्दा क्यों नहीं उठा? भाजपा ने चुनाव से पहले श्रमिकों की मजदूरी 500 रुपये करने का वादा किया था। क्या वित्त मंत्री उसे ही भूल गए?

मुख्यमंत्री ने जिम्मेदारी संभालने के बाद उत्तर बंगाल का दौरा तो किया, लेकिन बंद बागानों को खोलने, चाय श्रमिकों की मजदूरी, पीएफ और ग्रेच्युटी को लेकर अपना मुंह नहीं खोला। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने टिप्पणी की थी कि राज्य सरकार 'असम मॉडल' के जरिए इस राज्य के चाय श्रमिकों की उन्नति करना चाहती है। सरकार चाय बागानों की नई पीढ़ी के लिए आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, आधुनिक विज्ञान अनुसंधान और स्मार्ट क्लासरूम बनाना चाहती है। और साथ ही स्वास्थ्य बीमा 'आयुष्मान भारत' देना चाहती है। बात यह थी कि बजट से पहले विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल असम के बागानों का दौरा कर रिपोर्ट सौंपेगा। राज्य सरकार का यह 'असम मॉडल' वास्तव में क्या है?

भाजपा विधायकों का कहना है कि इसके दो भाग हैं—एक सीधे तौर पर श्रमिक कल्याण और दूसरा चाय उद्योग आधारित विकास। केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2021-22 में राज्य के चाय श्रमिकों के लिए 312 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। भाजपा सांसदों ने आरोप लगाया है कि तृणमूल-कांग्रेस ने उस पैसे को लागू नहीं होने दिया। पहले कहा गया था कि इस आवंटन को 2025-26 के भीतर खर्च करना होगा, बाद में इसकी समयसीमा बढ़ाकर 2026-27 कर दी गई।

बजट के बाद ही यह सवाल उठने लगा है कि चाय बागान श्रमिकों को अंधेरे में धकेल कर क्या उत्तर बंगाल की प्रगति वाकई संभव है?

उत्तर बंगाल के लाखों प्रवासी श्रमिकों (माइग्रेंट वर्कर्स) के लिए भी इस बजट में कोई उम्मीद की किरण नहीं थी। सिर्फ इतना कहा गया है कि प्रवासी श्रमिकों के लिए 'एक देश, एक राशन' की व्यवस्था होगी और उनके लिए आयुष्मान भारत कार्ड की सुविधा रहेगी। यह बजट प्रवासियों का बजट नहीं बन सका।

वित्त मंत्री ने राजबंशी भाषा अकादमी के लिए आवंटन की घोषणा तो की, लेकिन चांगराबंधा विकास बोर्ड सहित उत्तर बंगाल के कई बोर्डों के लिए कोई आवंटन नहीं रखा। तीस्ता नदी सहित कई नदियों के कटाव को रोकने के लिए बजट में नाममात्र का भी आवंटन नहीं है। पूरे बजट में तीस्ता नदी की गहराई बढ़ाने के लिए ड्रेजिंग (गाद निकालने) का भी कोई जिक्र नहीं है।

तृणमूल-कांग्रेस सरकार अब तक उत्तर बंगाल को केवल एक 'कंज्यूमर मार्केट' (उपभोक्ता बाजार) के रूप में देखती आई है। भाजपा के पहले बजट भाषण में भी उत्तर बंगाल को 'प्रोडक्शन हब' (उत्पादन केंद्र) में बदलने की कोई दिशा नहीं दिखी। बजट में उत्तर बंगाल के टी (चाय), टिम्बर (लकड़ी) और टूरिज्म (पर्यटन) को लेकर कोई उल्लेखनीय दिशा-निर्देश नहीं था। उत्तर बंगाल के कृषि संसाधनों पर आधारित एक विशिष्ट कृषि-औद्योगिक कॉरिडोर बनाने की कोई योजना इस बजट में नहीं है।

मालदा के आम को लेकर प्रोसेसिंग (प्रसंस्करण) का प्रस्ताव तो है, लेकिन जलपाईगुड़ी के अनानास या कूचबिहार के टमाटर और मक्के को लेकर वित्त मंत्री पूरी तरह मौन रहे। उत्तर बंगाल में 'हॉस्पिटैलिटी एंड टूरिज्म मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी' या 'वन संसाधन एवं वन्यजीव प्रबंधन संस्थान' और मैदानी इलाकों में 'कृषि एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र' स्थापित करने का कोई विचार राज्य बजट में नहीं है।

बजट में उत्तर बंगाल में दो और मेडिकल कॉलेजों की घोषणा तो की गई है, लेकिन पुराने मेडिकल कॉलेजों को पूर्ण रूप से विकसित करने के लिए किसी आवंटन का उल्लेख नहीं है। उत्तर बंगाल की नदियों में बाढ़ नियंत्रण का कोई जिक्र न होना भी काफी चिंताजनक है।

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साभार: डिजिटल गणशक्ति

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प्रकाशित: 23 जून 2026 • 4 मिनट पठन

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