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जनसुरक्षा या आतंक का शासन: शमीक लाहिड़ी

राजीव कुमार पाण्डेय•01 जुलाई 20265 मिनट पठन21 बार पढ़ा गया

सरकार का तर्क है कि 'समाज-विरोधी गतिविधियों और आदतन अपराधियों' से निपटने के लिए यह कानून बेहद जरूरी है। लेकिन विधेयक के मसौदे को पढ़ने पर साफ होता है कि इसका असली मकसद संगठित अपराध को रोकना नहीं, बल्कि सत्ताधारियों के हाथों में नागरिकों की स्वतंत्रता छीनने की असीमित शक्तियां सौंपना है।

जनसुरक्षा या आतंक का शासन: शमीक लाहिड़ी

"व्यक्तिगत स्वतंत्रता का इतिहास मुख्य रूप से कानूनी प्रक्रियाओं और नागरिक सुरक्षा-कवचों को बनाए रखने का इतिहास है।" — न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना (ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला, 1976)

संगठित अपराध को दबाने और जनसुरक्षा बनाए रखने के नाम पर पश्चिम बंगाल सरकार 'पश्चिम बंगाल जनसुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026' लेकर आ रही है। सरकार का तर्क है कि 'समाज-विरोधी गतिविधियों और आदतन अपराधियों' से निपटने के लिए यह कानून बेहद जरूरी है। लेकिन विधेयक के मसौदे को पढ़ने पर साफ होता है कि इसका असली मकसद संगठित अपराध को रोकना नहीं, बल्कि सत्ताधारियों के हाथों में नागरिकों की स्वतंत्रता छीनने की असीमित शक्तियां सौंपना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का मुख्य कर्तव्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होता है। लेकिन जब उस कर्तव्य का पालन करने वाले खुद ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार और 'कानून के शासन' के मौलिक सिद्धांतों को कमजोर करने लगें, तो लोकतंत्र और पुलिस राज में कोई फर्क नहीं रह जाता।

इतिहास की सीख बहुत स्पष्ट है। जनसुरक्षा के नाम पर जो भी कानून बनाए गए हैं, समय के साथ सत्ताधारियों द्वारा उनका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया गया है। नतीजतन, सवाल यह नहीं है कि समाज में अपराधी हैं या नहीं — निश्चित रूप से हैं, और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या नए कानून बनाकर अदालतों की अनदेखी करके सरकार को ऐसी शक्तियां दी जानी चाहिए, जिससे अदालती जांच के बिना ही किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनी जा सके?

निवारक निरोध (Preventive Detention) का डर

इस विधेयक का सबसे चिंताजनक पहलू 'निवारक निरोध' (बिना अपराध साबित हुए पहले ही हिरासत में लेना) को अत्यधिक महत्व देना है। यानी, अदालत में अपराध साबित होने से पहले ही, केवल इस आशंका पर कि कोई भविष्य में अपराध कर सकता है, सरकार किसी भी व्यक्ति को 1 वर्ष तक बिना सुनवाई के हिरासत में रख सकती है। यह फौजदारी कानून के इस बुनियादी सिद्धांत को पूरी तरह उलट देता है कि 'पहले जांच, फिर सुनवाई, और फिर सजा'। यह विधेयक पहले हिरासत, फिर बिना किसी ठोस सुनवाई के सजा का रास्ता खोलता है। इतिहास गवाह है कि केवल अपवादात्मक परिस्थितियों को छोड़कर, जब भी ऐसी शक्तियां दी गई हैं, उनका दुरुपयोग होना तय रहा है।

'असामाजिक गतिविधियों' की अस्पष्ट परिभाषा'

इस विधेयक की एक और बड़ी कमजोरी 'असामाजिक गतिविधियों' की अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा है। इसमें ऐसी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है कि कौन सी हरकतें लोगों के मन में 'भय', 'आतंक' या 'असुरक्षा' की भावना पैदा करती हैं। कानूनी रूप से इन शब्दों की कोई निश्चित सीमा नहीं है। ऐसे में किसी को 'असामाजिक' घोषित करने का पूरा अधिकार पूरी तरह से प्रशासन और सत्ताधारी दल की इच्छा पर निर्भर करेगा।

पश्चिम बंगाल जनसुरक्षा विधेयक की मुख्य चिंताएँ:

कानूनी अनिश्चितता: कानून स्पष्ट न होने के कारण अधिकारियों को मनमानी करने की छूट मिलती है। एक ही घटना पर अलग-अलग अधिकारी अलग-अलग फैसले ले सकते हैं।

पुलिस को असीमित अधिकार: इस कानून के तहत पुलिस को व्यापक तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी के अधिकार दिए गए हैं। साथ ही, 'नेक नियत' से काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा दी गई है, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही खत्म हो जाती है।

मानवाधिकारों का उल्लंघन: बिना मुकदमे के 1 वर्ष तक की हिरासत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों (जैसे UDHR और ICCPR) का उल्लंघन है, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं।

फासीवादी प्रवृत्तियों की याद

इतिहास गवाह है कि जब भी नागरिकों के अधिकारों को कुचला गया है, उसके परिणाम भयानक रहे हैं। लेख में मीसा (MISA), एनएसए (NSA), यूएपीए (UAPA) जैसे कानूनों के दुरुपयोग का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत स्टैन स्वामी, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव और उमर खालिद जैसे बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को सालों तक बिना मुकदमे के जेल में रहना पड़ा।

फासीवादी विचारधारा के जनक बेनिटो मुसोलिनी के शासनकाल में कई कानून पारित किए गए, जिन्हें सामूहिक रूप से 'अंतिम फासीवादी कानून' के नाम से जाना जाता है। इन कानूनों ने विपक्षी राजनीतिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया। इन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित किया, पुलिस को व्यापक शक्तियां प्रदान कीं और प्रशासनिक आदेश द्वारा विरोधियों को निर्वासित या हिरासत में लेने की अनुमति दी।

एडॉल्फ हिटलर के सत्ता में आने के बाद, उनके कमांडर-इन-चीफ, जो बाद में राष्ट्रपति बने, पॉल वॉन हिंडेनबर्ग ने आपातकालीन कानून जारी किए। इस कानून ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया। इसने बिना वारंट के गिरफ्तारी की शक्ति का विस्तार किया, प्रेस, सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कड़े नियंत्रण लगाए और "राज्य सुरक्षा" के नाम पर राजनीतिक विरोधियों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की।

आरएसएस और भाजपा के लोग उनकी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित हैं। परिणामस्वरूप, यह स्वाभाविक है कि वे ऐसा कानून लाएंगे। लोकतंत्र से प्रेम करने वाले सभी लोगों का यह तत्काल कर्तव्य है कि वे इसके विरुद्ध एक सशक्त जन आंदोलन खड़ा करें, जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हों।

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साभार: गणशक्ति

(लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद,'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)

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जनसुरक्षा या आतंक का शासन: शमीक लाहिड़ी

प्रकाशित: 01 जुलाई 2026 • 5 मिनट पठन

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