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तीजन बाई: छत्तीसगढ़ की अमर 'स्वर-कोकिला'

केशव कुमार भट्टड़•05 जुलाई 20263 मिनट पठन39 बार पढ़ा गया

तीजन बाई सिर्फ गायिका नहीं थीं — वे एक विद्रोही कलाकार थीं, जो परंपरा की सीमाओं को लांघकर आगे बढ़ीं। उनकी आवाज में महाभारत का पराक्रम,पीड़ा,नीति और छत्तीसगढ़ की आत्मा थी। उन्होंने साबित किया कि कला कोई लिंग नहीं जानती, वह तो सिर्फ साधना और समर्पण मांगती है।

तीजन बाई: छत्तीसगढ़ की अमर 'स्वर-कोकिला'

तीजन बाई: छत्तीसगढ़ की अमर 'स्वर-कोकिला'

आज भारत (छत्तीसगढ़) की लोक संस्कृति का एक अनमोल रत्न हमसे बिछुड़ गया। पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई 5 जुलाई 2026 को रायपुर के AIIMS में 70 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। उनके निधन से भारतीय लोक कला की दुनिया में एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ है, जिसे भर पाना असंभव है।

गनियारी गांव (भिलाई, दुर्ग) में 24 अप्रैल 1956 को जन्मी तीजन बाई ने बचपन से ही महाभारत की कथाओं को अपने नाना के स्वर में सुना और उसे अपने हृदय में बसाया। उस समय पंडवानी कला मुख्यतः पुरुषों का क्षेत्र मानी जाती थी। वेदमती शैली (बैठकर गाना) महिलाओं के लिए थी, लेकिन तीजन बाई ने साहस कर कापालिक शैली (खड़े होकर, नाटकीय अंदाज में) अपनाई और इस पुरुष-प्रधान परंपरा को तोड़ दिया। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया और अपनी शक्तिशाली आवाज, जीवंत अभिनय तथा ताल के साथ महाभारत के पात्रों को जीवंत कर दिया। एक महिला होने के नाते पांडवनी गाने के कारण उन्हें उनकी जनजाति - 'पर्धी' जनजाति - से निकाल दिया गया था। उन्होंने अपने लिए एक छोटी सी झोपड़ी बनाई और पड़ोसियों से बर्तन और खाना उधार लेकर अकेले रहने लगीं, लेकिन उन्होंने गाना कभी नहीं छोड़ा।

हबीब तनवीर जैसे महान रंगकर्मी के ध्यान में आने के बाद उनका सफर देश-विदेश तक फैल गया। देश-दुनिया के मंचों तक उन्होंने छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू को पहुंचाया। पद्म श्री (1988), पद्म भूषण (2003), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), नृत्य शिरोमणि (2007) और अंततः पद्म विभूषण (2019) जैसे सम्मानों से नवाज़ी गईं। बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि भी प्रदान की। सरकारी सम्मान (पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण) भले ही मिले, लेकिन तीजन बाई की सच्ची विरासत उन लाखों ग्रामीण महिलाओं और दबे-कुचले कलाकारों में है, जिन्हें उन्होंने प्रेरित किया कि लोक-संस्कृति वर्चस्व के खिलाफ हथियार हो सकती है।

तीजन बाई सिर्फ गायिका नहीं थीं — वे एक विद्रोही कलाकार थीं, जो परंपरा की सीमाओं को लांघकर आगे बढ़ीं। उनकी आवाज में महाभारत का पराक्रम,पीड़ा,नीति और छत्तीसगढ़ की आत्मा थी। उन्होंने साबित किया कि कला कोई लिंग नहीं जानती, वह तो सिर्फ साधना और समर्पण मांगती है। उन्होंने साबित किया कि महिला कलाकार पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में न केवल टिक सकती है, बल्कि उसे नई दिशा भी दे सकती है

आज उनके गीतों की गूंज रुक गई है, लेकिन उनकी कला अमर है। छत्तीसगढ़ के गांवों से लेकर विश्व के मंचों तक, हर जगह उनकी यादें जीवित रहेंगी।

हमारी श्रद्धांजलि।

तीजन बाई अमर रहें।

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तीजन बाई: छत्तीसगढ़ की अमर 'स्वर-कोकिला'

प्रकाशित: 05 जुलाई 2026 • 3 मिनट पठन

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