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लड़कर ही इंसानी गरिमा और अधिकार वापस लाएगा लाल झंडा:- मोहम्मद सलीम

अपराजिता•06 जुलाई 20265 मिनट पठन40 बार पढ़ा गया

यह लड़ाई हिंदू बनाम मुसलमान की नहीं है, उत्तर बंगाल बनाम दक्षिण बंगाल की नहीं है, आदिवासी, कुड़मी, राजबंशी या मतुआ समुदाय की नहीं है। यह लड़ाई लुटेरों के खिलाफ आम और गरीब मेहनतकश जनता की है। जब एक लुटेरे की जगह दूसरा लुटेरा आ गया है, तो यह लड़ाई भला क्यों रुकेगी? वामपंथी ही आम जनता की लड़ाई जारी रखेंगे। चुनाव परिणाम घोषित होते ही वामपंथी बुलडोजर से बेदखली के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। उस लड़ाई को और तेज करना होगा। इसके लिए एक व्यापक वाम एकता का निर्माण कर, लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़े सभी लोगों को एकजुट करना होगा। राज्य की संवेदनशील, मिलनसार और सौहार्दपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।

मोहम्मद सलीम

सीपीआई (एम) पश्चिम बंगाल के सचिव

लड़कर ही इंसानी गरिमा और अधिकार वापस लाएगा लाल झंडा:- मोहम्मद सलीम

लड़कर ही इंसानी गरिमा और अधिकार वापस लाएगा लाल झंडा :- मोहम्मद सलीम

फासीवादी इंसानों का आत्मविश्वास नष्ट करके, उनके अधिकार और सम्मान को छीनकर शासन चलाना चाहते हैं। आत्मविश्वास से भरकर सम्मान और अधिकार वापस पाने के लिए ही वामपंथियों का यह संघर्ष है। रविवार को मेदिनीपुर में सीपीआईएम की एक साधारण सभा में पार्टी के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने यह बात कही।

उन्होंने कहा कि इसीलिए फासीवादी लोग बेरोजगारों, काम न पाने वाले फेरीवालों, बस्ती में रहने वाले लोगों को "दीमक", "कॉकरोच" और "घुसपैठिया" कहकर उनके प्रति नफरत फैलाते हैं। वे सम्मान और अधिकार छीनकर लोगों का आत्मविश्वास खत्म करना चाहते हैं। बिना लड़ाई के कोई अधिकार नहीं मिलेगा। लाल झंडा हाथ में लेकर हम अधिकार पाने का यह संघर्ष जारी रखेंगे। कम्युनिस्ट जीत से अति-उत्साहित नहीं होते और हार से निराश नहीं होते। वे अपनी कमजोरियों और कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करते हैं और संघर्ष को और तेज करते हैं।

इस दिन सीपीआईएम की पश्चिम मेदिनीपुर जिला समिति ने मेदिनीपुर शहर के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में इस चर्चा सभा का आयोजन किया था। इसकी अध्यक्षता पार्टी के जिला सचिव विजय पाल ने की। इस अवसर पर राज्य समिति के सदस्य अभय मुखर्जी, तापस सिन्हा, गीता हाँसदा, मेघनाद भुइयां, तरुण राय सहित अन्य नेता उपस्थित थे।

सभा में वर्तमान राजनीतिक स्थिति की व्याख्या करते हुए सलीम ने कहा कि राज्य में सरकार बदल गई है। लेकिन आफत टलने के बाद भी संकट आ गया है। इस बारे में सभी को जागरूक होना होगा। 2011 में वाम मोर्चा सरकार को हराने के लिए सभी प्रतिक्रियावादी ताकतें एकजुट हो गई थीं। 22 दलों का महागठबंधन बना था।तृणमूल कांग्रेस कोई पार्टी नहीं थी, वाम मोर्चे को हटाने के लिए आरएसएस द्वारा बनाया गया एक मंच थी। अकेले ममता बनर्जी के दम पर नहीं, बल्कि बम, बंदूक और माओवादियों को साथ लेकर आरएसएस की योजना के तहत शुभेंदु अधिकारी के जरिए ममता बनर्जी ने यह हमला करवाया था। तब कुछ लोगों को ममता में लेनिन दिखाई दिया था। अब जैसे ही सरकार गई, वह दल भी ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। लेकिन सीपीआई(एम) सरकार में न होते हुए भी लड़ाई में है और रहेगी। क्योंकि सीपीआई(एम) की एक विचारधारा है, जो वर्ग हितों के लिए आंदोलन और संघर्ष में लगी है। अगर विचारधारा और सिद्धांत हों, तो इतनी आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। उनके हमले के निशाने पर सिर्फ सीपीआई(एम) नहीं थी, बल्कि सभी लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनना ही उनका मुख्य लक्ष्य था।

उन्होंने कहा कि राज्य के लोग तृणमूल कांग्रेस के लूट, आतंक और जबरन रंगदारी से मुक्ति चाहते थे, इसलिए उन्होंने उसके खिलाफ जनादेश दिया था। तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लोगों के इस गुस्से को भाजपा अब मुसलमानों के खिलाफ गुस्से के रूप में सजाकर दिखा रही है। क्योंकि वे लोगों के बीच धार्मिक विभाजन पैदा करना चाहते हैं। इस तृणमूल कांग्रेस के जन्म के पीछे भाजपा और आरएसएस ने दाई का काम किया था। अब तृणमूल कांग्रेस के हारने पर भी उनके पास 80 विधायक थे, सभी नगरपालिकाएं और सांसद उनके साथ थे। लेकिन विधानसभा में हारते ही पूरी तृणमूल ताश के पत्तों की तरह ढह गई। पदार्थ के रूप बदलते हैं। तृणमूल कांग्रेस भले ही व्यर्थ हो, लेकिन वह अपना रूप बदल रही है। इस बार नए पात्र में नया आकार ले रही है। कुछ हिस्सा नाली में बह रहा है, तो कुछ हिस्सा भाजपा में जा रहा है। भले ही यह रूपांतरण हो रहा हो, लेकिन आरएसएस के साथ तृणमूल कांग्रेस का नाभि-नाल संबंध है और रहेगा। चुनाव से पहले उन्होंने दुष्प्रचार किया था कि सीपीआई(एम) को वोट मत देना, उनका तो कोई चेहरा ही नहीं है। आज तृणमूल कांग्रेस के वे चेहरे कहाँ हैं? अगर विचारधारा न हो, तो सिर्फ सत्ता के लालच में चेहरे कैसे बदसूरत हो जाते हैं, यह साफ दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस के नेता भाजपा के पास जाकर पद, पैसा और सुरक्षा की भीख मांग रहे हैं। और भाजपा गांवों के बाजारों में गाय-बैल की तरह तृणमूल के सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त कर रही है।

भाजपा के खतरे के बारे में सलीम ने यह भी कहा कि यह लड़ाई हिंदू बनाम मुसलमान की नहीं है, उत्तर बंगाल बनाम दक्षिण बंगाल की नहीं है, आदिवासी, कुड़मी, राजबंशी या मतुआ समुदाय की नहीं है। यह लड़ाई लुटेरों के खिलाफ आम और गरीब मेहनतकश जनता की है। जब एक लुटेरे की जगह दूसरा लुटेरा आ गया है, तो यह लड़ाई भला क्यों रुकेगी? वामपंथी ही आम जनता की लड़ाई जारी रखेंगे। चुनाव परिणाम घोषित होते ही वामपंथी बुलडोजर से बेदखली के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। उस लड़ाई को और तेज करना होगा। इसके लिए एक व्यापक वाम एकता का निर्माण कर, लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़े सभी लोगों को एकजुट करना होगा। राज्य की संवेदनशील, मिलनसार और सौहार्दपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।

सलीम ने कहा कि जो लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि मोदी और शुभेंदु हर दिन जो अच्छी-अच्छी बातें कह रहे हैं, वे पूरी हो जाएंगी, वे भूल कर रहे हैं। देश की आर्थिक स्थिति संकट में है। क्या कारखानों में निवेश होगा? वे लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं करेंगे; वे जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को छीनकर पूँजीपतियों के संकट को दूर करने का प्रयास करेंगे। इसके लिए उन्होंने चुनाव से पहले ही एडवांस ले लिया है। अब वे लोगों के एक हिस्से को दूसरे हिस्से से लड़ाकर पूँजीपतियों के स्वार्थ को पूरा करेंगे। इसके खिलाफ वामपंथियों का संघर्ष जारी रहेगा।

इस सभा से पहले पार्टी के जिला कार्यालय में मार्क्सवादी पुस्तकालय भवन के शिक्षा केंद्र में पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को लेकर एक शिक्षा शिविर भी आयोजित किया गया था। सभा के मंच पर मोहम्मद सलीम ने प्रोफेसर सुकुमार मुर्मू द्वारा लिखित 'आदिवासी दर्शन और मार्क्सवादी दर्शन का तुलनात्मक विश्लेषण' पर आधारित एक समृद्ध पुस्तक का विमोचन भी किया ।

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साभार :गणशक्ति

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लड़कर ही इंसानी गरिमा और अधिकार वापस लाएगा लाल झंडा:- मोहम्मद सलीम

प्रकाशित: 06 जुलाई 2026 • 5 मिनट पठन

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