मास्साब, जिन्होंने पीढ़ियाँ बदल दी
° टिकेंद्र सिंह शाद °

मथुरा के डेम्पियरनगर के मास्साब की शख़्सियत अँधेरों में बिजली की कौंध जैसी थी। उनकी चमक ने कितनी साधारण ज़िन्दगियों को प्रगतिशील चेतना से रोशन किया, इसका ठीक ठीक आंकड़ा उनके पास भी नहीं है जिनकी उनके काम और जीवन को उसकी सम्पूर्णता में आने वाली पीढ़ियों के सामने रखने की ज़िम्मेदारी थी। उनका असर अपने हमउम्रों पर, अपने से पहली पीढ़ी पर और अपने से बाद की पीढ़ियों पर बेहद गहरा रहा। उनके संग-साथ से, उनकी पत्रिकाओं में छपते-संवरते हुए, उनकी किताबों को पढ़ते हुए, उनके कक्षाओं से गुज़रते हुए, उनके प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हुए और उनके साथ जन अभियानों व जन आंदोलनों में भागीदारी करते हुए कितने युवा उत्तर भारत के क़स्बों से निकलकर राजधानियों और विभिन्न महानगरों में बड़े लेखक, बुद्धिजीवी, प्रफेसर, सम्पादक कहलाए और वे ख़ुद को हमेशा सचेत रूप से पीछे करते रहे। उनके पाठक और दोस्त जितने अध्यापक – विद्यार्थी आदि थे, उतने ही तांगा-रिक्शा चालकों से लेकर विभिन्न मज़दूर यूनियनों के वर्कर। वे बेशक प्रखर जन-बुद्धिजीवी थे। बंगाल और केरल पर केंद्रित रही उनकी वाम पार्टी ने हिन्दी पट्टी के इस व्यक्तित्व के महत्व को ठीक तरह समझा होता तो कुछ और बात होती। अफ़सोस यह कि इस बेलौस कवि लेखक-सम्पादक-संगठनकर्ता को उनके सानिध्य से गुज़र कर सितारे बने लेखकों ने भी उस तरह याद करना छोड़ दिया, जिस तरह कि उनका 
फर्ज़ बनता था। बहरहाल, अगर आज का प्रखर युवा कवि मोहन मुक्त अचानक अपने बनने में सव्यसाची की किसी पुस्तिका का ज़िक्र करे तो उनके असर की निरन्तरता को समझा जा सकता है। आज उनके जन्मदिन पर टिकेंद्र सिंह शाद का यह संस्मरण प्रकाशित किया जा रहा है। सम्मुख की नई प्रस्तुति:
प्रो. श्यामलाल वशिष्ठ यानी पाठकों के दिलों में रौशनी की तरह बसे जन-बुद्धिजीवी सव्यसाची। कवियों-लेखकों-विद्यार्थियों से लेकर मज़दूर यूनियनों के साथियों के मास्साब। एक ज़रा सी मुलाक़ात से भी असर छोड़ने वाला और अपनी सादगी भरी गहरी लिखत से जादू करने वाला अद्भुत शख़्स।
पूरे उत्तर भारत में उनके जैसा प्रभाव छोड़ने वाला, उनके जैसा सक्रिय, उनके जैसा निस्वार्थ व्यक्तित्व शायद ही दूसरा कोई रहा हो। हरिशंकर परसाई याद आते हैं। लगातार लिखकर वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करते हुए, फासिस्ट राजनीति से जूझते हुए और सड़क पर भी सीधे टकराते हुए। मथुरा की गलियों में मास्साब के ऐसे ही नक़्श-ए-पा मिलेंगे। सीधे जूझते हुए, पढ़ते पढ़ाते हुए लिखते लिखाते हुए शिक्षित करते हुए जनता को जनवादी चेतना से लैस करते हुए। परसाई जी का अपना ओरा था। सव्यसाची का भी था। लेकिन यह उनका शगल था कि ख़ुद को पीछे रखना, ख़ुद को लेखक या कवि न मानने पर ज़ोर देना। यह एक चलन है कि ऐसे व्यक्तित्व को वे भी अनहुआ मानने लगते हैं जिनका होना उनकी ही देन हो। अस्सी और नब्बे के दौर में उत्तर भारत का कौन ऐसा प्रखर युवा होगा जो उनके असर में नहीं आया होगा। उत्तरार्ध और उत्तरगाथा जैसी पत्रिकाओं में राजेश जोशी, मनमोहन, आलोक धन्वा जैसे कितने कवि लेखक छप कर पाठकों तक पहुँचे होंगे। आपातकाल में सव्यसाची की पत्रिका के तेवर उम्र की वरिष्ठता पर रह रहे तमाम लेखको को याद ही होंगे।
मैंने सव्यसाची जी को पहली बार 1973 में मथुरा में आर्य समाज रोड पर लाल झंडा कार्यालय में भगत सिंह के शहीदी दिवस पर सुना था। मैं इंटर का छात्र था। मेरे दिल-दिमाग में खलबली मच गई। मास्साब की बातें मेरे ज़हन में चलती रही। मैं उनके असर में आ चुका था। मैं उनसे मिलने अकेला डैंपियर पार्क गया। वे एक गोल चक्कर के निकट एक कोठी के बाहरी छोटे से कमरे में स्टोव पर खाना पकाते हुए मुझसे बात करते रहे। हैफ़! मैंने अपनी दो कविताएं उत्तरार्ध में छापने का आग्रह भी कर डाला। उन्होंने बताया कि कविताएं चयन कमेटी के अनुमोदन के बाद ही छपेंगी। मैं उनकी ईमानदारी, प्रतिबद्धता और पारदर्शिता से प्रभावित होकर लौटते हुए सोचता रहा कि एक साधारण सा पतला दुबला ये कामरेड कितना मज़बूत है।
फिर तो उन्हें सुनने का एक सिलसिला सा बन गया। सरकार के ख़िलाफ़ तीखा और प्रभावशाली भाषण देते हुए सव्यसाची, साइकल से पार्टी अख़बार बांटते हुए बात करते सव्यसाची, नुक्कड़ मीटिंगों में झकझोरते सव्यसाची, बहुत से लोगों की तरह मेरी रोज़मर्रा ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुके थे।
1978 में एक ट्रेनिंग के सिलसिले में मैं भानपुरा (मध्य प्रदेश) गया हुआ था। वहां सुबह चाय पीने के लिए एक गुमटी पर जाना होता जहाँ मेरी निगाह मास्साब की छोटी- छोटी किताबों पर पड़ी। गुमटी वाले ने बताया कि मथुरा के एक कामरेड हैं जिन्हें यहां हम मास्साब कहते हैं, ये किताबें उन्हीं की लिखी हुई हैं। इन्हें यहां मजदूर और अन्य कारीगर पढ़ने को ले जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में बदलाव लाने और समाज की जटिलता को समझाने का इससे बेहतर प्रयास और क्या हो सकता था!
बाद में पता चला कि चवन्नी, अठन्नी या हद से हद एक रुपये की क़ीमत वाली उनकी किताबें दिल्ली से लेकर दूर दूर क़स्बों गाँवों तक आम लोगों से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक में बेहद लोकप्रिय थीं। वे इन किताबों में अक्सर संवाद शैली में बात करते। बौद्धिक, राजनीतिक विषयों से लेकर आम जीवन की और फ़िल्मों जैसे माध्यम की भी। उनकी इन किताबों के शीर्षक थे –
गाँव के गरीबों से, नौजवानों से, महिलाओं से, इंदिरा गांधी से दो बातें, वामपंथ के अंदरूनी संघर्ष, समाजवाद क्या है?, कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं, आज़ादी से इमरजेंसी तक , हिंदी फ़िल्में, समाज को बदल डालो, बातें और भी, आरएसएस को जानिए, आपातकाल से आज तक आदि। मतलब यह कि वे लगातार संवाद में थे।
सव्यसाची जनवादी लेखक संघ के राज्य सचिव भी रहे लेकिन शायद जलेस के गठन से पहले ही सांस्कृतिक अभियान के लिए उन्होंने मथुरा में जन सांस्कृतिक मंच की स्थापना की थी। वे नेता की तरह नहीं, श्रोता की तरह पीछे बैठे हुए ख़ामोशी से वक्ताओं को सुनते और ज़रूरत पड़ने पर सकारात्मक दिशा देते। एक डिग्री कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढाना, और एक मजदूर की तरह जीवनयापन कर किताबें लिखना, साइकिल पर अखबार बांटना , विरोधी विचार वालों से भी सम्मान पाना, जमीन से जुड़े इस मार्क्सवादी लेखक के लिए सहज बातें थीं। तांगा यूनियन,डोरी निवाड़ यूनियन ,प्रेस वर्कर्स यूनियन, साड़ी मजदूर यूनियन आदि का यह संगठनकर्ता आज होता तो साम्प्रदायिक ताक़तों से जूझता हुआ लिखता मिलता, सड़कों पर मिलता, हर मोर्चे पर सक्रिय मिलता।
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{लेखक जनवादी लेखक संघ की मथुरा इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। वे माकपा के जिला सचिव भी रहे हैं।}
साभार: सम्मुख | 10 जुलाई,2026
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