इससे पहले 2022 के सूचकांक में भी भारत सबसे निचले (180वें) पायदान पर था। तब हमेशा की तरह अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस वैश्विक रिपोर्ट को 'अवैज्ञानिक' और 'त्रुटिपूर्ण' बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन लगातार दूसरी बार भारत की इस बेहद दयनीय स्थिति ने साबित कर दिया है कि जब तक जन-केंद्रित नीतियों के बजाय कॉर्पोरेट-अनुकूल नीतियां लागू रहेंगी, तब तक देश की जनता प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर रहेगी।
कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों की मार: 'ईपीआई 2026' में फिसला भारत,
पर्यावरण और जनस्वास्थ्य सूचकांक में 177 देशों में मिला 176वां स्थान
नई दिल्ली, 13 जुलाई 2026। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पर्यावरण कानूनों को कमजोर करने और कारपोरेट घरानों को प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की छूट देने का खामियाजा आज देश की जनता भुगत रही है। वैश्विक स्तर पर जारी 'एनवायरनमेंट परफॉर्मेंस इंडेक्स' (EPI) 2026 की ताजा रिपोर्ट ने विकास के ढोल पीटती सरकार के दावों की पोल खोल दी है। पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और जलवायु संकट से निपटने के मानकों पर तैयार इस सूचकांक में भारत दुनिया के 177 देशों में शर्मनाक रूप से 176वें पायदान पर आ गिरा है। भारत के नीचे अब सिर्फ लाओस बचा है। वहीं, दक्षिण एशिया के तमाम आठ देशों में भी भारत का प्रदर्शन सबसे घटिया और अंतिम रहा है।
येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय समेत कई प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार इस सूचकांक में भारत को 100 में से महज 22.46 अंक मिले हैं। इसके विपरीत, यूरोप का एस्टोनिया 70.71 स्कोर के साथ लगातार दूसरी बार शीर्ष पर बना हुआ है।
अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और मुनाफे की वेदी पर बलि चढ़ता जनस्वास्थ्य
हर दो साल में प्रकाशित होने वाले ईपीआई में पर्यावरणीय स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र की सुदृढ़ता और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे तीन मुख्य क्षेत्रों में 47 संकेतकों (इंडिकेटर्स) के आधार पर देशों का मूल्यांकन किया गया है। इस वर्ष पहली बार घास के मैदानों (ग्रासलैंड) के नुकसान को भी मूल्यांकन में शामिल किया गया है। रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि भारत में जारी अनियंत्रित पूंजीवादी औद्योगिकीकरण और मुट्ठी भर उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए कोयला आधारित बिजलीघरों पर बढ़ती निर्भरता ने देश के शहरी क्षेत्रों को गैस चैंबर में तब्दील कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सूक्ष्म धूल कणों ($PM_{2.5}$), जहरीली कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड के अनियंत्रित उत्सर्जन के कारण जनस्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुँच रहा है। इसके अलावा, जैव विविधता संरक्षण में भारी कमी, घास के मैदानों का विनाश और समुद्रों में बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा अत्यधिक मछली पकड़ने (ओवर-फिशिंग) के कारण हमारा पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो चुका है।

केवल आंकड़ों की बाजीगरी, जमीनी हकीकत शून्य
शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की दर में मामूली कमी आने के कारण भारत के स्कोर में 4.7 अंकों का तकनीकी सुधार हुआ है, लेकिन देश की बदहाल जमीनी हकीकत को देखते हुए यह सुधार नगण्य है। गौरतलब है कि इससे पहले 2022 के सूचकांक में भी भारत सबसे निचले (180वें) पायदान पर था। तब हमेशा की तरह अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस वैश्विक रिपोर्ट को 'अवैज्ञानिक' और 'त्रुटिपूर्ण' बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन लगातार दूसरी बार भारत की इस बेहद दयनीय स्थिति ने साबित कर दिया है कि जब तक जन-केंद्रित नीतियों के बजाय कॉर्पोरेट-अनुकूल नीतियां लागू रहेंगी, तब तक देश की जनता प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर रहेगी। पर्यावरणविदों और नागरिक संगठनों ने इस रिपोर्ट के बाद सरकार से अपनी पर्यावरण नीतियों की दिशा तुरंत बदलने और जनता के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की मांग की है।
स्रोत: बांग्ला दैनिक 'डेली देशेरकथा'। 13.07.2026
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