फासीवादी ताकतों को ललकारता महापंडित का विचार: मूर्ति चुरा सकते हो, विचार कैसे रोकोगे?
रानीगंज में दुस्साहस: महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब
महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब करने वाले आख़िर किस बात से डरे हुए हैं?
- सौरभ दत्त
"हटाकर मूर्ति वे समझ बैठे कि इतिहास मिट गया, उन्हें क्या पता कि हर हाथ में अब 'वोल्गा से गंगा' का सैलाब है!"
रानीगंज, पश्चिम बंगाल। यहाँ से भारत के "पहले यायावर (घुमक्कड़) कम्युनिस्ट" राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब कर दी गई है!
इस कायराना हरकत को सुनकर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि नफ़रत के सौदागरों ने अनजाने में ही सही, हमें एक बड़ा मौका दे दिया है। उन्होंने हमें यह याद दिलाने का अवसर दिया है कि वे राहुल सांकृत्यायन से इतनी नफ़रत क्यों करते हैं, और आज की युवा पीढ़ी को क्यों उनके संघर्षों और विचारों को और ज़्यादा सम्मान के साथ गले लगाना चाहिए।
जो लोग इतिहास को मिटाना चाहते हैं, वे असल में भविष्य से डरे हुए लोग हैं। उन्हें अपने विचारों के खोखलेपन और अपनी आने वाली वैचारिक हार का डर सता रहा है। लेकिन वे नादान हैं। राहुल सांकृत्यायन जैसे विराट व्यक्तित्व को भला कंक्रीट-पत्थर की एक मूर्ति हटाकर कैसे मिटाया जा सकता है? इसे समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि राहुल सांकृत्यायन आख़िर कौन थे!
महापंडित राहुल सांकृत्यायन: 'केदारनाथ पांडे' से 'सत्य खोजी' बनने का सफ़र
उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में साल 1893 में जन्मे केदारनाथ पांडे को इतिहास "बीसवीं सदी का सबसे महान भारतीय विद्वान (महापंडित)" कहता है।
वह यायावर (घुमक्कड़) साधु जिसने दुनिया नाप दी:
उन्होंने अपना पूरा जीवन पैदल चलते हुए बिताया। तिब्बत, श्रीलंका, ईरान, रूस और जापान जैसी जगहों की खाक छानी। करीब 40 बार उन्होंने हिमालय की दुर्गम बर्फीली चोटियों को अपने पैरों से नापा। उन्होंने खुद को नाम दिया—"राहुल सांकृत्यायन"। 'राहुल' यानी बुद्ध के पुत्र और 'सांकृत्यायन' यानी वह पथिक, वह यात्री, जो एक जगह से दूसरी जगह ज्ञान का प्रसार करता है।
20 से अधिक भाषाओं के ज्ञाता और अद्वितीय शोधकर्ता:
वे पालि, संस्कृत, तिब्बती, बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी समेत 20 से अधिक भाषाओं के असाधारण जानकार थे। वे तिब्बत की दुर्गम पहाड़ियों से प्राचीन और दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियों को गधों पर लादकर लाए और पटना म्यूजियम को सौंप दिया।
बुद्ध के वैज्ञानिक विचार से जुड़ाव:
वे बुद्ध को कोई 'देवता' नहीं मानते थे। राहुल जी के लिए बुद्ध कार्ल मार्क्स की तरह एक बेहद तार्किक, वैज्ञानिक और प्रखर विद्वान थे, जो हर स्थापित सत्य पर सवाल उठाने की आज़ादी देते थे। बुद्ध का यही दर्शन—जो दुख और तकलीफों से भरी इस दुनिया में भी ज्ञान और समता के ज़रिए जीवन को बेहतर बनाना सिखाता है—राहुल जी को कम्युनिज्म के सबसे करीब ले आया।
केवल कलम नहीं चलाई, मैदान में उतरकर लड़े
राहुल जी केवल घर के कमरों में बैठकर किताबें लिखने वाले बुद्धिजीवी नहीं थे, वे ज़मीनी लड़ाइयों के योद्धा थे-
किसान आंदोलन के सेनापति:
आज़ादी के आंदोलन के दौरान वे किसान सभा से जुड़े और बिहार में जमींदारों व जोतदारों की तानाशाही के खिलाफ लड़ते हुए कई बार जेल गए।
मेहनतकशों की आज़ाद आवाज़:
आज़ादी मिलने के बाद भी वे चैन से नहीं बैठे। उन्होंने मजदूरों और किसानों के हक़ की लड़ाई जारी रखी। उनके लिए राजनीति का सीधा मतलब था—शोषित और उपेक्षित जनता के हक़ में डटकर खड़े होना।
वो कालजयी किताबें, जो आज भी सत्ता को डराती हैं
राहुल जी ने अपने जीवनकाल में लगभग 150 किताबें लिखीं। इनमें से कुछ प्रमुख रचनाएँ जो आज भी हमारे विचारों को धार देती हैं:
वोल्गा से गंगा: वर्ग संघर्ष (क्लास स्ट्रगल) के चश्मे से देखा गया भारत की सभ्यता का 8000 सालों का जीवंत इतिहास।
दर्शन-दिग्दर्शन: भारतीय दर्शन की मुकम्मल भौतिकवादी (मैटेरियलिस्टिक) व्याख्या।
वैज्ञानिक भौतिकवाद: अंधविश्वासों और धार्मिक पाखंडों को खारिज कर विज्ञान को समाज के केंद्र में लाने वाली कृति।
तुम्हारी क्षय: शोषक वर्ग और दकियानूसी ताकतों के विनाश का उद्घोष।
सिंह सेनापति: गणतंत्र और लोकसत्ता की पृष्ठभूमि पर लिखा गया कालजयी ऐतिहासिक उपन्यास।
दलाई लामा: तिब्बत यात्रा के अनूठे और ऐतिहासिक संस्मरण।
उनकी कालजयी रचनाएँ अंग्रेजी में 'Volga to Ganga' और 'Scientific Materialism' के नाम से भी पूरी दुनिया में पढ़ी जाती हैं।
आख़िर नफ़रत के पैरोकार उनसे इतना क्यों डरते हैं?
आरएसएस और भाजपा की विभाजनकारी राजनीति को राहुल जी के तीन विचारों से सबसे ज़्यादा खतरा है:
तर्कवाद (Rationalism): राहुल जी ने धार्मिक कट्टरता और थोपे गए पाखंडों पर बेबाक सवाल उठाए। उन्होंने काल्पनिक "ईश्वर" के बजाय धड़कते हुए "इंसान" को व्यवस्था के केंद्र में रखा।
भौतिकवाद (Materialism): उनका साफ़ मानना था कि देश की समस्याओं का हल मंदिरों के दरवाज़े पर नहीं, बल्कि सबको जमीन, रोटी, रोजगार और सम्मानजनक शिक्षा देने से निकलेगा।
साझा विरासत और एकता: उन्होंने हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध की दीवारों को ढहाकर सबको समान "भारतीय" माना और गोलवलकर व संघ की नफरत और बांटने वाली थ्योरी को जड़ से खारिज कर दिया।
इसीलिए वे उनकी मूर्ति से डरते हैं। वे डरते हैं कि कहीं उनकी मूर्ति को देखकर आज की युवा पीढ़ी यह न जान जाए कि इस देश के पास तरक्की, भाईचारे और बराबरी का एक दूसरा और बेहतरीन रास्ता भी मौजूद है।
हमारा संकल्प: किताबें बनेंगी हथियार!
राहुल सांकृत्यायन साल 1963 में शारीरिक रूप से हमसे जुदा हो गए थे। लेकिन क्या वे सचमुच चले गए? जब तक 'वोल्गा से गंगा' जिंदा है, जब तक 'दर्शन-दिग्दर्शन' जिंदा है और जब तक वैज्ञानिक सोच जिंदा है, राहुल जी को मारना नामुमकिन है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी तानाशाह या दक्षिणपंथी ताक़त ने किसी महान क्रांतिकारी की मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की है, जनता ने और अधिक उत्सुकता से पूछा है—"आखिर ये कौन थे, जिनसे सत्ता इतनी डरी हुई है?"
रानीगंज और राज्य के लोग इस मूर्ति को दोबारा स्थापित करेंगे। लेकिन हमारा असली विरोध सिर्फ पत्थर की मूर्ति खड़ी करना नहीं, बल्कि उनके विचारों की मशाल को थामना है। आइए, उनकी किताबों को अपनी ताकत बनाएं, उन्हें पढ़ें और नई पीढ़ी के हाथों में सौंपें। यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
"इंसान की मुक्ति ही धर्म है।" — राहुल सांकृत्यायन
✊ चलो रानीगंज!
रानीगंज से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति गायब किए जाने के विरोध में आज (मंगलवार, 14 जुलाई 2026) पूरे पश्चिम बर्धमान जिले और राज्य के कोने-कोने से रानीगंज के "पंजाबी मोड़" की तरफ़ कूच करें! नफ़रत की राजनीति को करारा जवाब दें!
(नोट: ऊपर पोस्ट में दी गई तस्वीर राहुल जी की दार्जिलिंग स्थित मूर्ति की है।)
(रानीगंज स्थित मूर्ति जो गायब कर दी गई है। )
**
भारत के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में से एक, मार्क्सवादी सिद्धांतकार, लेखक, इतिहासकार, भाषाविद, बौद्ध शोधकर्ता और विश्व-भ्रमणकारी महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति का रानीगंज से रहस्यमय तरीके से गायब हो जाने की घटना से हम एक साथ क्रोधित और मर्माहत हैं।
इस घटना के विरोध में और तुरंत निष्पक्ष जांच, दोषियों की गिरफ्तारी तथा मूर्ति को पुनः स्थापित करने की मांग को लेकर एक विरोध सभा आयोजित की जाएगी।
तारीख: 14 जुलाई 2026
समय: शाम 4:30 बजे
स्थान: पंजाबी मोड़, रानीगंज, पश्चिम बंगाल
सभी शुभचिंतकों, लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों और लोकतंत्रप्रिय नागरिकों से समय पर उपस्थित होने का हार्दिक आह्वान किया जाता है।
पश्चिम बंगाल लोकतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ
जनवादी लेखक संघ
(रानीगंज आंचलिक कमेटी)
**
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...