पश्चिम बंगाल में रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों से हॉकरों को बिना किसी वैकल्पिक पुनर्वास के बलपूर्वक उजाड़ा जा रहा है, जिससे लाखों परिवारों की आजीविका छिन गई है। कॉरपोरेट हितों और स्टेशनों के व्यवसायीकरण (अमृत भारत योजना) के लिए केंद्रीय 'स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट-2014' के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस बेदखली से न केवल गरीब दुकानदार, बल्कि महंगाई से त्रस्त मध्यमवर्गीय उपभोक्ता भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। मुख्य विपक्षी दल (टीएमसी) की आत्मसमर्पण वाली खामोशी के बीच केवल वामपंथी ताकतें ही सड़कों पर हॉकरों के अधिकारों के लिए डटकर संघर्ष कर रही हैं।

कॉरपोरेट के लिए पौष मास , हॉकर्स का सर्वनाश: बंगाल में 'डबल इंजन' के बुलडोजर राज के खिलाफ सड़कों पर उतरा वामपंथ
"झालमुड़ी खाकर वोट बटोरने वाले हुक्मरानों ने गरीबों के पेट पर चलाया बुल्डोजर, कॉर्पोरेट के शृंगार के लिए उजाड़ी जा रही मेहनतकशों की जिंदगी!"
- पार्थप्रतिम बिश्वास
कोलकाता: साल 2020 का वह नजारा आज भी देश नहीं भूला है, जब कोविड महामारी से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के समय गुजरात प्रशासन ने अहमदाबाद के 'सरदार वल्लभभाई पटेल' हवाई अड्डे से 'मोतेरा' स्टेडियम जाने वाले रास्ते की झुग्गियों को छुपाने के लिए सड़क के दोनों तरफ ऊँची और लंबी दीवारें खड़ी कर दी थीं। मकसद साफ था—विदेशी मेहमान की नजरों से देश की गरीबी को लोकचक्षु से ओझल कर देना। आज ठीक वैसी ही जनविरोधी और गरीब-विरोधी मानसिकता का प्रतिबिंब पश्चिम बंगाल के रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों पर चलाए जा रहे 'हॉकर उच्छेद अभियान' (रेहड़ी-पटरी बेदखली अभियान) में साफ दिखाई दे रहा है। तथाकथित 'स्मार्ट सिटी' बनाने और शहर के कॉस्मेटिक सौंदर्यीकरण के नाम पर रेलवे स्टेशन से लेकर बस स्टैंड तक हर जगह को हॉकर-मुक्त करने की जिद पकड़े भगवा शासकों का दल इस देश की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता को संदूक में बंद करके भाग रहा है। लेकिन असलियत यह है कि एक स्मार्ट शहर बनाने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम योजनाओं के जरिए अलग-अलग आय वाले लोगों के सह-अस्तित्व की आवश्यकता होती है। शहर से गरीबों को खदेड़कर इस लक्ष्य को हासिल करना पूरी तरह असंभव है।
झालमुड़ी और चॉप-पकोड़े का ज्ञान देने वाले ही आज उजाड़ रहे आशियाने
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि प्रधानमंत्री ने इसी राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान एक हॉकर की दुकान से महज दस रुपये की झालमुड़ी खाकर मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी थीं और चुनाव प्रचार में बाजी मारी थी। पिछले दस वर्षों में जब देश में संगठित क्षेत्र (ऑर्गनाइज्ड सेक्टर) में नौकरियों का भयानक संकट पैदा हुआ, तब प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तक सभी ने एक सुर में युवाओं को वैकल्पिक आजीविका समझाने के लिए पकोड़े से लेकर चॉप-तेलेभाजा (तले-भुने पकवान) बेचने के ही उदाहरण दिए थे। ये सारे उदाहरण साबित करते हैं कि हॉकिंग (फेरी लगाना) कोई अवैध धंधा नहीं है, बल्कि यह पेशा दशकों से समाज द्वारा स्वीकृत (समाजसिद्ध) रहा है, जिसे स्वतंत्र भारत में साल 2014 के केंद्रीय कानून ने बाकायदा कानूनसिद्ध घोषित किया था। इसलिए हॉकर का मतलब कोई अवैध कब्जाधारी या 'उड़ कर आकर बैठ जाने वाले' घुसपैठिये नहीं हैं। लेकिन आज इसी हॉकर बेदखली को लेकर राज्य की राजनीति पूरी तरह गर्म है। भारी जनसमर्थन के साथ जीती नई गेरुआ सरकार अवैध हॉकर हटाने के नाम पर उच्छेद के जनविरोधी उत्सव में जुट गई है।
"भय आउट, भरोसा इन" का झूठा नारा और "बुलडोजर राज" की वापसी
चुनाव से पहले गेरुआ नेताओं के प्रचार की मुख्य 'कैचलाइन' थी—"भय आउट, भरोसा इन" (डर खत्म, भरोसा शुरू)। लेकिन चुनाव खत्म होते ही पूरी कहानी पलट गई। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जोड़ा-फूल (तृणमूल कांग्रेस) के दुःशासन, संस्थागत भ्रष्टाचार और राज्य प्रायोजित आतंक के डर से मुक्ति पाने के लिए राज्य के बहुत से लोगों ने कमल-फूल (भाजपा) पर भरोसा जताया और उसे सत्ता में लेकर आए। तब राज्य में भ्रष्टाचार के चलते कानून का शासन पूरी तरह खत्म हो चुका था और शासकों का अपना तानाशाही कानून चल रहा था, जिससे कूचबिहार से लेकर काकद्वीप तक आम जनजीवन में राज्य का डर समा गया था। लेकिन आज, सरकार के पहले ही कार्यकाल के शुरुआती दिनों (स्लॉग ओवर) में जब बुल्डोजर राज का वही खौफ दोबारा लौट आया है, तो इस राजनीतिक बदलाव के असली गुणगत चरित्र पर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हर दिन नियम से राज्य के विभिन्न हिस्सों के रेलवे स्टेशनों पर राज्य पुलिस और रेल पुलिस की संयुक्त ताकत (डबल इंजन आक्रमण) बुल्डोजर लेकर समाज के उस हाशिए के श्रमजीवी इंसानों और हॉकरों के ठिकानों को बेरहमी से ढहा रही है। इससे पूरे राज्य के असहाय मेहनतकशों में रोजी-रोटी छिनने और राज-कोप (सरकार के गुस्से) का भयानक डर फैल गया है।
खस्ताहाल अर्थव्यवस्था में आजीविका पर चोट; 'भात देने की औकात नहीं, लात मारने को तैयार'
पिछले 15 सालों के भारी और संस्थागत भ्रष्टाचार के कारण पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था इस समय पूरी तरह खाई के किनारे आकर खड़ी हो गई है। मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) के मामले में पश्चिम बंगाल इस समय देश में 27वें स्थान पर पहुंच चुका है। ऐसे खस्ताहाल राज्य में नई सरकार की पहली प्राथमिकता नए रोजगार पैदा करने की होनी चाहिए थी, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। सिंगूर विवाद के समय से राज्य में उद्योगों का जो सूखा पड़ा, वह आज भी जारी है। नौकरियों का बाजार ठप होने से गैर-कृषि क्षेत्र के मजदूरों का बेहद बुरा हाल है। इस माहौल में, सरकारी भत्तों और खैरात पर निर्भर रहे बिना आत्मसम्मान के साथ ईमानदारी से दो वक्त की रोटी कमाने का एकमात्र जरिया छोटा खुदरा व्यवसाय ही बचा है। लाखों लोग रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, पर्यटन स्थलों और हाट-बाजारों में सामानों की पटड़ी लगाकर हॉकर बनकर अपना पेट पाल रहे हैं। सरकारी विफलता और कुप्रबंधन के कारण जब विकास के सारे रास्ते बंद थे, तब इन असंगठित क्षेत्र के कामगारों ने अपनी ईमानदारी, कौशल और अनुभव को पूंजी बनाकर इस आजीविका को चुना। मगर आज रातों-रात राजनीतिक तख्तापलट के बाद राज्य के नए शासक पिछली सरकारी विफलताओं का सारा ठीकरा इन्हीं हॉकरों पर फोड़ रहे हैं! इस सामाजिक-आर्थिक संकट के संदर्भ में ऐसा अंधाधुंध, अवैध और अनैतिक उच्छेद अभियान सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के पूरी तरह खिलाफ है। सरकार की इस युद्ध स्तर की तत्परता को देखकर कहावत याद आती है कि 'भात देने की औकात नहीं, मगर लात मारने को तैयार है!' सरकार को याद रखना होगा कि ये लाखों हॉकर घुसपैठिये नहीं, बल्कि इसी देश के सम्मानित नागरिक हैं जिनके वोटों से यह सरकार बनी है।
केंद्रीय "Street Vending Act-2014" की सरेआम धज्जियां
हॉकरों के हितों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के कार्यकाल में पारित पहला "स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट-2014" कानून मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से ही देश में लागू है। उस कानून के तहत हॉकरों के वर्गीकरण के लिए सर्वे करना अनिवार्य है। स्थानीय नगर पालिका की टाउन वेंडिंग कमेटी या राज्य प्रशासन को यह तय करना था कि शहर के किन-किन स्थानों पर, कितनी संख्या में हॉकर, किस-किस तरह के सामानों की खरीद-बिक्री करेंगे या कौन से क्षेत्र नो-वेंडिंग जोन होंगे। लेकिन एक दशक पुराना यह कानून राज्य में लागू नहीं किया गया, जिससे हॉकरों के अधिकार और जिम्मेदारियां पूरी तरह असुरक्षित रह गए। इस कानून में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि शहर के किसी भी हिस्से से हॉकरों को हटाने से पहले स्थानीय प्रशासन को उनके लिए वैकल्पिक पुनर्वास (दूसरी जगह दुकान देने) की मुकम्मल व्यवस्था करनी होगी। मगर इन सभी नियमों को ताक पर रखकर नई सरकार 'शहरी सफाई अभियान' के नाम पर उच्छेद के रास्ते पर चल पड़ी है। 'डबल इंजन' सरकार के आते ही गरीबों की सुरक्षा की मूल भावना पर हमला हुआ है और देश के कानून को सरेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है।
'अमृत भारत योजना' की आड़ में कॉर्पोरेट की मौज; मध्यमवर्ग भी होगा तबाह
हाल ही में राज्य के दौरे पर आए केंद्रीय रेल मंत्री ने पश्चिम बंगाल के सौ से अधिक रेलवे स्टेशनों पर 'अमृत भारत परियोजना' का काम शुरू करने की घोषणा की है। इस घोषणा से यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) कमर्शियल मॉडल के तहत रेलवे स्टेशनों की कीमती जमीनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करने के लिए ही इस 'डबल इंजन' सरकार ने व्यस्त और जनबहुल स्टेशनों को हॉकर-मुक्त करने का क्रूर कार्यक्रम अपनाया है। इस बेदखली से कॉर्पोरेट घरानों के लिए तो 'पौष का महीना' (भारी मुनाफा और मौज) है, लेकिन गरीब हॉकरों का पूरी तरह सर्वनाश हो रहा है। शहरीकरण के इस दौर में बढ़ती भीड़ के कारण रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड ही इन दुकानदारों की कमाई के मुख्य केंद्र हैं। बड़े शहरों (मेगासिटीज) की कम से कम एक-तिहाई गरीब आबादी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इन्हीं हॉकरों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, जादवपुर के 'संध्याबाजार' जैसे बाजारों में सब्जियों और मछलियों के दाम कोलकाता कॉर्पोरेशन के बाजारों या बड़े सुपरमार्केट की तुलना में कम से कम 30 से 35 प्रतिशत तक सस्ते होते हैं, क्योंकि हॉकर की अर्थव्यवस्था में बिचौलियों का कमीशन और मुनाफे का मार्जिन बेहद कम होता है। इस कमरतोड़ महंगाई के बाजार में हॉकरों को अचानक हटा देने से न केवल उनकी रोजी-रोटी छीनेगी, बल्कि शहर के निम्न-मध्यम और मध्यम वर्ग के बड़े हिस्से की जेब पर भी भारी डाका पड़ेगा।
पुनर्वास के बिना उच्छेद यानी 'कटमनी और सिंडिकेट राज' को नया न्योता
बिना किसी पुनर्वास योजना के चलाए जा रहे इस बुल्डोजर अभियान के कारण बेघर हुए हॉकर पेट पालने के लिए शहर के दूसरे कोनों में भागेंगे। वहां वे फिर से अपनी आजीविका बचाने के लिए नए सिंडिकेट और भ्रष्ट तंत्र के चंगुल में फंसेंगे और उन्हें जबरन वसूली के रूप में 'जजिया कर' (कटमनी) देना पड़ेगा, जैसा पूर्ववर्ती घासफूल (तृणमूल) के राज में होता था। अगर सरकारी स्तर पर उनकी पुनर्वास योजना नहीं होगी, तो शहर के कोने-कोने में सिंडिकेट के माध्यम से कटमनी के बदले उनके पुनर्वास का नया खेल शुरू हो जाएगा और वे फिर से 'अवैध हॉकर' के रूप में चिन्हित किए जाएंगे। हाल के दिनों में कई हॉकरों को अपना खून-पसीने का व्यवसाय बचाने के लिए ऐसे अवैध लेन-देन के दलदल में फंसना पड़ा है। लिहाजा, बिना पुनर्वास के यदि यह दमन जारी रहा, तो यह अंततः 'नई बोतल में पुरानी शराब' की तरह राज्य में नए सिरे से सिंडिकेट और कटमनी कल्चर को जन्म देगा। अगर सरकार सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ अपशोषहीन (जीरो टॉलरेंस) रुख रखती है, तो उसे व्यापक सामाजिक हित में इस अनियोजित हॉकर उच्छेद अभियान को तुरंत रोकना चाहिए। पुलिस के दम पर स्टेशनों को खाली तो कराया जा सकता है, लेकिन अगर बेरोजगार होकर ये लोग मजबूरी में गलत रास्ते पर चले गए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? व्यापक जनहित में सरकार को इस पर भी विचार करना होगा।
ट्रिपल इंजन का गठजोड़ और सड़कों पर वामपंथ का इकलौता संघर्ष
आखिर सत्ता में आते ही यह दमनकारी अभियान इतनी युद्धस्तर की तत्परता से क्यों शुरू हुआ, इसे लेकर जनमानस में गंभीर चर्चा छिड़ गई है। देश और राज्य के गेरुआ शासक राजनीति में कट्टर हिंदुत्व और अर्थव्यवस्था में कॉर्पोरेट समर्थक दृष्टिकोण से चलते हैं। उनके लिए शहर के विकास और सौंदर्यीकरण का मतलब सिर्फ इतना है कि कॉस्मेटिक सजावटी बदलाव करके गरीबों, असुंदर और लाचार लोगों को अमीर दुनिया की नजरों से छिपा दिया जाए। भारी जनसमर्थन से सरकार में आते ही वे कॉर्पोरेट सुधारों के नाम पर 'लोहा गरम रहते ही चोट' (लोहा गरम थाकते थाकतेई) कर देना चाहते हैं, ताकि इन कमजोर लोगों की रीढ़ की हड्डी पर वार करके उन्हें हमेशा के लिए झुकाया जा सके।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार की इस जनविरोधी नीति के खिलाफ जिन मुख्य विपक्षी दलों को सड़कों पर विरोध और प्रतिरोध का नेतृत्व करना चाहिए था, वे आज शासक के 'घर में पालतू विपक्ष में बदल चुके हैं। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, जेल जाने या सड़े हुए अंडों के हमले से बचने के लिए तत्पर पूरा घासफूल (तृणमूल) दल उंगलियों की चुनावी स्याही सूखने से पहले ही मैदान से पूरी तरह गायब होने की कगार पर है। केंद्र और राज्य के शासकों के साथ-साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में तृणमूल के इस तरह सो जाने के कारण राज्य में व्यावहारिक रूप से 'ट्रिपल इंजन' (शासक दल और उसकी बी-टीम बना विपक्ष) की सरकार बनने जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
ऐसे दमनकारी और मुश्किल समय में, जब आम जनता और हॉकरों का हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं है, तब 'दूरबीन' से भी दिखाई न देने वाले वामपंथी लोग और उनकी ट्रेड यूनियनें (CITU) ही हॉकरों के अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए सड़कों पर डटकर संघर्ष कर रहे हैं। चुनाव के बाद राज्य की राजनीति के परिदृश्य में यह एक बहुत बड़ा और गुणात्मक बदलाव है।
[लेखक जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (कन्स्ट्रक्शन इंजीनियरिंग विभाग) हैं।]
साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 14.07.2026
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