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कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'मातृत्व के अधिकार' पर मुहर

केशव कुमार भट्टड़•15 जुलाई 20265 मिनट पठन53 बार पढ़ा गया

"नियम और कानून इंसानी जिंदगी और मातृत्व की ममता से बड़े नहीं हो सकते; न्याय की जीत ने आज इसे फिर साबित किया।" कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस अमृता सिन्हा की एकल पीठ ने मातृत्व और जीवन के अधिकार को सर्वोपरि मानते हुए दो शिक्षिकाओं की याचिका स्वीकार कर ली है। इन शिक्षिकाओं ने ऑटिज़्म से पीड़ित अपने बच्चों की विशेष देखभाल और चिकित्सा के आधार पर घर के पास तबादले (ट्रांसफर) की गुहार लगाई थी। स्कूल सेवा आयोग के 2015 के नियमों में इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति को ट्रांसफर की विशेष पात्रता श्रेणी में शामिल नहीं किया गया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई। अदालत ने इसे शारीरिक और मानसिक दिव्यांगता के बीच का अतार्किक भेदभाव मानते हुए अधिकारियों की संवेदनहीनता को खारिज किया और दोनों माताओं को तुरंत राहत दी।

कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'मातृत्व के अधिकार' पर मुहर

ऐतिहासिक फैसला

ट्रांसफर नियमों में ऑटिज़्म को भी मिली विशेष श्रेणी

विशेष परिस्थितियों में शिक्षिकाओं के तबादले को दी मंजूरी

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 'मातृत्व के अधिकार' पर लगाई मुहर

  • अटिज़्म से पीड़ित बच्चों की देखभाल के लिए दो माताओं की याचिका स्वीकार; नियम की संवैधानिक वैधता पर जस्टिस अमृता सिन्हा का महत्वपूर्ण फैसला

  • शारीरिक और मानसिक दिव्यांगता के बीच भेदभाव करने वाले नियमों को वामपंथी वकीलों ने कोर्ट में दी चुनौती

  • अधिकारियों की संवेदनहीनता परास्त; 'उत्सश्री' पोर्टल पर खारिज आवेदनों को अदालत ने माना न्याय का उल्लंघन

कोलकाता, 14 जुलाई। एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मातृत्व के बुनियादी और संवैधानिक अधिकार को मान्यता देते हुए दो शिक्षिकाओं के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने नियमों की संवैधानिक वैधता को ध्यान में रखते हुए दो माताओं की याचिका को स्वीकार कर लिया है। जस्टिस अमृता सिन्हा की एकल पीठ ने मंगलवार को ऑटिज़्म (Autism) से पीड़ित बच्चों के इलाज और देखभाल के आधार पर शिक्षिकाओं के मनचाहे तबादले (ट्रांसफर) की अर्जी को मंजूरी दे दी। यह फैसला न केवल प्रशासनिक नियमों की संवेदनहीनता पर चोट करता है, बल्कि बच्चों की विशेष मानसिक और न्यूरोलॉजिकल देखभाल को जीवन और सम्मान के अधिकार से जोड़कर देखता है।

क्या है पूरा मामला?

मामले के विवरण के अनुसार, दो शिक्षिकाओं—इंद्राणी बसु और तनुश्री बंद्योपाध्याय—ने अपने बच्चों के 'ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' (Autism Spectrum Disorder) से पीड़ित होने के कारण अपने घरों के नजदीकी स्कूलों में ट्रांसफर की मांग की थी। जब शिक्षा विभाग ने उनकी मांगों को खारिज कर दिया, तो उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राज्य स्कूल सेवा आयोग के 'स्पेशल ग्राउंड्स एंड री-एलोकेशन रूल्स, 2015' (विशेष आधार पर सामान्य स्थानांतरण और पुनर्मूल्यांकन नियम, 2015) के तहत गंभीर बीमारी, शारीरिक विकलांगता, पारिवारिक संकट या पति-पत्नी के एक ही कार्यस्थल पर होने जैसी विशेष परिस्थितियों में ट्रांसफर का प्रावधान है। लेकिन, इस नियम में ऑटिज़्म जैसी गंभीर मानसिक और न्यूरोलॉजिकल (स्नायु तंत्र संबंधी) विकासात्मक दिव्यांगता को 'विशेष श्रेणी' के तहत शामिल नहीं किया गया था। इस विसंगति के कारण वे लंबे समय से भेदभाव का शिकार हो रही थीं, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।

विस्थापित और परेशान थीं शिक्षिकाएं

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश मानवाधिकार अधिवक्ताओं—फिरदौस शमीम और गोपा विश्वास ने अदालत को बताया कि पहली याचिकाकर्ता इंद्राणी बसु साल 2007 से उत्तर 24 परगना के घोंजा हाई स्कूल में बंगाली विषय की सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। दूसरी याचिकाकर्ता तनुश्री बंद्योपाध्याय साल 2013 से पुरुलिया के मानवबाजार गर्ल्स हाई स्कूल (उच्च माध्यमिक) में अंग्रेजी की सहायक शिक्षिका के पद पर तैनात हैं। दोनों शिक्षिकाओं के बच्चे ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित हैं। उन्हें हर वक्त अपनी माताओं के सहारे और निरंतर इलाज व थेरेपी की आवश्यकता होती है। ऐसे में माताओं का अपने घर के पास के कार्यस्थल पर तैनात होना बेहद जरूरी था।

'उत्सश्री' पोर्टल की विफलता और प्रशासनिक असंवेदनशीलता

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने आरोप लगाया कि शिक्षिकाओं ने राज्य सरकार के तबादला संबंधी ऑनलाइन पोर्टल 'उत्सश्री' के माध्यम से कई बार ट्रांसफर के लिए आवेदन किया था, लेकिन प्रशासन ने हर बार उसे तकनीकी बहाने बनाकर खारिज कर दिया। एक मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा दिए गए ऑटिज़्म के प्रमाण पत्र को यह कहकर लौटा दिया गया कि यह बीमारी 'सरकारी दिशानिर्देशों की सूची' में शामिल नहीं है। दूसरे मामले में आवेदन को सीधे तौर पर 'अस्वीकार्य' घोषित कर खारिज कर दिया गया। वकीलों ने दलील दी कि संबंधित अधिकारियों ने इन संवेदनशील और मानवीय आवेदनों पर कानूनी और निष्पक्ष रूप से विचार ही नहीं किया।

शारीरिक बनाम मानसिक दिव्यांगता का असंगत भेदभाव

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने दलील दी कि वर्तमान नियमों में 40 प्रतिशत या उससे अधिक की शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर ट्रांसफर की सुविधा तो दी गई है, लेकिन ऑटिज़्म जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। यह वर्गीकरण शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम लोगों के बीच एक अतार्किक और अमानवीय भेदभाव पैदा करता है, जो कानून के समक्ष समानता और सम्मान के साथ जीने के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है। इस ऐतिहासिक मामले में 2015 के नियमों के नियम 4 की वैधानिकता को भी चुनौती दी गई थी कि क्या यह नियम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत और असंवैधानिक है। साथ ही, स्कूल प्रबंधन द्वारा ट्रांसफर के लिए 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) न दिए जाने के फैसले को भी अदालत में चुनौती दी गई थी।

अदालत का मानवीय रुख

याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि विशेष बच्चों की देखभाल को पूरी तरह से मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। आखिरकार, सभी पक्षों की दलीलें सुनने और परिस्थितियों की गंभीरता को समझने के बाद हाईकोर्ट ने इन दोनों शिक्षिकाओं को बड़ी राहत देते हुए उनके तबादले के आदेश जारी किए। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह निर्णय साबित करता है कि मातृत्व और बाल कल्याण का अधिकार किसी भी प्रशासनिक नियमावली से ऊपर है।


साभार: बांग्ला दैनिक गणशक्ति । 15 जुलाई 2026

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कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'मातृत्व के अधिकार' पर मुहर

प्रकाशित: 15 जुलाई 2026 • 5 मिनट पठन

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