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सत्ता का दंभ बनाम ‘कॉकरोचों’ की सुलगती बगावत - सायन दत्त

केशव कुमार भट्टड़•17 जुलाई 20269 मिनट पठन124 बार पढ़ा गया

जब सत्ता के शीर्ष से प्रदर्शनकारी युवाओं को 'कॉकरोच' कहकर अपमानित किया गया, तब जंतर-मंतर की सड़कों पर इन वंचित युवाओं ने अपने वजूद और आत्मसम्मान का ऐतिहासिक प्रतिरोध शुरू कर दिया। NEET जैसी परीक्षाओं में संस्थागत भ्रष्टाचार और छात्र आत्महत्याओं के खिलाफ खड़ा यह आंदोलन अब महज़ एक परीक्षा सुधार की मांग नहीं, बल्कि कॉरपोरेट-फासीवाद के खिलाफ एक मुकम्मल लड़ाई बन चुका है।लद्दाख की वादियों से आकर दिल्ली की धूल भरी सड़कों पर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक इस सड़ती हुई व्यवस्था के खिलाफ एक अडिग नैतिक रीढ़ बनकर देश को भयमुक्त और घृणामुक्त बनाने का आह्वान कर रहे हैं। सत्ता के दमनकारी कानूनों (UAPA/NSA), पुलिसिया लाठियों और कॉरपोरेट-फंडेड प्रोपेगैंडा को ठेंगा दिखाते हुए युवाओं की यह तीखी वैचारिक जंग देश में एक नए राजनीतिक समीकरण की बुनियाद रख रही है।

सत्ता का दंभ बनाम ‘कॉकरोचों’ की सुलगती बगावत - सायन दत्त

सत्ता का दंभ बनाम ‘कॉकरोचों’ की सुलगती बगावत

- सायन दत्त

फ्रांज काफ्का के कालजयी उपन्यास 'द मेटामॉर्फोसिस' की वह सुबह याद कीजिए, जब मुख्य किरदार ग्रेगर सामसा सोकर उठता है और खुद को एक विशाल, घृणास्पद कीड़े में बदला हुआ पाता है। यह अतियथार्थवादी रूपक (Surrealist Metaphor) 21वीं सदी के आधुनिक भारत की सड़कों पर इस कदर नग्न और क्रूर हकीकत बनकर उतरेगा, इसकी कल्पना शायद खुद काफ्का ने भी नहीं की होगी।

जब देश की शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश बेरोजगार युवाओं, नौकरी के उम्मीदवारों और प्रदर्शनकारियों को सरेआम 'कॉकरोच' (आरशोला) या 'परजीवी' कहकर उनका मखौल उड़ाते हैं, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि इस दमनकारी सत्ता की नजरों में एक पूरी पीढ़ी की हैसियत क्या है। दिल्ली के जंतर-मंतर की पिघलती हुई डामर की सड़कों पर जब शाम ढलती है और पुलिस द्वारा बिजली काट दिए जाने के बाद चारों तरफ गहरा काला सन्नाटा पसर जाता है, ठीक उसी अंधेरे के बीच कुछ अड़ियल नौजवानों की आंखों में बगावत की आग सुलगने लगती है। यह आग कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि कॉरपोरेट फासीवाद के जबड़े के बीच खड़े उन बेसहारा, छले गए युवाओं के वजूद की अदम्य जिद्द है। ग्रेगर सामसा ने तो अपने इस अमानवीय रूपांतरण को नियति मानकर खामोशी से दम तोड़ दिया था। लेकिन आज के भारत के इन 'कॉकरोचों' ने घुटने टेकने से इनकार कर दिया है; बल्कि उन्होंने इसी अपमान को अपना हथियार बनाकर सत्ता की आंखों में आंखें डाल दी हैं।

कॉरपोरेट-हिंदुत्व के इस दौर में देश की युवा पीढ़ी को महज 'जीवित इकाइयों' में तब्दील कर दिया गया है। नीट (NEET), सीयूईटी (CUET), सीबीएसई (CBSE) जैसी परीक्षाओं में लगातार हो रहे घोटाले और पेपर लीक कोई इत्तेफाक नहीं हैं। यह नवउदारवादी अर्थव्यवस्था द्वारा सुनियोजित ढंग से की जा रही 'संस्थागत हत्याएं' हैं। इस ढांचागत भ्रष्टाचार के कारण पिछले कुछ दिनों में कई होनहार छात्र खुदकुशी करने पर मजबूर हुए हैं। प्रदीप मेघवाल, आकांक्षा चतुर्वेदी, अमाइरा या कहान पटेल जैसी मासूम ज़िंदगियों के ख़त्म होने के बाद भी मोदी सरकार के किसी नुमाइंदे ने उनके परिवारों से मिलकर शोक जताने की बुनियादी तहज़ीब तक नहीं दिखाई। आख़िर दिखाते भी क्यों? कॉरपोरेट-हिंदुत्व के बहीखाते में युवा केवल एक निर्जीव संख्या भर हैं।

पिछले एक दशक में युवा भारत की प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ बेरोजगारी के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक संस्थागत उत्पीड़न बन चुका है। फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको ने अपने 'अनुशासनात्मक समाज' के सिद्धांत में दिखाया था कि सत्ता किस तरह निगरानी और अनुशासन के मुखौटे में नागरिकों के शरीर और दिमाग को नियंत्रित करती है। आज इस देश में जब भी कोई नौजवान रोजगार या अधिकारों के लिए सड़क पर उतरता है, उस पर पुलिस की लाठियां, पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले छोड़ दिए जाते हैं। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता छीनी जा चुकी है, स्कॉलरशिप बंद हैं और फीस लगातार बढ़ाई जा रही है। इसके खिलाफ आवाज उठाते ही जेएनयू, जामिया मिलिया और जादवपुर जैसे शिक्षा संस्थानों के छात्रों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' या 'अर्बन नक्सल' घोषित कर दिया जाता है। फासीवाद की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही है कि वह इंसान के भीतर के अदम्य साहस और जिद्द का सही पैमाना नहीं नाप सकता। जंतर-मंतर की धूल भरी सड़कों और बुझाई गई बत्तियों के नीचे आज उसी अदम्य जिद्द के बीज बोए जा रहे हैं। जंतर-मंतर के उस अंधेरे में चमकती आंखें दरअसल प्रोमीथियस की आग का आधुनिक संस्करण हैं। यह लड़ाई महज़ किसी परीक्षा के पर्चे लीक होने या किसी मंत्री के इस्तीफे की नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने की लड़ाई की शुरुआत है।

सत्ता ने दमन का एक सुव्यवस्थित तंत्र तैयार किया है। CAA विरोधी प्रदर्शनों या किसान आंदोलनों जैसे किसी भी लोकतांत्रिक प्रतिरोध को UAPA और NSA जैसे काले कानूनों से कुचल दिया गया। संसद में विपक्ष की आवाज़ दबाने से लेकर मुख्यधारा के मीडिया को 'गोदी मीडिया' बनाने तक की इस कबाड़ प्रक्रिया ने लोकतंत्र के हर खुले स्पेस को बंद कर दिया है। पिछले एक दशक से देश में एक अघोषित आपातकाल लागू है। करोड़ों युवाओं को समझ आ चुका है कि इस सड़ चुके 'सिस्टम' में योग्यता और मेहनत की कोई कौड़ी के बराबर कीमत नहीं है। कुछ युवा इस संकट से बचने के लिए वर्चुअल दुनिया के खोखले मनोरंजन में डूब गए हैं, तो कुछ ने इस व्यवस्था से सीधी जंग का रास्ता चुना है।

बिहार के बीस वर्षीय पॉलिटेक्निक पास सुनील कुमार जैसे युवा—जिन्होंने पहले कभी वोट तक नहीं डाला था—आज जंतर-मंतर को 'राजनीति की पाठशाला' बनाकर सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। कश्मीर से आए ज़ाहिद जैसे युवा जब यह कहते हैं कि "पेलेट गन और आंसू गैस से भरी घाटी की तुलना में दिल्ली के इस फुटपाथ पर बैठकर विरोध करना कहीं अधिक लोकतांत्रिक है..." तो साफ हो जाता है कि सत्ता ने देश के हर कोने के युवाओं में भय का कितना वीभत्स साम्राज्य कायम कर रखा है। सवाल यह है कि इस असमान संघर्ष की भाषा क्या होगी? इतिहास गवाह है कि जब शोषण की चक्की अपनी चरम सीमा पर पहुंचती है, तो शोषितों का प्रतिरोध स्थापित ढर्रों को तोड़कर एक नई, तीखी और अपरंपरागत भाषा गढ़ लेता है। जंतर-मंतर पर युवाओं का कॉकरोच के मुखौटे पहनकर आना, थाली-चम्मच बजाकर विरोध करना कोई पागलपन नहीं है। यह सत्ता की खोखली गंभीरता पर किया गया एक तीखा व्यंग्य है। इस व्यंग्य से बौखलाकर ही सत्ता की आईटी सेल ने कॉकरोच मारने वाले स्प्रे की तर्ज पर 'हिट जनता पार्टी' और कार्टूनों के नाम पर 'ओगी जनता पार्टी' जैसे हैंडल बनाकर सोशल मीडिया पर आक्रामक और घृणास्पद प्रोपेगैंडा चलाया। लेकिन कुछ ही दिनों में सीजेपी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या डेढ़ करोड़ पार कर जाना यह साबित करता है कि युवाओं के इस आक्रोश को अब रोका नहीं जा सकता।

सत्तारूढ़ भाजपा बेहद चालाकी से इस स्वतःस्फूर्त गुस्से को 'वामपंथी साजिश', 'कृत्रिम हताशा' और अप्रत्यक्ष रूप से 'देशद्रोह' का रंग देने की कोशिश कर रही है। और जब यह वैचारिक मतिभ्रम (ब्रैन वाशिंग) नाकाम हो जाता है, तो सत्ता अपनी नग्न पुलिसिया और कानूनी ताकत का इस्तेमाल करती है। आईटी एक्ट की धारा 69A का हव्वा दिखाकर झूठे बहानों से सीजेपी का 'एक्स' (ट्विटर) अकाउंट ब्लॉक कर दिया गया। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को प्रताड़ित किया गया, शाम के बाद बत्तियां बुझा दी गईं, पानी-खाना और शौचालय तक की बुनियादी जरूरतें रोक दी गईं। सत्ता की यह बर्बरता दरअसल एक कोने में सिमट चुके तानाशाह के आदिम डर को उजागर करती है। तर्क के मैदान में मात खाने के बाद निरंकुश सत्ता कितनी क्रूर हो सकती है, यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। युवाओं के मन में खौफ पैदा करने के लिए UAPA और NSA जैसी दानवीय धाराओं की धमकी दी जा रही है।

यह आक्रोश सिर्फ मुख्य न्यायाधीश के संवेदनहीन बयान के खिलाफ नहीं, बल्कि इस गहरे ढांचागत पतन के खिलाफ एक मुकम्मल बगावत है। इस सड़ते हुए ढांचे के खिलाफ अडिग हिमालय की तरह खड़े व्यक्ति का नाम है सोनम वांगचुक—जो आज के 'उदयन पंडित' (सत्यजीत रे की फिल्म 'हीरक राजार देशे' के बागी शिक्षक) हैं। कई लोग सवाल पूछते हैं कि जिनका संघर्ष लद्दाख की बर्फीली वादियों का था, वे आज दिल्ली की इस धूल भरी सड़क पर क्यों हैं? इसका जवाब उनके जीवन दर्शन में छिपा है। वांगचुक स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें किसी ने यहाँ आने के लिए मजबूर नहीं किया। पिछले चालीस वर्षों से छात्र ही उनके सबसे करीब रहे हैं। एक सच्चा शिक्षक जानता है कि सिर्फ लद्दाख के पहाड़ों या नदियों को बचाने से देश आज़ाद नहीं होगा, जब तक कि पीढ़ियां तैयार करने वाली बुनियाद यानी हमारी शिक्षा प्रणाली सुरक्षित न हो। जब पूरा देश नफ़रत और ध्रुवीकरण की राजनीति में बंटा है, तब वे 'भयमुक्त, घृणामुक्त भारत' का आह्वान करते हैं। यही वह पुकार है जो कॉरपोरेट-हिंदुत्व की चूले हिला रही है।

वांगचुक याद दिलाते हैं कि 2047 के 'विकसित भारत' का जो रंगीन गुब्बारा सत्ता आज उड़ा रही है, वह एक भद्दा मज़ाक है, यदि देश की युवा पीढ़ी को आत्महत्या का रास्ता चुनना पड़ रहा हो। जब सत्ता जवाबदेही से मुंह मोड़ लेती है, तब लोकतंत्र में निरंतर शांतिपूर्ण प्रतिरोध ही हाशिए के लोगों का एकमात्र हथियार बचता है। वांगचुक की यह जिद्द किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि 21वीं सदी के सीने पर खड़ी वह निडर बगावत है जो साबित करती है कि सत्ता चाहे कितनी भी निर्दयी हो, वह एक ईमानदार इंसान की रीढ़ को कभी झुका नहीं सकती। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 28 जून से वांगचुक आमरण अनशन पर हैं। 18वें दिन उनकी सेहत बेहद चिंताजनक है, लेकिन वे डिगने को तैयार नहीं हैं।

देश का युवा इसे कोई अस्थायी सोशल मीडिया 'ट्रेंड' नहीं मान रहा, बल्कि वे इसमें अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने का रास्ता देख रहे हैं। जो बेरोजगार युवा कभी किसी राजनीतिक रैली में नहीं गया, वह भी आज जंतर-मंतर की इस भीड़ में अपने वजूद को बचाने की जुबान पा रहा है। सत्ता के कॉरपोरेट फंडेड आईटी सेल की बौखलाहट ही यह साबित करने के लिए काफी है कि इन तथाकथित 'कॉकरोचों' ने सत्ता की नींद उड़ा दी है। CJP ने एक बात साफ कर दी है—बुलेट और बुलडोजर की हिंसक राजनीति को युवाओं की मेधा, अदम्य साहस और तीखे श्लेष से पंगु नहीं बनाया जा सकता है। यह आंदोलन अब जंतर-मंतर के फुटपाथों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश के हर पुस्तकालय, हर कॉलेज और चाय की हर टपरी तक फैल चुका है, जो भविष्य के भारत की एक नई राजनीतिक चेतना की नींव रख रहा है।

आगामी 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन CJP ने 'संसद चलो' का आह्वान किया है। सत्ता अपनी पुलिसिया बैरिकेडिंग और अहंकार की मीनारों से सोच सकती है कि पानी की बौछारों और लाठियों के दम पर इसे भी हमेशा की तरह बिखेर दिया जाएगा। लेकिन वे भूल रहे हैं कि जिस इमारत की बुनियाद से धुआं उठने लगे, उसका ढहना महज़ वक्त की बात होती है। फासीवाद इंसान के भीतर के अदम्य जुझारूपन को नहीं भांप पाता। जंतर-मंतर की धूल और अंधेरे में आज बदलाव की जो फसल बोई जा रही है, उसकी लपटें प्रोमीथियस की आग की तरह फैलेंगी। यह लड़ाई महज़ एक परीक्षा के घोटाले या एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है, यह अपनी इंसानियत और वजूद को बचाने की आखिरी जंग की शुरुआत है। सड़ती हुई व्यवस्था के पतन का जो इतिहास लिखा जा रहा है, यह उसका पहला अध्याय मात्र है; इसका विस्तार दूर तक होना तय है। क्योंकि हकों की लड़ाई शॉर्टकट से नहीं, बल्कि सड़कों पर लड़कर ही जीती जाती है।

लेखक डीवाइएफआई से जुड़े हैं, पत्रिका युवशक्ति से जुड़े है। नाट्य समालोचक हैं, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के भूतपूर्व छात्र हैं, लेखन क्षेत्र में सक्रिय है ।


साभार : बांग्ला दैनिक गणशक्ति। 17 जुलाई 2026

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प्रकाशित: 17 जुलाई 2026 • 9 मिनट पठन

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